Uphaar is a 1971 Hindi film.
Produced by Tarachand Barjatya for Rajshri Productions, the film stars Jaya
Bhaduri, Swarup
Dutta and Kamini
Kaushal. The music is by Laxmikant Pyarelal. This film is based on the 1893
short story "Samapti" (The End) by Rabindranath Tagore.
फिल्म उपहार की शुरुआत पश्चिम बंगाल के एक बहुत ही शांत और सुंदर गाँव से होती है। इस कहानी का नायक अनूप है, जो कोलकाता में वकालत की पढ़ाई कर रहा है। अनूप एक बहुत ही सुलझा हुआ और आधुनिक विचारों वाला युवक है, लेकिन वह अपनी जड़ों और अपनी माँ से बहुत प्यार करता है। उसकी माँ एक विधवा हैं और गाँव में अकेले रहती हैं। अनूप की एक बहन भी है जिसका नाम सुधा है। सुधा का विवाह हो चुका है और वह अपने पति अनिल के साथ कोलकाता में ही रहती है।
गाँव में रहने वाली अनूप की माँ को अब अपने बेटे के घर बसाने की चिंता सताने लगती है। वे चाहती हैं कि अनूप की शादी एक ऐसी लड़की से हो जो घर के कामकाज में माहिर हो और उनके बुढ़ापे का सहारा बने। उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाली एक लड़की विद्या को अनूप के लिए पसंद किया है। जब अनूप अपनी छुट्टियों में गाँव वापस आता है, तो उसकी माँ उसे शादी का प्रस्ताव देती हैं। अनूप अपनी माँ की बात का मान रखता है, लेकिन वह कहता है कि वह शादी तभी करेगा जब वह लड़की को खुद देख लेगा।
अनूप जब विद्या को देखने जाता है, तो वहाँ उसकी मुलाकात गाँव की एक चुलबुली और अल्हड़ लड़की मीनू से होती है। मीनू शारदा और रामचंद्र की बेटी है। मीनू का व्यक्तित्व विद्या से बिल्कुल अलग है। वह किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती और पूरे गाँव में अपनी मस्ती के लिए जानी जाती है। अनूप जब घर लौटता है, तो वह अपनी माँ को चौंका देता है। वह कहता है कि वह विद्या से शादी नहीं करेगा, बल्कि वह मीनू से शादी करना चाहता है। अनूप की माँ को यह सुनकर बहुत धक्का लगता है क्योंकि वे जानती थीं कि मीनू अभी बहुत छोटी और नासमझ है। लेकिन अनूप की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ता है और मीनू के साथ अनूप का विवाह संपन्न हो जाता है।
शादी के बाद जब मीनू अपने ससुराल आती है, तो असली समस्याएँ शुरू होती हैं। मीनू को घर के कामकाज का कोई ज्ञान नहीं है। उसे न तो खाना बनाना आता है और न ही वह यह समझती है कि पत्नी होने की क्या जिम्मेदारियाँ होती हैं। उसकी रुचि केवल बच्चों के साथ खेलने, पड़ोसियों के बाग से आम और अन्य फल चुराने में है। वह अक्सर घर से भागकर तालाब के किनारे या पेड़ों पर चढ़कर समय बिताती है। अनूप की माँ अपनी इस नई बहू की हरकतों से बहुत परेशान हो जाती हैं। उन्हें लगता है कि मीनू ने उनके घर की शांति भंग कर दी है। मजबूरी में वे मीनू पर पाबंदियां लगा देती हैं और उसे कमरे में बंद रखने की कोशिश करती हैं।
अनूप अपनी पत्नी के इस व्यवहार को देखकर दुखी तो होता है, लेकिन वह उसे समझने की कोशिश करता है। वह जानता है कि मीनू का मन अभी भी एक बच्चे जैसा है। जब अनूप की छुट्टियाँ खत्म होती हैं और उसके कोलकाता लौटने का समय आता है, तो वह मीनू से साथ चलने के लिए कहता है। उसे उम्मीद थी कि शहर जाकर मीनू शायद बदल जाए। लेकिन मीनू साफ़ मना कर देती है। वह कहती है कि उसे गाँव के पेड़ों और मैदानों को छोड़कर कहीं नहीं जाना। अनूप का दिल टूट जाता है और वह अकेला ही कोलकाता चला जाता है।
अनूप के जाने के बाद घर का माहौल और खराब हो जाता है। अनूप की माँ अब मीनू को बिल्कुल सहन नहीं कर पातीं। उन्हें लगता है कि मीनू की वजह से उनका बेटा उनसे दूर हो गया है। वे मीनू को उसके मायके यानी शारदा के घर छोड़ आती हैं। मीनू को शुरू में तो बहुत खुशी होती है कि वह फिर से आजाद हो गई है, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, उसे कुछ खालीपन महसूस होने लगता है।
