"SHARMEELEE" - HINDI CLASSICAL ROMANTIC ACTION FILM / SHASHI KAPOOR MOVIE




 यह कहानी भारतीय सिनेमा के उस दौर की है जब संगीत, भावनाएं और पारिवारिक संस्कार फिल्मों की जान हुआ करते थे। फिल्म शर्मीली साल 1971 में पर्दे पर आई थी। इस फिल्म का निर्माण सुबोध मुखर्जी ने किया था और इसका निर्देशन समीर गांगुली ने किया था। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मुख्य अभिनेत्री राखी थीं, जिन्होंने इस फिल्म में दोहरी भूमिका निभाई थी। एक तरफ उन्होंने कंचन नाम की एक बहुत ही शर्मीली और संस्कारी लड़की का किरदार निभाया, तो दूसरी तरफ उन्होंने कामिनी नाम की एक आधुनिक और चुलबुली लड़की की भूमिका अदा की। इस फिल्म की भारी सफलता ने राखी को उस दशक की सबसे बड़ी अभिनेत्रियों की कतार में खड़ा कर दिया। फिल्म में उनके साथ सदाबहार अभिनेता शशि कपूर थे, जिनकी मुस्कुराहट और अभिनय ने दर्शकों का दिल जीत लिया था। फिल्म का संगीत एस. डी. बर्मन ने दिया था, जिसके गीत आज भी लोगों की जुबान पर बसे हुए हैं।


कहानी की शुरुआत एक बहुत ही रोमांटिक और हल्के-फुल्के अंदाज में होती है। कैप्टन अजीत कपूर (शशि कपूर) भारतीय सेना में एक बहादुर अधिकारी हैं। एक बार जब वे अपनी ड्यूटी पूरी करके आर्मी बेस से वापस लौट रहे होते हैं, तो रास्ते में एक पहाड़ी इलाके के विश्राम गृह (रेस्ट हाउस) में रुकते हैं। वहां एक शानदार पार्टी चल रही होती है। उस पार्टी के शोर-शराबे और रौनक के बीच अजीत की नजर एक बहुत ही सुंदर और बिंदास लड़की पर पड़ती है। वह लड़की बेहद आधुनिक कपड़ों में थी, गाना गा रही थी और नाच रही थी। अजीत उसकी सुंदरता और उसके खुले मिजाज से पहली नजर में ही प्रभावित हो जाते हैं। उन दोनों के बीच एक छोटी सी मुलाकात होती है, जिसमें अजीत अपना दिल हार बैठते हैं। हालांकि वे उस समय एक-दूसरे के बारे में ज्यादा नहीं जान पाते, लेकिन अजीत के मन में उस लड़की की छवि बस जाती है।


जब अजीत अपने घर पहुँचते हैं, तो उनके संरक्षक और अभिभावक फादर जोसेफ (नजीर हुसैन) उनका स्वागत करते हैं। फादर जोसेफ ने ही अजीत को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वे चाहते थे कि अब अजीत का विवाह हो जाए और उनका घर बस जाए। फादर जोसेफ अजीत को बताते हैं कि उन्होंने उनके लिए एक बहुत ही अच्छी लड़की पसंद की है। अजीत शुरू में थोड़ा झिझकते हैं, लेकिन जब वे फादर जोसेफ के साथ लड़की देखने जाते हैं, तो वहां पहुँचते ही उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वहां जो लड़की उनके सामने आती है, उसका नाम कंचन था। कंचन को देखते ही अजीत को लगता है कि यह वही लड़की है जिससे वे उस पहाड़ी रेस्ट हाउस की पार्टी में मिले थे। कंचन का चेहरा हुबहू उस लड़की जैसा था। अजीत को लगता है कि किस्मत ने उन्हें उनके प्यार से मिला दिया है। वे तुरंत शादी के लिए अपनी मंजूरी दे देते हैं।


शादी की तैयारियां बड़े जोर-शोर से शुरू हो जाती हैं। अजीत बहुत खुश थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें कुछ अजीब महसूस होने लगता है। जिस कंचन से उनका रिश्ता तय हुआ था, वह बहुत ही शांत, शर्मीली और कम बोलने वाली लड़की थी। वह हमेशा साड़ी पहनती थी और घर के कामों में व्यस्त रहती थी। अजीत को लगा कि शायद शादी तय होने की वजह से वह थोड़ा शर्मा रही है। लेकिन जल्द ही एक बहुत बड़ा सच सामने आता है। अजीत को पता चलता है कि कंचन वह लड़की नहीं है जिससे वे पार्टी में मिले थे। दरअसल, कंचन की एक जुड़वां बहन है जिसका नाम कामिनी है। अजीत जिस लड़की के प्यार में पड़े थे, वह कामिनी थी। कामिनी और कंचन जुड़वां होने के कारण दिखने में बिल्कुल एक जैसी थीं, लेकिन उनके स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था।


