"PAKEEZAH" - EVERGREEN CLASSICAL HINDI ROMANTIC FAMILY DRAMA FILM / RAAJ KUMAR & MEENA KUMARI MOVIE




यह कहानी लखनऊ की गलियों, वहां के कोठों और समाज की उन दीवारों के बारे में है जिन्हें तोड़ना एक तवायफ के लिए लगभग नामुमकिन था। कहानी की शुरुआत नरगिस से होती है। नरगिस एक मशहूर तवायफ थी, लेकिन उसका दिल एक शरीफ खानदान के चश्मों-चिराग शाहबुद्दीन के लिए धड़कता था। शाहबुद्दीन भी उससे बेपनाह मोहब्बत करता था और उसे अपनी पत्नी बनाकर अपने घर ले जाना चाहता था। शाहबुद्दीन उसे अपने पुश्तैनी घर ले भी गया, लेकिन वहां के बुजुर्ग हाकिम साहब ने इस रिश्ते को ठुकरा दिया। उनके लिए एक तवायफ उनके खानदान की बहू कभी नहीं बन सकती थी।


अपमानित होकर और टूटे दिल के साथ नरगिस वहां से भाग निकली। वह पास के एक कब्रिस्तान में जाकर रहने लगी। वहां उसने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन खुद मौत के आगोश में समा गई। मरते वक्त उसने शाहबुद्दीन के नाम एक खत छोड़ा, जिसमें उसने अपनी आखिरी इच्छा लिखी थी कि वह अपनी बेटी को अपना नाम दे। नरगिस की बहन नवाबजान को जब यह पता चला, तो वह कब्रिस्तान पहुँची और उस नन्ही जान को अपने साथ ले आई। नवाबजान ने उस बच्ची का नाम साहिबजान रखा और उसे अपने ही माहौल में पाल-पोसकर बड़ा किया।


साहिबजान जब जवान हुई, तो वह अपनी माँ की तरह ही बेहद खूबसूरत और एक बेहतरीन नृत्यांगना बनी। शाहबुद्दीन को सालों बाद वह खत मिला जो नरगिस ने लिखा था। वह साहिबजान को लेने पहुँचा, लेकिन नवाबजान उसे अपनी बहन का बदला लेने का जरिया मानती थी। वह नहीं चाहती थी कि शाहबुद्दीन अपनी बेटी को इतनी आसानी से ले जाए। नवाबजान साहिबजान को लेकर दूसरे शहर चली गई।


एक बार ट्रेन के सफर के दौरान साहिबजान सो रही थी। तभी एक अजनबी मुसाफिर उस डिब्बे में आया। साहिबजान के पैरों की खूबसूरती देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गया। उसने साहिबजान के पास एक पर्ची छोड़ी जिस पर लिखा था, "आपके पैर देखे, बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें जमीन पर न रखिएगा, मैले हो जाएंगे।" साहिबजान जब जागी और उसने वह पर्ची पढ़ी, तो उसे उस अनजाने शख्स से बिना देखे ही मोहब्बत हो गई। वह पर्ची उसके लिए एक कीमती खजाना बन गई।


किस्मत का खेल देखिए, एक रात जब साहिबजान एक रईस नवाब की नाव पर मुजरा कर रही थी, तब हाथियों के हमले के कारण नाव डूब गई। साहिबजान नदी की लहरों में बह गई और किनारे पर लगे एक तंबू के पास पहुँची। वह तंबू एक वन अधिकारी सलीम का था। वहां साहिबजान को सलीम की डायरी मिली और उसे पता चला कि यह वही शख्स है जिसने ट्रेन में उसके लिए वह पैगाम छोड़ा था। साहिबजान ने अपनी पहचान छुपाने के लिए याददाश्त खोने का नाटक किया। सलीम को उससे प्यार हो गया और वह उससे निकाह करना चाहता था।


लेकिन साहिबजान को अपनी असलियत का पता था। वह जानती थी कि समाज उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। वह सलीम की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती थी, इसलिए वह वापस नवाबजान के पास लौट आई। साहिबजान का मन अब कोठे के नाच-गाने में नहीं लगता था। वह वहां से भागने की कोशिश करती है और रेल की पटरियों पर गिर जाती है। वहां फिर से उसकी मुलाकात सलीम से होती है। सलीम उसे अपने घर ले जाता है और उसे 'पाकीज़ा' (पवित्र) नाम देता है।


सलीम साहिबजान से निकाह करने के लिए उसे एक मौलवी के पास ले जाता है, लेकिन ऐन वक्त पर साहिबजान को अपनी वास्तविकता का अहसास होता है। उसे लगता है कि उसकी मौजूदगी सलीम के खानदान पर एक कलंक बन जाएगी। वह निकाह से मना कर देती है और वापस लौट आती है। सलीम का दिल टूट जाता है।


कहानी का आखिरी और सबसे दर्दनाक हिस्सा तब आता है जब सलीम के घरवाले उसकी शादी कहीं और तय कर देते हैं। सलीम की जिद पर साहिबजान को ही उसकी शादी में मुजरा करने के लिए बुलाया जाता है। वहां नवाबजान शाहबुद्दीन को पहचान लेती है और सबके सामने यह सच उगल देती है कि यह नाचने वाली लड़की कोई और नहीं बल्कि शाहबुद्दीन की अपनी बेटी है।


हाकिम साहब, जो इस सच को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे, वे नवाबजान पर गोली चलाते हैं, लेकिन शाहबुद्दीन अपनी बेटी और नवाबजान को बचाने के लिए सामने आ जाता है और खुद गोली खा लेता है। मरते-मरते शाहबुद्दीन सलीम से कहता है कि वह साहिबजान को अपना ले। अंत में, तमाम बंदिशों को तोड़ते हुए सलीम की डोली साहिबजान के कोठे पर पहुँचती है और उसे वह सम्मान दिलाती है जिसकी वह हकदार थी।


यह फिल्म एक तवायफ के संघर्ष, उसकी पवित्रता और समाज के दोहरे मानदंडों की एक ऐसी दास्तां है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। मीना कुमारी का अभिनय और कमाल अमरोही का निर्देशन इस फिल्म को भारतीय सिनेमा का एक मील का पत्थर बनाता है।






 

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