गाँव के वही बच्चे जिनके साथ वह खेलती थी, अब उसे उतने अच्छे नहीं लगते। आम के बाग भी अब उसे आकर्षित नहीं करते। एकांत में बैठे हुए मीनू को अनूप की बातें और उसका प्यार याद आने लगता है। उसे पहली बार अहसास होता है कि वह अनूप से प्यार करती है और उसका असली घर उसके ससुराल में है। मीनू के भीतर एक बड़ा मानसिक बदलाव आता है। वह अपनी माँ शारदा से कहती है कि वह वापस अपने ससुराल जाना चाहती है और अपनी सास की सेवा करना चाहती है।
मीनू जब वापस अपने ससुराल पहुँचती है, तो वह एक बदली हुई मीनू होती है। वह अब घर के सारे काम सीख लेती है। वह सुबह जल्दी उठकर सफाई करती है, खाना बनाती है और अपनी सास का पूरा ख्याल रखती है। अनूप की माँ भी अपनी बहू का यह बदला हुआ रूप देखकर हैरान और खुश हो जाती हैं। वे मीनू को दिल से अपना लेती हैं। अब मीनू को केवल एक ही बात का इंतजार है—अनूप का वापस आना।
लेकिन अनूप गाँव वापस नहीं आता। यहाँ तक कि वह त्योहारों की छुट्टियों में भी नहीं आता। मीनू को अहसास होता है कि जब उसने अनूप के साथ कोलकाता जाने से मना किया था, तो उसने अनूप के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाई थी। अनूप ने जाते समय कहा था कि वह अब तभी आएगा जब मीनू खुद उसे खत लिखकर बुलाएगी। मीनू बहुत कोशिश करती है कि वह अनूप को खत लिखे, लेकिन उसे अनूप का कोलकाता वाला पता नहीं मालूम होता। वह तड़प कर रह जाती है।
मीनू की हालत देखकर उसकी सास को बहुत दुख होता है। वे समझ जाती हैं कि उनकी बहू अब पूरी तरह सुधर गई है और वह अपने पति के बिना नहीं रह पा रही है। वे एक योजना बनाती हैं और मीनू को लेकर कोलकाता जाने का फैसला करती हैं। वे अनूप की बहन सुधा के घर पहुँचती हैं। सुधा और उसका पति मीनू और उसकी सास का बहुत स्वागत करते हैं।
कोलकाता में अनूप को जब पता चलता है कि मीनू आई है, तो वह पहले तो थोड़ा सख्त होने का नाटक करता है। वह मीनू की परीक्षा लेना चाहता है। लेकिन जब वह देखता है कि मीनू अब वह अल्हड़ लड़की नहीं रही, बल्कि एक समझदार और प्रेम करने वाली पत्नी बन गई है, तो उसका गुस्सा पिघल जाता है। सुधा के घर के उस सुंदर माहौल में अनूप और मीनू का मिलन होता है। वे दोनों एक-दूसरे से अपनी गलतियों के लिए माफी माँगते हैं और अपने नए जीवन की शुरुआत करते हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार में धैर्य बहुत जरूरी है। मीनू का बचपना बुरा नहीं था, लेकिन रिश्तों की गहराई समझने के लिए परिपक्वता जरूरी थी। अनूप की माँ का गुस्सा भी गलत नहीं था, क्योंकि वे अपने बेटे का भला चाहती थीं। अंततः, सच्ची भावनाओं की जीत होती है। उपहार फिल्म केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह एक लड़की के औरत बनने और एक नासमझ मन के परिपक्व होने का सफर है।
राजश्री प्रोडक्शंस की यह फिल्म अपनी सादगी और पारिवारिक मूल्यों के लिए जानी जाती है। जया भादुड़ी ने मीनू के किरदार में जो जान फूँकी है, वह आज भी याद की जाती है। उनके अभिनय ने दिखाया कि कैसे एक छोटी सी लड़की अपनी मासूमियत और बाद में अपनी समझदारी से पूरे परिवार को जोड़ सकती है। फिल्म का संगीत और इसके बोल इस पूरी यात्रा को और भी भावुक बना देते हैं। यह कहानी टैगोर की लेखनी की शक्ति को भी दर्शाती है, जिसने मानवीय स्वभाव के इतने बारीक पहलुओं को इतनी खूबसूरती से कागज पर उतारा था।
इस फिल्म का हर दृश्य एक संदेश देता है कि रिश्तों को समय देना चाहिए। दबाव से किसी को नहीं बदला जा सकता, लेकिन प्यार और दूरी कभी-कभी इंसान को खुद को सुधारने का मौका देती है। मीनू और अनूप का मिलन केवल दो लोगों का मिलन नहीं है, बल्कि यह पुरानी परंपराओं और नई समझ का एक सुंदर मेल है। उपहार आज भी हिंदी सिनेमा की एक अनमोल रत्न मानी जाती है।



.jpg)

0 Comments