"DOOR KA RAAHI" - HINDI CLASSICAL DRAMA FILM / KISHORE KUMAR / ASHOK KUMAR MOVIE



Door Ka Raahi is a 1971 Indian Hindi-language drama film directed by Kishore Kumar. The film stars TanujaKishore Kumar and Ashok Kumar. The film is a great depiction of the directorial abilities of Kishore Kumar and his vision of the eternal world. The film strives to deliver a very strong message to humanity using the simplest possible language. This film was adapted from an American movie called Shane 1953 directed and produced by George Stevens and Kishore Kumar was heavily influenced from the film Shane, and made this film based on it.


एक समय की बात है। दूर दूर तक फैले पहाड़ों और मैदानों के बीच एक लंबी सड़क थी। उस सड़क पर कभी कभी कोई मुसाफिर दिखाई देता था। उसी रास्ते पर एक दिन एक आदमी चलता हुआ दिखाई देता है। उसका नाम प्रशांत था। वह साधारण कपड़े पहने हुए था और उसके चेहरे पर शांति भी थी और थकान भी। उसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी जैसे वह बहुत कुछ देख चुका हो और बहुत कुछ समझ चुका हो।


प्रशांत कोई साधारण यात्री नहीं था। वह एक ऐसी यात्रा पर निकला हुआ था जिसका कोई निश्चित अंत नहीं था। वह एक जगह से दूसरी जगह जाता रहता था। वह किसी एक घर में या किसी एक शहर में लंबे समय तक नहीं रुकता था। लोग अक्सर उससे पूछते थे कि वह कहाँ जा रहा है, लेकिन वह मुस्कुराकर कह देता था कि वह बस रास्ते पर चल रहा है।




प्रशांत का मानना था कि जीवन एक यात्रा है। इंसान को चलते रहना चाहिए। रास्ते में जो भी लोग मिलते हैं, उनसे प्रेम और दया के साथ पेश आना चाहिए। अगर कहीं किसी को दुख हो, तो उसकी मदद करनी चाहिए। यही उसका जीवन का नियम था। एक दिन वह एक छोटे से गाँव के पास पहुँचा। गाँव के चारों ओर खेत थे और दूर पहाड़ दिखाई देते थे। गाँव में साधारण लोग रहते थे जो खेती करके अपना जीवन चलाते थे। जब लोग उस अजनबी को गाँव में आते देखते हैं तो कुछ लोग हैरान होते हैं। कुछ लोग उसे संदेह की नजर से देखते हैं और कुछ लोग उसे सहानुभूति से देखते हैं।


गाँव के बीच में एक छोटा सा घर था जहाँ एक लड़की रहती थी जिसका नाम गीता था। गीता का स्वभाव बहुत सरल था। वह अपने परिवार के साथ रहती थी और गाँव के लोगों की मदद करती रहती थी। जब उसने प्रशांत को देखा तो उसे लगा कि यह आदमी बहुत थका हुआ है। वह उसके पास गई और उससे पूछा कि क्या उसे पानी चाहिए। प्रशांत ने मुस्कुराकर पानी ले लिया और धन्यवाद कहा। गीता ने देखा कि उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति है। उसने पूछा कि वह कहाँ से आया है। प्रशांत ने धीरे से कहा कि वह बहुत दूर से आया है और अभी उसे बहुत दूर जाना है।




गाँव के कुछ लोग उस आदमी के बारे में बातें करने लगे। कुछ लोग कहते थे कि शायद वह कोई साधु है। कुछ लोग कहते थे कि शायद वह कोई भटका हुआ आदमी है। लेकिन धीरे धीरे लोगों को समझ में आने लगा कि प्रशांत का दिल बहुत साफ है। प्रशांत कुछ दिन गाँव में रुक गया। वह गाँव के लोगों के साथ बैठकर बातें करता। वह बच्चों को हंसाता और बूढ़ों की बातें ध्यान से सुनता। अगर किसी के घर में कोई परेशानी होती तो वह मदद के लिए आगे आता।


गाँव में एक बूढ़े आदमी भी रहते थे जो बहुत समझदार थे। उनका नाम दयानाथ था। उन्होंने कई साल दुनिया देखी थी और लोगों के स्वभाव को अच्छी तरह समझते थे। जब उन्होंने प्रशांत से बात की तो उन्हें लगा कि यह आदमी साधारण नहीं है। एक दिन दयानाथ ने उससे पूछा कि वह क्यों इस तरह एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहता है। प्रशांत ने धीरे से कहा कि दुनिया में बहुत दुख है। बहुत लोग अकेले हैं और बहुत लोग परेशान हैं। अगर वह किसी के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कान ला सके तो उसे लगता है कि उसकी यात्रा सफल हो गई।


दयानाथ ने उसकी बात सुनी और कुछ देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसे लोगों की जरूरत है जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए सोचते हैं। गाँव में एक और आदमी था जिसका स्वभाव थोड़ा कठोर था। वह हमेशा अपने फायदे के बारे में सोचता था। उसे यह अच्छा नहीं लगता था कि गाँव के लोग उस अजनबी की इतनी इज्जत कर रहे हैं। वह मन ही मन उससे नाराज रहने लगा। एक दिन उसने प्रशांत से कहा कि उसे यहाँ ज्यादा दिन नहीं रहना चाहिए। उसने कहा कि गाँव में हर आदमी को अपने काम से मतलब रखना चाहिए। प्रशांत ने उसकी बात शांतिपूर्वक सुनी और मुस्कुरा दिया। उसने कोई बहस नहीं की।




