"PARAS" - HINDI CLASSICAL FAMILY ACTION DRAMA FILM / SANJEEV KUMAR / SHATRUGHAN SINHA / RAAKHEE




यह कहानी भारत के एक छोटे से गाँव से शुरू होती है जहाँ हरियाली और शांति है, लेकिन उसी शांति के पीछे अन्याय की एक गहरी छाया भी छिपी है। इस कहानी का मुख्य नायक धरम सिंह है, जिसका किरदार संजीव कुमार ने निभाया है। धरम सिंह एक सीधा-साधा, मेहनती और बहुत ही ईमानदार किसान है। वह अपनी जमीन से प्यार करता है और अपनी छोटी बहन बेला को अपनी जान से ज्यादा चाहता है। बेला का किरदार फरीदा जलाल ने निभाया है। बेला अब शादी के लायक हो चुकी है और धरम का सपना है कि वह अपनी बहन की शादी एक अच्छे घर में करे ताकि उसे जीवन भर की खुशियाँ मिल सकें। धरम सिंह गाँव के उन लोगों में से है जो अपनी मर्यादा और सच्चाई के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।


एक दिन की बात है, धरम और बेला अपने खेत की ओर जा रहे थे। अचानक उनकी आँखों के सामने एक खौफनाक वारदात होती है। वे देखते हैं कि एक आदमी दूसरे आदमी की बेरहमी से हत्या कर रहा है। यह कोई मामूली झगड़ा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया कत्ल था। धरम सिंह एक डरपोक इंसान नहीं था। उसने अपनी बहन का हाथ पकड़ा और बिना डरे कातिल का पीछा किया। वे दोनों उस कातिल को पकड़ने में कामयाब रहे और उसे घसीटते हुए पास के पुलिस स्टेशन ले गए। पुलिस ने उस आदमी को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में मामला दर्ज हो गया।


जैसे ही यह खबर गाँव में फैली, चारों तरफ सन्नाटा छा गया। वह कातिल कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह उस इलाके के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली व्यक्ति अर्जुन सिंह का छोटा भाई था। अर्जुन सिंह का किरदार मदन पुरी ने निभाया है। अर्जुन सिंह एक ऐसा इंसान है जिसे कानून का कोई डर नहीं है। वह पैसे और ताकत के दम पर किसी को भी झुकाने की ताकत रखता है। जब उसे पता चला कि उसके भाई को केवल एक मामूली किसान धरम और उसकी बहन बेला की गवाही के कारण जेल हुई है, तो उसका खून खौल उठा।


अर्जुन सिंह ने सबसे पहले धरम सिंह को खरीदने की कोशिश की। उसने धरम के पास अपने आदमी भेजे और उसे ढेर सारा पैसा और जमीन देने का लालच दिया। उसने कहा कि अगर वह और उसकी बहन अपनी गवाही बदल दें और अदालत में कह दें कि उन्होंने कुछ नहीं देखा, तो वे मालामाल हो जाएंगे। लेकिन धरम सिंह के लिए उसकी ईमानदारी और उस मरे हुए इंसान के प्रति न्याय सबसे ऊपर था। उसने अर्जुन सिंह के प्रस्ताव को लात मार दी और उसे साफ कह दिया कि वह अपनी सच्चाई का सौदा नहीं करेगा। धरम की इस हिम्मत ने अर्जुन सिंह के अहंकार को गहरी चोट पहुँचाई।


अदालत की कार्यवाही शुरू हुई और धरम सिंह ने बिना डरे जज के सामने सारी सच्चाई बयान कर दी। बेला ने भी अपने भाई का साथ दिया। गवाही इतनी मजबूत थी कि अदालत ने अर्जुन सिंह के भाई को दोषी पाया और उसे फांसी की सजा सुना दी। यह फैसला सुनते ही अर्जुन सिंह पागल हो गया। उसने भरी अदालत में धरम सिंह की ओर देखा और मन ही मन कसम खाई कि वह उसे और उसके परिवार को मिटा देगा। अब गाँव धरम के लिए सुरक्षित नहीं रह गया था। अर्जुन सिंह के गुंडे हर वक्त धरम और बेला की टोह में रहते थे।