यह सच सामने आने पर अजीत और कंचन दोनों के परिवारों में खलबली मच जाती है। कंचन, जो मन ही मन अजीत को पसंद करने लगी थी, यह जानकर टूट जाती है कि अजीत वास्तव में उसकी बहन कामिनी से प्यार करते हैं। कंचन एक बहुत ही त्याग करने वाली और नेक लड़की है। वह अपने दुख को दबाकर यह फैसला करती है कि उसकी बहन कामिनी की खुशी ही सबसे बढ़कर है। वह चाहती है कि अजीत और कामिनी का विवाह हो जाए। अजीत भी दुविधा में पड़ जाते हैं, लेकिन जब वे फिर से कामिनी से मिलते हैं, तो उनकी पुरानी भावनाएं जाग उठती हैं। कामिनी भी अजीत को पहचान लेती है, लेकिन उसका व्यवहार अब वैसा नहीं था जैसा पार्टी में था। वह कुछ परेशान और डरी हुई लग रही थी। वह बार-बार अजीत को खुद से दूर करने की कोशिश करती है और उन पर भावनात्मक प्रहार करती है।


यहीं से फिल्म की कहानी एक बहुत बड़ा मोड़ लेती है। जहाँ अब तक यह एक रोमांटिक ड्रामा लग रहा था, वहीं अब यह एक रहस्यमयी जासूसी फिल्म (स्पाइ थ्रिलर) में बदल जाता है। अजीत के आर्मी कर्नल उन्हें अचानक सेना के मुख्यालय बुलाते हैं। वहां उन्हें एक बहुत ही गुप्त मिशन के बारे में बताया जाता है। कर्नल अजीत को जानकारी देते हैं कि देश की सीमाओं पर कुछ संदिग्ध गतिविधियाँ हो रही हैं और एक महिला जासूस दुश्मन देश को भारत की महत्वपूर्ण सैन्य जानकारियां पहुँचा रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उस महिला जासूस का हुलिया बिल्कुल कंचन और कामिनी से मिलता-जुलता था। सेना के पास जो धुंधली तस्वीरें और सुराग थे, वे सीधे तौर पर उसी परिवार की ओर इशारा कर रहे थे।


अजीत के सामने अब एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। एक तरफ उनका देश के प्रति कर्तव्य था और दूसरी तरफ उनका प्यार। क्या उनकी होने वाली पत्नी या उसकी बहन वास्तव में एक जासूस है? क्या कामिनी किसी खतरनाक साजिश का हिस्सा है? अजीत चुपके से अपनी जांच शुरू करते हैं। इस दौरान उन्हें पता चलता है कि कामिनी वास्तव में कुछ अपराधी तत्वों और देशद्रोहियों के चंगुल में फंसी हुई है। रंजीत (जिन्होंने इस फिल्म से अपने करियर की शुरुआत की थी) एक नकारात्मक भूमिका में हैं, जो कामिनी को ब्लैकमेल कर रहा था। कामिनी की बेबाकी और आधुनिकता का फायदा उठाकर उसे एक जाल में फंसा लिया गया था।


जैसे-जैसे रहस्य की परतें खुलती हैं, कहानी में रोमांच बढ़ता जाता है। अजीत को पता चलता है कि कंचन, जो अब तक केवल एक 'शर्मीली' लड़की मानी जा रही थी, वास्तव में बहुत बहादुर है। जब उसे अपनी बहन की मुसीबत का पता चलता है, तो वह उसकी जगह लेने और दुश्मनों को चकमा देने का साहस दिखाती है। फिल्म के दूसरे भाग में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ दर्शक भ्रमित हो जाते हैं कि पर्दे पर दिखने वाली लड़की कंचन है या कामिनी। राखी ने इन दोनों चरित्रों के बीच के बारीक अंतर को अपनी आंखों और हाव-भाव से बहुत ही खूबसूरती से निभाया है।


फिल्म का संगीत कहानी के रहस्यों को और अधिक प्रभावी बनाता है। 'खिलते हैं गुल यहाँ', 'ओ मेरी शर्मीली' और 'आज मदहोश हुआ जाए रे' जैसे गाने न केवल मधुर हैं, बल्कि वे पात्रों की मानसिक स्थिति को भी दर्शाते हैं। अंतिम दृश्यों में एक जबरदस्त एक्शन मुकाबला होता है जहाँ अजीत अपनी जान जोखिम में डालकर असली गद्दारों का पर्दाफाश करते हैं और कामिनी को उनके चंगुल से छुड़ाते हैं।


अंत में, सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। अजीत को समझ आता है कि सुंदरता केवल चेहरे में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और सच्चाई में होती है। कंचन और कामिनी दोनों का अपना-अपना महत्व है। कंचन का त्याग और उसकी बहादुरी अजीत की नजरों में उसे और ऊंचा कर देती है। फिल्म एक बहुत ही सुखद मोड़ पर समाप्त होती है, जहाँ बुराई की हार होती है और परिवार फिर से एकजुट हो जाता है।


शर्मीली एक ऐसी फिल्म है जो हमें सिखाती है कि किसी भी इंसान को उसके बाहरी स्वरूप से नहीं आंकना चाहिए। यह फिल्म भारतीय नारी के दो अलग-अलग रूपों—एक जो परंपराओं से बंधी है और दूसरी जो आधुनिकता की ओर बढ़ रही है—का बहुत ही सुंदर चित्रण करती है। सत्तर के दशक की इस फिल्म का जादू आज भी बरकरार है और इसे हिंदी सिनेमा की बेहतरीन मसाला फिल्मों में गिना जाता है। इसमें प्यार भी है, बलिदान भी है, और देशभक्ति का जज्बा भी। यह कहानी आज भी हमें याद दिलाती है कि सच्चाई की राह कितनी भी कठिन क्यों न हो, अंत में जीत उसी की होती है।


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