गीता यह सब देखती रहती थी। उसे लगता था कि प्रशांत बहुत अलग तरह का आदमी है। वह हमेशा शांत रहता था और किसी से गुस्सा नहीं करता था। धीरे धीरे गीता और प्रशांत के बीच दोस्ती हो गई। वे अक्सर शाम को गाँव के बाहर बैठकर बातें करते थे। प्रशांत उसे जीवन के बारे में अपने विचार बताता था। वह कहता था कि जीवन में दुख और सुख दोनों आते हैं। लेकिन इंसान को अपने दिल को कठोर नहीं बनने देना चाहिए। गीता उसकी बातें सुनकर बहुत प्रभावित होती थी। उसे लगता था कि वह आदमी दुनिया को एक अलग नजर से देखता है।


कुछ दिनों बाद गाँव में एक समस्या पैदा हो गई। कुछ ताकतवर लोग गाँव की जमीन पर कब्जा करना चाहते थे। वे चाहते थे कि किसान अपनी जमीन छोड़ दें। इससे गाँव के लोग बहुत डर गए। प्रशांत ने जब यह बात सुनी तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने गाँव वालों से कहा कि उन्हें एकजुट रहना चाहिए और डरना नहीं चाहिए। उसने उन्हें हिम्मत दी और समझाया कि अगर सब लोग साथ खड़े रहें तो कोई उनका नुकसान नहीं कर सकता। धीरे धीरे गाँव के लोगों का डर कम होने लगा। उन्होंने एक दूसरे का साथ देना शुरू किया। यह देखकर वे लोग जो जमीन पर कब्जा करना चाहते थे, पीछे हट गए।


गाँव में खुशी का माहौल हो गया। लोगों को लगा कि उस अजनबी ने उन्हें हिम्मत दी है। अब वे उसे और भी ज्यादा सम्मान देने लगे। लेकिन प्रशांत का मन जानता था कि वह यहाँ हमेशा नहीं रह सकता। उसकी यात्रा अभी बाकी थी। एक रात उसने चुपचाप आसमान की ओर देखा। तारों से भरा आकाश बहुत सुंदर लग रहा था। उसे लगा कि जैसे पूरी दुनिया एक लंबा रास्ता है और हर इंसान उस रास्ते का यात्री है। कोई थोड़ी दूर चलता है, कोई ज्यादा दूर। लेकिन यात्रा कभी रुकती नहीं। अगली सुबह उसने गीता और दयानाथ से कहा कि अब उसे आगे जाना होगा। यह सुनकर गीता की आंखें भर आईं। उसने कहा कि क्या वह वापस आएगा।


प्रशांत ने मुस्कुराकर कहा कि शायद एक दिन फिर मिलना हो जाए। दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन रास्ते कभी कभी फिर मिल जाते हैं। गाँव के लोग उसे विदा करने आए। सबके मन में उसके लिए सम्मान था। वह धीरे धीरे उसी लंबी सड़क पर आगे बढ़ गया। रास्ते पर चलते हुए उसके मन में कई विचार आते रहे। उसे लगा कि जीवन का असली अर्थ दूसरों के लिए जीने में है। अगर इंसान अपने दिल को साफ रखे और दूसरों के दुख को समझे तो दुनिया थोड़ी बेहतर हो सकती है। प्रशांत चलता रहा। पहाड़ पीछे छूटते गए और नए रास्ते सामने आते गए। कहीं उसे नए लोग मिलते, कहीं नई कहानियाँ सुनने को मिलतीं। वह हर जगह थोड़ी देर रुकता और फिर आगे बढ़ जाता।


उसकी यात्रा का कोई निश्चित लक्ष्य नहीं था। शायद वही उसकी यात्रा का सबसे बड़ा सच था। इंसान की आत्मा भी इसी तरह एक अनंत यात्रा पर होती है। उसे नहीं पता होता कि उसका अंतिम पड़ाव कहाँ है। प्रशांत को भी यह नहीं पता था कि उसका रास्ता कहाँ जाकर खत्म होगा। लेकिन उसे इतना जरूर पता था कि जब तक उसके कदम चल सकते हैं, वह चलता रहेगा। उसके दिल में एक ही विश्वास था कि जीवन को रुकना नहीं चाहिए। दुख आए तो भी चलना चाहिए और सुख आए तो भी चलना चाहिए।


इस तरह वह मुसाफिर दूर दूर तक चलता गया। पीछे रह गए गाँव के लोग उसे याद करते रहे। गीता भी कभी कभी उस सड़क की ओर देखती थी जहाँ से वह चला गया था। लेकिन प्रशांत के लिए दुनिया एक लंबी राह थी और वह उस राह का यात्री था। वह चलता रहा, लोगों से मिलता रहा, और अपने सरल शब्दों से उन्हें जीवन का अर्थ समझाने की कोशिश करता रहा। उसकी कहानी किसी एक जगह की नहीं थी। वह हर उस इंसान की कहानी थी जो जीवन के रास्ते पर चलते हुए अपने भीतर के सच को खोजने की कोशिश करता है। उसकी यात्रा शायद कभी खत्म नहीं होती, क्योंकि इंसान की आत्मा की यात्रा भी अनंत होती है।

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