अपनी और अपनी बहन की जान बचाने के लिए धरम सिंह ने एक बहुत ही भारी मन से फैसला लिया। उसने अपनी पुरखों की जमीन छोड़ी और रातों-रात गाँव से भागकर शहर जाने का निर्णय लिया। उसे लगा कि शहर की भीड़ में वह छिप जाएगा और मेहनत-मजदूरी करके पैसे कमाएगा ताकि बेला की शादी कर सके। लेकिन अर्जुन सिंह का बदला अभी पूरा नहीं हुआ था। जैसे ही धरम गाँव से निकला, अर्जुन सिंह के आदमियों ने धरम के घर को आग लगा दी। पूरा घर जलकर राख हो गया।


उसी रात, अर्जुन सिंह ने बेला का अपहरण कर लिया। वह बेला के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश करने लगा ताकि धरम सिंह को नीचा दिखा सके और उसकी बहन की इज्जत लूट सके। लेकिन बेला बहुत ही बहादुर लड़की थी। उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और किसी तरह अर्जुन सिंह के चंगुल से भाग निकली। वह घायल अवस्था में भागती रही और अंततः एक ट्रक में छिपकर शहर पहुँच गई। वह शहर की सड़कों पर भटकने लगी। उसे न तो शहर का रास्ता पता था और न ही यह पता था कि उसका भाई धरम कहाँ है।


महीनों बीत गए। बेला शहर में भीख माँगकर और छोटी-मोटी मजदूरी करके अपना पेट पाल रही थी। वह हर रोज हर गुजरते हुए आदमी के चेहरे में अपने भाई को तलाशती थी। एक दिन, उसकी नजर एक बड़ी और आलीशान गाड़ी पर पड़ी। गाड़ी में एक बहुत ही अमीर और रसूखदार आदमी बैठा था। बेला की आँखें फटी की फटी रह गई। वह आदमी कोई और नहीं, बल्कि उसका भाई धरम सिंह था। लेकिन उसका हुलिया पूरी तरह बदल चुका था। उसने महंगे कपड़े पहने थे और उसके चेहरे पर वह गाँव वाली सादगी नहीं थी। उसके साथ एक बहुत ही सुंदर और अमीर महिला बैठी थी जिसका नाम बरखा था। बरखा का किरदार राखी ने निभाया है।


बेला खुशी के मारे पागलों की तरह गाड़ी के पीछे भागी। उसने चिल्लाकर अपने भाई को आवाज दी, "भाई! ओ धरम भाई!" गाड़ी रुकी और धरम सिंह बाहर निकला। बेला दौड़कर उसके पैरों में गिर गई और रोते हुए अपनी सारी आपबीती सुनाने लगी। उसे लगा कि अब उसके सारे दुख खत्म हो गए हैं। लेकिन उसे जो जवाब मिला, उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। धरम सिंह ने उसे झटक दिया। उसने बेला की ओर अजनबी निगाहों से देखा और बहुत ही रूखे स्वर में कहा, "तुम कौन हो लड़की? मैं तुम्हें नहीं जानता। यहाँ से चली जाओ और मेरा रास्ता मत रोको।"


बेला को लगा जैसे उसके सिर पर आसमान टूट पड़ा हो। उसका वही भाई, जिसने उसकी रक्षा के लिए अपनी जमीन छोड़ दी थी, आज उसे पहचानने से इनकार कर रहा था। बरखा भी धरम के इस व्यवहार को देखकर थोड़ा हैरान थी, लेकिन धरम ने उसे समझा दिया कि यह कोई पागल लड़की है जो पैसों के लिए उसे अपना भाई बता रही है। धरम सिंह वहाँ से अपनी गाड़ी लेकर चला गया और बेला सड़क पर रोती रह गई।


