यह कहानी भारतीय सिनेमा के उस दौर की है जब फिल्मों में तहजीब, संस्कार और संगीत का एक अनूठा संगम देखने को मिलता था। फिल्म 'महबूब की मेहंदी' साल उन्नीस सौ इकहत्तर में प्रदर्शित हुई थी, जिसका निर्माण और निर्देशन एच. एस. रवैल ने किया था। इस फिल्म के मुख्य कलाकार राजेश खन्ना और लीना चंदावरकर हैं। यह फिल्म पुरानी नवाबी संस्कृति और मुस्लिम समाज के रहन-सहन पर आधारित है। फिल्म में शिक्षा के महत्व को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है, जैसा कि महात्मा गांधी ने भी उपदेश दिया था कि शिक्षा ही इंसान को बुराइयों से बचा सकती है। फिल्म की नायिका शबाना खुद को और अपने परिवार को केवल अपनी शिक्षा और ट्यूटर की नौकरी के बल पर ही बचा पाती है।
कहानी की शुरुआत शबाना से होती है जो अपने कॉलेज में एक गायन प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही है। वह बम्बई में अपनी दादी (पालने वाली नानी) के साथ रहती है। उसकी माँ नजमा उससे दूर हैदराबाद में रहती है। शबाना को लगता है कि उसकी माँ वहां ठीक है, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। नजमा एक निस्सार अहमद नाम के दलाल के चंगुल में फंसी हुई थी जो उसे वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करता था। नजमा ने कभी भी अपनी बेटी को अपनी इस मजबूरी और कड़वी सच्चाई के बारे में नहीं बताया था ताकि शबाना की पढ़ाई और उसका भविष्य खराब न हो। शबाना अपनी माँ की इस दुर्दशा से पूरी तरह अनजान थी।
एक दिन जब शबाना कॉलेज से प्रतियोगिता जीतकर लौटती है, तो उसे अपनी माँ के आने का इंतजार होता है। लेकिन तभी दरवाजे की घंटी बजती है और एक डाकिया तार लेकर आता है। यह तार हैदराबाद से आया था जिसमें उसकी माँ की बीमारी की खबर दी गई थी। शबाना तुरंत अपनी नानी के साथ हैदराबाद के लिए रवाना हो जाती है। वहां पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उसकी माँ एक कोठे पर रहती है। जब नजमा को अहसास होता है कि उसकी बेटी को सब कुछ पता चल गया है, तो वह शर्म और दुख के मारे अपनी जान दे देती है। दरअसल, वह तार निस्सार अहमद ने ही भेजा था ताकि वह शबाना को भी उसी दलदल में धकेल सके क्योंकि अब नजमा की उम्र हो चुकी थी और उसे नए शिकार की तलाश थी।
हालाँकि, शबाना की नानी बहुत चालाक और समझदार थी। वह निस्सार के इरादों को भांप लेती है और शबाना को वहां से बचाकर चुपके से लखनऊ ले जाती है। लखनऊ में नानी का एक मुंहबोला भाई रहता था। जब वे वहां पहुँचते हैं, तो पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उसका बेटा जिसका नाम भी 'मुंहबोले' ही था, शबाना और नानी का खुशी-खुशी स्वागत करता है और उन्हें अपने घर में पनाह देता है।
अगले दिन यूसुफ नाम का एक सुंदर और अमीर युवक शबाना के घर आता है। यूसुफ नवाब सफदरजंग का बेटा है। नवाब सफदरजंग शारीरिक रूप से अक्षम हैं और व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हैं। यूसुफ जब घर आता है, तो वहां चादर ओढ़कर सोई हुई शबाना को अपना चचेरा भाई 'मुंहबोले' समझ लेता है और मजाक में उसके पीछे एक हल्की सी चपत लगा देता है। जैसे ही शबाना जागती है और डर के मारे चिल्लाती है, यूसुफ उसकी सुंदरता को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। दोनों के बीच एक अजीब सा संकोच और भ्रम पैदा हो जाता है, लेकिन जल्द ही यूसुफ को असलियत पता चल जाती है।
