"NADAAN" - HINDI CLASSICAL FAMILY DRAMA FILM / NAVIN NISCHAL & ASHA PAREKH MOVIE



यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जहाँ खुशियाँ और गम एक साथ चलते हैं। इस फिल्म के मुख्य कलाकार संजय खान और नंदा हैं जिन्होंने अपनी अदाकारी से इस पारिवारिक ड्रामे को जीवंत बना दिया है। कहानी की शुरुआत एक बहुत ही शांत और खुशहाल माहौल से होती है। नायक और नायिका के बीच का प्रेम बहुत ही सादगी भरा है। संजय खान ने एक ऐसे युवक की भूमिका निभाई है जो अपने परिवार और अपने प्यार के प्रति पूरी तरह समर्पित है। नंदा ने एक ऐसी युवती का किरदार निभाया है जो संस्कारों से बंधी है और रिश्तों की अहमियत को समझती है।


फिल्म की शुरुआत में दिखाया गया है कि नायक और नायिका एक दूसरे को बचपन से जानते हैं या फिर उनकी मुलाकात बहुत ही सुंदर परिस्थितियों में होती है। उनके बीच का प्रेम धीरे-धीरे परवान चढ़ता है। फिल्म में गीतों का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि वे कहानी की भावनाओं को शब्दों में पिरोते हैं। जब नायक और नायिका साथ होते हैं तो दुनिया की हर मुसीबत छोटी लगने लगती है। उनके जीवन में कई ऐसे पल आते हैं जब उन्हें लगता है कि उनकी दुनिया सबसे सुंदर है। लेकिन जैसा कि अक्सर पारिवारिक फिल्मों में होता है नियति ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।


कहानी में मोड़ तब आता है जब परिवार के बीच कुछ गलतफहमियां पैदा होने लगती हैं। कोई तीसरा व्यक्ति या परिस्थितियाँ उनके बीच दरार डालने की कोशिश करती हैं। फिल्म का शीर्षक वह दिन याद करो इस बात की ओर इशारा करता है कि पुराने सुनहरे दिनों की यादें ही इंसान को मुश्किल वक्त में सहारा देती हैं। जब नायक को अपनी पुरानी बातें याद आती हैं तो उसका दिल भर आता है। वह सोचता है कि कैसे एक समय पर सब कुछ कितना सही था और अब अचानक सब कुछ बिखर गया है।


पारिवारिक विवादों के कारण नायक और नायिका को अलग होना पड़ता है। यहाँ से फिल्म में विरह और दुख का दौर शुरू होता है। नंदा ने एक दुखी लेकिन मजबूत महिला के रूप में बहुत ही प्रभावशाली अभिनय किया है। वह अपने आंसुओं को छुपाकर अपने परिवार की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश करती है। दूसरी ओर संजय खान का किरदार अपनी बेगुनाही साबित करने और अपने बिछड़े हुए प्यार को वापस पाने के लिए संघर्ष करता है। इस संघर्ष के दौरान उसे कई कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ता है।


फिल्म में समाज के उन पहलुओं को भी दिखाया गया है जहाँ लोग दूसरों की खुशियों से जलते हैं। विलेन या नकारात्मक पात्र अपनी चालों से इस प्रेमी जोड़े के जीवन में जहर घोलने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन कहानी का मूल मंत्र यही है कि सच्चाई की हमेशा जीत होती है। नायक धीरे-धीरे उन सभी साजिशों का पर्दाफाश करता है जो उसके खिलाफ रची गई थीं। वह एक-एक करके हर उस इंसान का सामना करता है जिसने उसे धोखा दिया था।


फिल्म के मध्य भाग में कई भावुक दृश्य हैं जहाँ नायक अपनी माँ या अपने पिता से मिलता है और पुरानी यादें ताजा होती हैं। वह दिन याद करो का भाव हर उस दृश्य में झलकता है जहाँ पात्र अपने अतीत की ओर देखते हैं। सत्तर के दशक की फिल्मों की खासियत उनके संवाद होते थे और इस फिल्म में भी बहुत ही दमदार और सीधे संवादों का उपयोग किया गया है जो दर्शकों के दिल को छू जाते हैं।


जैसे-जैसे फिल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है रोमांच और जज्बात दोनों बढ़ जाते हैं। एक बड़ा टकराव होता है जहाँ सभी पात्र एक जगह जमा होते हैं और सच्चाई सबके सामने आती है। गलतफहमियां दूर होती हैं और दोषियों को उनके किए की सजा मिलती है। नायक और नायिका का मिलन बहुत ही सुंदर और सुखद तरीके से दिखाया गया है। यह मिलन केवल दो प्रेमियों का नहीं बल्कि एक टूटे हुए परिवार के फिर से जुड़ने का प्रतीक है।


निर्देशन की दृष्टि से के अमरनाथ ने कहानी की गति को बहुत अच्छे से संभाला है। उन्होंने कहीं भी कहानी को उबाऊ नहीं होने दिया। संगीत भी कहानी के साथ पूरी तरह न्याय करता है। फिल्म हमें यह संदेश देती है कि चाहे वक्त कितना भी बदल जाए और कितनी भी मुश्किलें आएं अगर हमारा आधार सच्चाई और प्रेम है तो हम हर बाधा को पार कर सकते हैं।


इस विस्तृत कहानी में हमने देखा कि कैसे एक छोटा सा संदेह पूरे परिवार को तबाह कर सकता है और कैसे विश्वास उसे फिर से खड़ा कर सकता है। संजय खान और नंदा की जोड़ी ने अपनी केमिस्ट्री से पर्दे पर आग लगा दी थी। उनके रोमांस के दृश्य जितने कोमल थे उनके बिछड़ने के दृश्य उतने ही दर्दनाक थे। यह फिल्म आज भी उन लोगों के लिए एक बेहतरीन अनुभव है जो पुराने दौर के पारिवारिक सिनेमा को पसंद करते हैं।


अंततः यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि हमें अपने बीते हुए अच्छे दिनों को कभी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि वही यादें हमें आगे बढ़ने की शक्ति देती हैं। वह दिन याद करो केवल एक फिल्म का नाम नहीं है बल्कि एक जीवन दर्शन है। कहानी का हर पात्र अपनी जगह सही है और अपनी परिस्थितियों से लड़ रहा है। यही इस फिल्म की असली खूबसूरती है कि यह हमें इंसानी स्वभाव के हर रंग से परिचित कराती है।


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