"TERE MERE SAPNE" - HINDI CLASSICAL ROMANTIC MOVIE / DEV ANAND & HEMA MALINI MOVIE



Tere Mere Sapne is a 1971 film produced by Dev Anand, and written and directed by his brother Vijay Anand for Navketan Films. The movie stars Dev AnandMumtazHema Malini and Vijay Anand in key roles. The film's music is by S. D. Burman and the story is based on The Citadel, a novel by A.J. Cronin. In 1972, it was made as Bengali film Jiban Saikate, with Soumitra Chatterjee and Aparna Sen and in 1982, it was remade into the Telugu film Madhura Swapnam.


'तेरे मेरे सपने' वर्ष 1971 में बनी एक कालजयी फिल्म है, जिसे देव आनंद के 'नवकेतन फिल्म्स' के बैनर तले बनाया गया था। इस फिल्म के निर्माता स्वयं देव आनंद थे, जबकि इसके निर्देशन और पटकथा की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई विजय आनंद ने संभाली थी। यह फिल्म ए. जे. क्रोनिन के प्रसिद्ध उपन्यास 'द सिटाडेल' (The Citadel) पर आधारित है। फिल्म में देव आनंद, मुमताज, हेमा मालिनी और स्वयं विजय आनंद मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म का संगीत महान संगीतकार एस. डी. बर्मन ने दिया है, जिसके गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। यह फिल्म एक डॉक्टर के संघर्ष, उसकी महत्वाकांक्षा और अंततः मानवीय मूल्यों की जीत की कहानी है।


कहानी की शुरुआत डॉ. आनंद कुमार (देव आनंद) से होती है। आनंद एक आदर्शवादी और मेधावी युवक है, जो एक छोटे से गाँव में अपनी चिकित्सा सेवा शुरू करने का सपना देखता है। उसका मानना है कि असली सेवा तो गाँव के उन गरीब लोगों की है जिन्हें शहरों में उचित इलाज नहीं मिल पाता। आनंद स्वभाव से बहुत ही सीधा और नेकदिल है। वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर छोड़कर एक सुदूर गाँव में अपनी प्रैक्टिस शुरू करता है। गाँव का वातावरण बहुत ही पिछड़ा हुआ है और वहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। आनंद वहां लोगों के बीच रहकर उनके दुख-दर्द को समझना चाहता है।


इसी दौरान आनंद की मुलाकात गाँव की एक बेहद सरल और प्यारी शिक्षिका, निशा (मुमताज) से होती है। निशा अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ाने और गाँव के लोगों की मदद करने में अपना समय व्यतीत करती है। धीरे-धीरे आनंद और निशा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगती हैं। उनकी मुलाकातें प्यार में बदल जाती हैं और वे एक-दूसरे के साथ जीवन बिताने का सपना देखने लगते हैं। आनंद अपनी सेवा और अपनी सादगी से गाँव के लोगों का दिल जीत लेता है। लेकिन उसके लिए अपनी प्रैक्टिस को जमाना इतना आसान नहीं था। गाँव के लोगों के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे और सरकारी सिस्टम भी बहुत लचर था।


आनंद की मेहनत रंग लाती है और वह धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगता है। निशा का साथ उसे हर कदम पर हिम्मत देता है। वे एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं और उनका छोटा सा संसार खुशियों से भर जाता है। हालांकि, आनंद के पास अभी भी कोई बड़ी आर्थिक सुरक्षा नहीं थी। जीवन की कठिनाइयों को देखते हुए, वे शहर जाने का फैसला करते हैं ताकि वहां बेहतर कमाई कर सकें और अपनी पत्नी को एक अच्छा जीवन दे सकें। शहर पहुँचकर आनंद की जिंदगी बिल्कुल बदल जाती है। वहां का वातावरण गाँव से बिल्कुल अलग था।


शहर में आनंद की मुलाकात डॉ. प्रशांत (विजय आनंद) से होती है, जो उसका एक पुराना सहपाठी था। प्रशांत एक बहुत ही व्यावहारिक और पैसा कमाने वाला डॉक्टर है। वह आनंद को बताता है कि शहर में सफल होने के लिए सेवा से ज्यादा चालाकी की जरूरत है। प्रशांत उसे बड़े रसूखदार लोगों और अमीरों का इलाज करने की सलाह देता है। आनंद धीरे-धीरे अपनी आदर्शवादी विचारधारा से भटकने लगता है। वह देखता है कि जो डॉक्टर पैसे के पीछे भाग रहे हैं, वे बहुत जल्दी अमीर हो रहे हैं। वह भी एक बड़ा डॉक्टर बनने की महत्वाकांक्षा में फंस जाता है।


