"THE GOLD MEDAL" - HINDI CLASSIC SPY-THRILLER FILM EXPLAIN / JEETENDRA / DHARMENDRA MOVIE




The Gold Medal is a 1984 Hindi-language spy film, produced by Sham Behl under the Time Films banner and directed by Ravikant Nagaich. It stars JeetendraRakhee GulzarShatrughan Sinha while Dharmendra in a special appearance. The music was composed by Shankar Jaikishan


सोने का पदक एक रहस्य और जासूसी से भरी कहानी है। यह कहानी देशभक्ति, सच्चाई, विश्वासघात और साहस की है। इसमें एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपने देश की रक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है। कहानी धीरे धीरे आगे बढ़ती है और हर कदम पर एक नया मोड़ लाती है। इसमें राजनीति है, अपराध है, चालाक लोग हैं और सच्चे दिल से देश की सेवा करने वाले लोग भी हैं।


कहानी की शुरुआत एक दुखद घटना से होती है। देश में एक बड़े मजदूर नेता थे जिनका नाम आचार्य था। वह गरीब मजदूरों के हक के लिए लड़ते थे। वे ईमानदार और साहसी आदमी थे। कई बड़े उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं को उनका सच बोलना पसंद नहीं था। एक दिन अचानक उनकी हत्या हो जाती है। यह खबर पूरे देश में आग की तरह फैल जाती है। लोग दुखी हो जाते हैं। मजदूर सड़कों पर उतर आते हैं। हर कोई जानना चाहता है कि यह हत्या किसने की।


सरकार इस मामले को बहुत गंभीरता से लेती है। देश की गुप्त सेवा के प्रमुख श्री डेविड इस मामले की जांच अपने हाथ में लेते हैं। श्री डेविड एक अनुभवी और समझदार अधिकारी हैं। उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन मामलों को सुलझाया है। उन्हें जल्दी ही एहसास हो जाता है कि यह साधारण हत्या नहीं है। इसके पीछे कोई बड़ा और खतरनाक गिरोह काम कर रहा है जो देश के हित के खिलाफ साजिश कर रहा है।


श्री डेविड अपने विभाग के एक होनहार युवा अधिकारी को बुलाते हैं। उसका नाम गोपाल है। गोपाल ईमानदार, निडर और तेज दिमाग वाला युवक है। उसने कई छोटे बड़े मामलों को सुलझाकर अपना नाम कमाया है। वह देश के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। श्री डेविड उसे आचार्य की हत्या की जांच का जिम्मा देते हैं। वह उसे बताते हैं कि यह मामला बहुत खतरनाक है और इसमें जान का खतरा भी हो सकता है।


गोपाल बिना डरे यह जिम्मेदारी स्वीकार कर लेता है। वह जानता है कि यह केवल एक हत्या की जांच नहीं है बल्कि देश को एक बड़ी साजिश से बचाने का काम है। वह जांच शुरू करता है। वह आचार्य के करीबी लोगों से बात करता है। वह उनके भाषणों, बैठकों और दुश्मनों के बारे में जानकारी जुटाता है। उसे धीरे धीरे कुछ सुराग मिलते हैं।


जांच के दौरान उसे पता चलता है कि कुछ अजीब लोग शहर के एक मशहूर नृत्य क्लब में अक्सर मिलते हैं। उस क्लब का नाम ईगल है। वहां अमीर लोग, नेता और कुछ संदिग्ध लोग आते हैं। गोपाल वहां जाने का फैसला करता है। वह अपनी पहचान छिपाकर वहां पहुंचता है। वहां संगीत बज रहा होता है और लोग नृत्य का आनंद ले रहे होते हैं।


वहीं उसकी नजर एक नर्तकी पर पड़ती है जिसका नाम बिंदु है। बिंदु बहुत सुंदर और आत्मविश्वासी लड़की है। वह वहां काम करती है लेकिन उसकी आंखों में एक रहस्य छिपा है। गोपाल को शक होता है कि वह केवल एक नर्तकी नहीं है। वह उससे दोस्ती करने की कोशिश करता है। कुछ मुलाकातों के बाद बिंदु उससे खुलने लगती है। वह इशारों में बताती है कि इस क्लब में कुछ गुप्त बैठकें होती हैं।


गोपाल को यकीन हो जाता है कि वह सही दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन उसे यह नहीं पता कि गिरोह के लोग उसकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। गिरोह का सरगना बहुत चालाक है। वह सामने नहीं आता। वह अपने आदमियों के जरिए काम करता है। उसका नाम कोई नहीं जानता। वह परछाई की तरह है।


एक रात अचानक शहर में सनसनी फैल जाती है। खबर आती है कि बिंदु की हत्या हो गई है। पुलिस मौके पर पहुंचती है और वहां से कुछ सबूत मिलते हैं जो सीधे गोपाल की ओर इशारा करते हैं। कुछ गवाह कहते हैं कि हत्या से पहले गोपाल को बिंदु के साथ देखा गया था। गोपाल हैरान रह जाता है। वह जानता है कि वह निर्दोष है। लेकिन सबूत उसके खिलाफ हैं।


पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए निकल पड़ती है। गोपाल समझ जाता है कि यह सब एक साजिश है। अगर वह गिरफ्तार हो गया तो सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी। वह छिपने का फैसला करता है। वह भूमिगत हो जाता है। अब वह एक भगोड़े की तरह जीने को मजबूर है। अखबारों में उसकी तस्वीर छपती है। लोग उसे हत्यारा समझने लगते हैं।


लेकिन गोपाल हार नहीं मानता। वह इस स्थिति को अपने पक्ष में करने का फैसला करता है। वह सोचता है कि जब सब उसे अपराधी समझ रहे हैं तो वह इसी बहाने गिरोह के करीब पहुंच सकता है। वह अपनी नई पहचान बनाता है। वह ऐसे लोगों से संपर्क करता है जो अपराध की दुनिया से जुड़े हैं। धीरे धीरे उसकी पहचान एक कठोर और निडर व्यक्ति के रूप में बनने लगती है।


गिरोह के कुछ लोग उससे संपर्क करते हैं। वे सोचते हैं कि जो आदमी पुलिस से बच सकता है वह उनके काम आ सकता है। वे उसे छोटे छोटे काम देते हैं। गोपाल बहुत सावधानी से हर काम करता है ताकि किसी को शक न हो। वह गिरोह के अंदर अपनी जगह बनाता जाता है। वह जानता है कि एक छोटी सी गलती उसकी जान ले सकती है।


इसी बीच श्री डेविड भी सच्चाई जानने की कोशिश कर रहे होते हैं। उन्हें विश्वास है कि गोपाल हत्यारा नहीं हो सकता। लेकिन उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं है। वे चुपचाप उसकी मदद करने की कोशिश करते हैं। वे पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और सही समय का इंतजार करते हैं।


गिरोह के अंदर गोपाल को पता चलता है कि आचार्य की हत्या एक बड़ी योजना का हिस्सा थी। गिरोह देश में अस्थिरता फैलाना चाहता है। वे मजदूरों और नेताओं के बीच झगड़ा कराना चाहते हैं ताकि देश कमजोर हो जाए। वे विदेशी ताकतों से भी जुड़े हुए हैं। उनका सरगना देश को नुकसान पहुंचाकर खुद लाभ कमाना चाहता है।


गोपाल को धीरे धीरे सरगना के करीब पहुंचने का मौका मिलता है। लेकिन गिरोह के अंदर भी विश्वासघात है। कुछ लोग दोहरा खेल खेल रहे हैं। कोई पुलिस को खबर देता है तो कोई सरगना को। हर कोई अपने लाभ के लिए काम कर रहा है। गोपाल एक जाल में फंसता जा रहा है जहां हर कदम पर धोखा है।


एक दिन उसे पता चलता है कि बिंदु की हत्या भी इसी गिरोह ने की थी। बिंदु ने कुछ सच जान लिया था और वह पुलिस को बताने वाली थी। इसलिए उसे मार दिया गया और इल्जाम गोपाल पर डाल दिया गया। यह जानकर गोपाल का संकल्प और मजबूत हो जाता है। वह तय करता है कि वह इस गिरोह का पर्दाफाश करके रहेगा।


आखिरकार वह उस जगह तक पहुंच जाता है जहां सरगना गुप्त बैठक करता है। वहां बड़े बड़े लोग मौजूद होते हैं। गोपाल सबूत इकट्ठा करता है। वह बातचीत को गुप्त रूप से दर्ज करता है। तभी एक आदमी को उस पर शक हो जाता है। माहौल बदल जाता है। हथियार निकल आते हैं।


गोपाल साहस से काम लेता है। वह सच्चाई सबके सामने रख देता है। वह बताता है कि कैसे यह गिरोह देश के खिलाफ साजिश कर रहा है। सरगना अपना असली चेहरा दिखाने पर मजबूर हो जाता है। वह एक प्रभावशाली और सम्मानित व्यक्ति निकलता है जिस पर किसी को शक नहीं था।


वह गोपाल को मारने की कोशिश करता है। दोनों के बीच संघर्ष होता है। उसी समय श्री डेविड और पुलिस वहां पहुंच जाते हैं। वे पहले से तैयार थे। गोपाल ने उन्हें संकेत भेज दिया था। पुलिस गिरोह के सभी लोगों को पकड़ लेती है। सरगना भी गिरफ्तार हो जाता है।


सच्चाई सामने आने पर गोपाल पर लगे सारे आरोप हट जाते हैं। लोग उसकी बहादुरी की सराहना करते हैं। सरकार उसे सम्मानित करती है। उसे सोने का पदक दिया जाता है। यह पदक केवल एक धातु का टुकड़ा नहीं होता बल्कि उसकी ईमानदारी, साहस और देशभक्ति का प्रतीक होता है।


कहानी का अंत इस संदेश के साथ होता है कि सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता। झूठ और साजिश कितनी भी बड़ी क्यों न हो, एक सच्चा और साहसी इंसान उसे उजागर कर सकता है। देश के लिए काम करने वाले सच्चे लोग कभी हार नहीं मानते। वे मुश्किलों का सामना करते हैं और अंत में जीत सच्चाई की ही होती है।

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