यूसुफ का एक छोटा भतीजा है जिसका नाम फिरंगी है। फिरंगी बहुत शरारती है और उसकी शरारतों से परेशान होकर उसकी पुरानी ट्यूटर नौकरी छोड़ देती है क्योंकि फिरंगी ने यूसुफ के उकसाने पर उसके ऊपर एक सफेद चूहा छोड़ दिया था। यूसुफ अब शबाना को फिरंगी की नई शिक्षिका के रूप में अपने महल में ले आता है। धीरे-धीरे यूसुफ और शबाना के बीच बातचीत शुरू होती है और वे एक-दूसरे के करीब आने लगते हैं।
कहानी में एक और मोड़ तब आता है जब एक रात यूसुफ अपने बेडरूम में एक चोर को पकड़ता है। उस चोर का नाम खैरुद्दीन था। खैरुद्दीन की ईमानदारी और उसकी बातचीत करने के सलीके से यूसुफ इतना प्रभावित होता है कि वह उसे पुलिस को सौंपने के बजाय अपने बीमार पिता नवाब सफदरजंग की देखभाल के लिए केयरटेकर नियुक्त कर देता है। लेकिन यूसुफ को यह नहीं पता था कि खैरुद्दीन वास्तव में नवाब अनवर कमाल था जो एक पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए वहां आया था।
अतीत का राज यह था कि खैरुद्दीन के पिता नवाब सज्जाद हुसैन थे, जिनकी सारी संपत्ति और पुश्तैनी हवेली नवाब सफदरजंग ने अठारह साल पहले एक कर्ज न चुका पाने के कारण जब्त कर ली थी। खैरुद्दीन ने अपनी जिंदगी के कई साल जेल में भी बिताए थे क्योंकि उसने नजमा के सौतेले चाचा की हत्या कर दी थी। उस चाचा ने नजमा को घर से निकाल दिया था क्योंकि उसे शक था कि नजमा के पेट में एक नाजायज बच्चा है। वह बच्चा असल में खैरुद्दीन और नजमा का ही था, यानी खैरुद्दीन ही शबाना का असली पिता था।
इधर शबाना और यूसुफ का प्यार परवान चढ़ने लगता है। नवाब सफदरजंग भी इस रिश्ते से खुश होते हैं और उनकी शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। शादी से ठीक पहले शबाना के मन में अपनी माँ के अतीत को लेकर उलझन पैदा होती है। वह यूसुफ के नाम एक खत लिखती है जिसमें वह सच बताती है कि वह एक तवायफ नजमा की बेटी है। वह यह खत खैरुद्दीन (खैरु) को देती है कि वह इसे यूसुफ तक पहुँचा दे। जब खैरुद्दीन उस खत को पढ़ता है, तो उसे अहसास होता है कि शबाना उसकी अपनी बेटी है।
जैसे ही शादी का दिन नजदीक आता है, निस्सार अहमद एक नौकर बनकर वहां पहुँच जाता है। वह अपना नाम उस्मान बताता है और शबाना को ब्लैकमेल करना शुरू कर देता है। वह धमकी देता है कि अगर उसने उसे पैसे और जेवर नहीं दिए, तो वह यूसुफ के परिवार को शबाना की माँ के पेशे के बारे में बता देगा जिससे समाज में उनकी बदनामी होगी और शादी टूट जाएगी। निस्सार शबाना के साथ बदतमीजी करने की कोशिश भी करता है। शबाना बड़ी बहादुरी से उसे चकमा देकर उसकी पिस्तौल छीन लेती है और आत्मरक्षा में उसे गोली मार देती है।
शबाना की चीख सुनकर खैरुद्दीन वहां पहुँचता है और अपनी बेटी को बचाने के लिए वह निस्सार पर कई गोलियां चला देता है ताकि कत्ल का इल्जाम उस पर आए। शोर सुनकर घर के सभी लोग वहां जमा हो जाते हैं। मामले की सुनवाई अदालत में होती है। यूसुफ को खैरुद्दीन के कमरे से दो पत्र मिलते हैं। एक पत्र में खैरुद्दीन ने सफदरजंग को लिखा था कि वह यूसुफ को मारकर अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला लेगा। दूसरा पत्र शबाना का था जिसे खैरुद्दीन ने फाड़ दिया था। यूसुफ अदालत में इन पत्रों के जरिए सारी सच्चाई सामने लाता है और साबित करता है कि खैरुद्दीन ने जो कुछ किया वह अपनी बेटी और परिवार की इज्जत बचाने के लिए किया था।