महत्वाकांक्षा के इस सफर में आनंद का सामना एक अमीर महिला माला (हेमा मालिनी) से होता है। माला शहर की एक प्रसिद्ध हस्ती है और वह आनंद की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे अपनी ओर आकर्षित करती है। माला की चकाचौंध भरी दुनिया आनंद को एक ऐसी दिशा में ले जाती है जहां वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों और अपनी पत्नी निशा को भूलने लगता है। निशा, जो अभी भी उसी सादगी को जी रही थी, अपने पति के बदले हुए व्यवहार से बहुत दुखी होती है। वह देखती है कि जिस आनंद से उसने प्यार किया था, वह अब पैसा और शोहरत पाने की होड़ में अपने आप को खो चुका है।


फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आनंद का वह द्वंद्व है, जहाँ वह अपनी नैतिकता और सफलता के बीच चुनाव करता है। उसे अहसास होता है कि जिस चिकित्सा सेवा को उसने मानवता की सेवा के लिए चुना था, उसे वह केवल मुनाफे का जरिया बना चुका है। डॉक्टर प्रशांत के साथ काम करते हुए उसे कई ऐसे गलत तरीके अपनाने पड़ते हैं जिससे उसका मन भारी रहता है। माला के साथ बढ़ते उसके रिश्ते उसके वैवाहिक जीवन में दरार डाल देते हैं। निशा उसे कई बार चेतावनी देती है, लेकिन वह सफलता के नशे में चूर हो जाता है।


कहानी में एक बड़ा मोड़ तब आता है जब आनंद को अपनी एक बड़ी गलती का अहसास होता है। वह देखता है कि कैसे भ्रष्टाचार और पैसे की भूख ने उसे एक ऐसे इंसान में बदल दिया है जिससे वह खुद नफरत करता है। वह अपने किए पर पछताता है और फिर से वही पुराना आनंद बनना चाहता है जो गाँव के गरीबों के लिए जीता था। इस बदलाव की प्रक्रिया में उसे बहुत कुछ खोना पड़ता है। उसकी प्रतिष्ठा, उसकी धन-दौलत और यहाँ तक कि उसके रसूखदार दोस्त भी उसके खिलाफ हो जाते हैं।


निशा इस पूरे सफर में एक चट्टान की तरह उसके साथ खड़ी रहती है। उसे पता होता है कि उसका पति गलत रास्ते पर है, लेकिन वह उसे सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ती। आनंद की वापसी का रास्ता बहुत कठिन है। उसे उन लोगों से माफी मांगनी पड़ती है जिन्हें उसने अपनी महत्वाकांक्षा के लिए नजरअंदाज किया था। वह अपनी सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर फिर से उसी सादगी भरे जीवन की ओर लौटता है। फिल्म का अंत बहुत ही मार्मिक है जहाँ आनंद को समझ आता है कि 'सपने' वे नहीं हैं जो बंद आंखों से देखे जाएं, बल्कि वे हैं जो इंसान के आत्म-सम्मान और सेवा की भावना से पूरे हों।


फिल्म का संगीत, जिसे एस. डी. बर्मन ने तैयार किया है, कहानी की गंभीरता को बहुत अच्छे से व्यक्त करता है। गीत जैसे 'जीवन की बगिया महकेगी' और 'तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं' फिल्म के रोमांटिक और भावुक पहलुओं को छूते हैं। देव आनंद का अभिनय इस फिल्म में बहुत ही परिपक्व है। उन्होंने एक डॉक्टर की उलझन को बखूबी निभाया है। मुमताज ने निशा के किरदार में बहुत गहराई और सादगी भरी है, जो दर्शकों के मन पर गहरा असर छोड़ती है। विजय आनंद का अभिनय भी अपने आप में एक मिसाल है।


फिल्म 'तेरे मेरे सपने' मानवीय महत्वाकांक्षा और नैतिकता के बीच के संघर्ष का एक बेहतरीन चित्रण है। यह फिल्म आज के दौर में भी प्रासंगिक है, जहाँ लोग अपने सपनों को पाने के लिए अक्सर सही और गलत के फर्क को भूल जाते हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि अंत में शांति और सुकून केवल सच्चाई के रास्ते पर चलकर ही मिलता है।


विजय आनंद का निर्देशन इस फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाता है। हर दृश्य बहुत सलीके से फिल्माया गया है। फिल्म की पटकथा में जो उतार-चढ़ाव हैं, वे दर्शकों को अंत तक बांधे रखते हैं। 'द सिटाडेल' उपन्यास का यह रूपांतरण भारतीय दर्शकों के अनुकूल बहुत ही खूबसूरती से ढाला गया है।


अंततः, यह फिल्म इस बात का प्रतीक है कि जीवन की असली सफलता धन जोड़ने में नहीं, बल्कि उन लोगों के दिल जीतने में है जिनके लिए हम कुछ अच्छा कर सकते हैं। डॉ. आनंद की यह यात्रा हम सभी के लिए एक सीख है कि हम जीवन में चाहे कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न पहुँच जाएँ, हमें कभी भी अपनी सच्चाई और अपने प्यार को नहीं भूलना चाहिए। 'तेरे मेरे सपने' न केवल एक फिल्म है, बल्कि यह एक जीवन दर्शन है जिसे हर पीढ़ी को देखना चाहिए।


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