कहानी यहाँ से एक बहुत ही गहरा रहस्य लेती है। क्या धरम सिंह वास्तव में अपनी बहन को भूल गया था? या फिर वह किसी बहुत बड़े मिशन पर था? जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, हमें शत्रुघ्न सिन्हा के किरदार के बारे में पता चलता है, जो धरम सिंह के इस नए जीवन और उसकी अमीर दुनिया का एक हिस्सा है। महमूद का किरदार फिल्म में कॉमेडी और हल्के पलों को जोड़ता है, लेकिन कहानी का मुख्य आधार धरम सिंह का यह बदलता हुआ व्यवहार ही रहता है।


बेला हार नहीं मानती। वह धरम के घर का पता लगा लेती है और बार-बार वहाँ जाती है। लेकिन हर बार उसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। धरम सिंह अब शहर का एक बहुत बड़ा व्यापारी बन चुका था और बरखा उससे प्यार करने लगी थी। बरखा को धीरे-धीरे शक होने लगता है कि धरम कुछ छुपा रहा है। वह बेला की तलाश करती है और उससे अकेले में मिलती है। बेला उसे गाँव की सारी कहानी सुनाती है। बरखा को अहसास होता है कि धरम सिंह वास्तव में वह नहीं है जो वह दिख रहा है।


असल में, धरम सिंह शहर इसलिए आया था ताकि वह अर्जुन सिंह के पूरे साम्राज्य को जड़ से उखाड़ सके। उसे पता चला था कि अर्जुन सिंह का काला कारोबार शहर तक फैला हुआ है। धरम ने अपनी पहचान बदली और एक अमीर आदमी का मुखौटा पहन लिया ताकि वह अर्जुन सिंह के करीब पहुँच सके और उसे कानून के हवाले कर सके। उसने अपनी बहन को पहचानने से इसलिए इनकार किया क्योंकि अगर अर्जुन सिंह को पता चल जाता कि बेला धरम के साथ है, तो वह उसे फिर से निशाना बनाता। धरम सिंह अपनी बहन की सुरक्षा के लिए ही उससे अजनबी बन गया था। यह एक बहुत बड़ा बलिदान था जो वह अकेले ही झेल रहा था।


फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही जबरदस्त है। अर्जुन सिंह को जब धरम की असलियत पता चलती है, तो वह बरखा और बेला दोनों को बंदी बना लेता है। धरम सिंह को अपनी पहचान उजागर करनी पड़ती है और एक आखिरी जंग शुरू होती है। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा का किरदार भी धरम की मदद करता है। जबरदस्त लड़ाई और एक्शन के बाद, धरम सिंह अर्जुन सिंह को धूल चटा देता है। पुलिस आती है और अर्जुन सिंह को उसके सभी अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है।


अंत में, धरम सिंह रोते हुए अपनी बहन बेला को गले लगा लेता है। वह उससे माफी माँगता है कि उसे इतना दुख पहुँचाना पड़ा। बेला को समझ आता है कि उसका भाई कभी उसे भूल नहीं सकता था। बरखा और धरम का मिलन होता है और बेला की शादी भी एक अच्छे घर में तय हो जाती है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि कभी-कभी सच्चाई की जीत के लिए हमें अपनों से भी दूर होना पड़ता है और एक कठिन रास्ता चुनना पड़ता है। संजीव कुमार के अभिनय ने इस फिल्म को अमर बना दिया है।


यह कहानी न्याय, धैर्य और भाई-बहन के अटूट प्रेम की एक महान गाथा है। सत्तर के दशक की इस फिल्म ने दिखाया कि एक साधारण किसान भी अगर ठान ले, तो वह बड़े से बड़े जालिम का साम्राज्य खत्म कर सकता है। पारस का अर्थ होता है वह पत्थर जो लोहे को सोना बना दे, और इस फिल्म में धरम सिंह का चरित्र भी वैसा ही है जो अपनी ईमानदारी से परिस्थितियों को बदल देता है।

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