अदालत का फैसला खैरुद्दीन के पक्ष में आता है और सभी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। नवाब सफदरजंग को भी अपनी पुरानी गलतियों का अहसास होता है और दोनों परिवार फिर से एक हो जाते हैं। अंत में यूसुफ और शबाना की शादी बड़ी धूमधाम से होती है। फिल्म का अंत बहुत ही सुखद और मजेदार होता है जहाँ शरारती भतीजा फिरंगी नए शादीशुदा जोड़े के कमरे में अपनी शरारतों के साथ दाखिल होता है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसके गीत और संगीत हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध किए गए गीत 'पास बैठो तबीयत बहल जाएगी' और 'महबूब की मेहंदी हाथों में' आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। राजेश खन्ना ने अपनी रोमांटिक छवि के साथ पूरा न्याय किया है और लीना चंदावरकर ने एक शिक्षित और स्वाभिमानी युवती की भूमिका को बहुत ही संवेदनशीलता से निभाया है। यह फिल्म हमें यह सिखाती है कि इंसान का जन्म कहाँ हुआ है, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि वह कैसा इंसान बना है। शिक्षा ही वह हथियार है जिससे समाज की रूढ़ियों को तोड़ा जा सकता है और अपनी गरिमा की रक्षा की जा सकती है।
कहानी का सीधा और सरल प्रवाह दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। नवाबी दौर की तहजीब, महफिलों का माहौल और रिश्तों की गहराई इस फिल्म को एक क्लासिक बनाती है। इसमें दिखाया गया त्याग और पिता-बेटी का अनजाना रिश्ता दिल को छू लेने वाला है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के उस दौर की याद दिलाती है जहाँ कहानियों में नैतिकता और भावनाओं को सर्वोपरि रखा जाता था।
शबाना का चरित्र एक ऐसी लड़की का है जिसने अपनी माँ के कोठे की परछाईं को अपने भविष्य पर नहीं पड़ने दिया। उसने पढ़ाई की और एक शिक्षिका बनकर सम्मान के साथ जीने का रास्ता चुना। यूसुफ का चरित्र भी बहुत महान दिखाया गया है, जो एक वेश्या की बेटी होने का सच जानने के बाद भी शबाना से अपना रिश्ता नहीं तोड़ता और उसे पूरे सम्मान के साथ अपनी पत्नी स्वीकार करता है। खैरुद्दीन का त्याग यह बताता है कि एक पिता अपनी संतान की खुशी के लिए खुद को भी कुर्बान कर सकता है।
कुल मिलाकर, 'महबूब की मेहंदी' केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज के उन हिस्सों पर भी रोशनी डालती है जिन्हें अक्सर तिरस्कार की नजर से देखा जाता है। यह फिल्म एक सकारात्मक संदेश देती है कि सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलने वालों की अंत में जीत जरूर होती है। फिल्म के संवाद बहुत ही नफासत भरे हैं जो उस दौर की उर्दू और हिंदी के सुंदर मिश्रण को दर्शाते हैं। यह फिल्म आज भी देखने लायक है क्योंकि इसके मूल विचार शाश्वत हैं।
राजेश खन्ना के अभिनय की चमक इस फिल्म में साफ दिखाई देती है। उनके बात करने का अंदाज और उनके हाव-भाव दर्शकों को अपनी ओर खींच लेते हैं। लीना चंदावरकर ने शबाना के रूप में अपनी मासूमियत और दृढ़ता का बेहतरीन संतुलन दिखाया है। प्रदीप कुमार ने नवाब के किरदार में अपनी खास राजसी गरिमा को बनाए रखा है। यह फिल्म हकीकत और कल्पना का एक ऐसा ताना-बाना है जो मनोरंजन के साथ-साथ एक गहरा सामाजिक संदेश भी छोड़ जाती है।
फिल्म का हर दृश्य यह याद दिलाता है कि इंसान को कभी भी अपने अतीत का गुलाम नहीं होना चाहिए। शबाना ने अपने अतीत से लड़कर अपना भविष्य संवारा, और यूसुफ ने उस भविष्य को अपनाकर समाज के सामने एक मिसाल पेश की। यह फिल्म हमें यह विश्वास दिलाती है कि प्रेम और शिक्षा मिलकर दुनिया की सबसे बड़ी बुराइयों को हरा सकते हैं।


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