"LAL PATTHAR" - HINDI CLASSICAL ACTION DRAMA FILM / RAAJ KUMAR & HEMA MALINI MOVIE







यह कहानी एक ऐसे ऐतिहासिक और भव्य परिवेश में बुनी गई है जहाँ प्रेम, ईर्ष्या, प्रतिशोध और वंशानुगत पागलपन का एक गहरा संगम देखने को मिलता है। फिल्म लाल पत्थर साल उन्नीस सौ इकहत्तर में प्रदर्शित हुई थी और यह निर्देशक सुशील मजुमदार की अपनी ही बंगाली फिल्म का पुननिर्माण थी। इस फिल्म की कहानी फतेहपुर सीकरी के उन लाल पत्थरों के इर्द-गिर्द घूमती है जो मानो आज भी किसी खूनी इतिहास की गवाही दे रहे हों। फिल्म की शुरुआत एक आधुनिक परिवार से होती है जो फतेहपुर सीकरी के किले में पिकनिक मनाने आता है। वहां उनकी मुलाकात एक रहस्यमयी बूढ़े व्यक्ति से होती है। वह बूढ़ा व्यक्ति दावा करता है कि इस किले का हर पत्थर खून से लिखी गई एक कहानी कहता है। जब परिवार के लोग कहते हैं कि उनकी गाइडबुक में ऐसी किसी कहानी का जिक्र नहीं है, तो वह बूढ़ा व्यक्ति हंसते हुए कहता है कि इतिहास की असली परतें किताबों में नहीं मिलतीं। वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर प्रतीत होता है और उसे सादे पानी के गिलास में भी खून की बूंदें दिखाई देती हैं। यहीं से वह राय नगर के राजपरिवार की एक भयानक और दुखद गाथा सुनाना शुरू करता है।


राय नगर के राजवंश की शुरुआत राजा राघव शंकर राय से हुई थी, जो मूल रूप से एक डाकू थे। एक गांव पर हमले के दौरान उन्होंने सोनमई नाम की एक साधारण किसान महिला के साथ दुराचार किया और बाद में उसे अपनी पत्नी बना लिया। अपमानित और दुखी सोनमई ने मरते समय उस पूरे राजवंश को श्राप दिया कि उनकी आने वाली पीढ़ियां पागलपन का शिकार होंगी। समय बीतता गया और सातवीं पीढ़ी में इस वंश का एकमात्र वारिस ज्ञान शंकर राय बचा। ज्ञान शंकर राय, जिन्हें लोग कुमार बहादुर के नाम से भी जानते हैं, एक अत्यंत विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। उनके दादा राजा राम शंकर राय मानसिक रूप से पूरी तरह विक्षिप्त हो चुके हैं। बचपन में ज्ञान शंकर ने अपने शराबी पिता आनंद शंकर को एक दासी के साथ दुर्व्यवहार करते देखा था, जिसने उसके कोमल मन पर गहरा प्रभाव डाला। उसे पढ़ाई के लिए इलाहाबाद भेज दिया गया जहाँ उसने इतिहास और मनोविज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। वापस लौटने पर वह अपने साथ अपने वफादार नौकर छोटू को भी लाया। ज्ञान शंकर को पता था कि उस पर सोनमई का श्राप है, इसलिए उसने निर्णय लिया कि वह कभी विवाह नहीं करेगा ताकि किसी निर्दोष स्त्री का जीवन बर्बाद न हो।


एक दिन ज्ञान शंकर जंगल में एक आदमखोर बाघ का शिकार करने जाते हैं। बाघ को मारने के बाद उनकी नजर एक पालकी पर पड़ती है जिसे कुछ डाकू ले जा रहे थे। ज्ञान शंकर उन डाकुओं से मुकाबला करते हैं और उन्हें भगा देते हैं। पालकी के भीतर उन्हें एक अत्यंत सुंदर युवती मिलती है जिसका नाम सौदामिनी है। सौदामिनी पास के एक गांव के गोकुल की विधवा थी। ज्ञान शंकर उसे उसके घर वापस भेज देते हैं, लेकिन गोकुल की माँ सौदामिनी को अपवित्र मानकर घर में घुसने से मना कर देती है। ज्ञान शंकर के अंगरक्षकों के डर से वह उसे रख तो लेती है, लेकिन उस पर जुल्म करना शुरू कर देती है। जब ज्ञान शंकर को पता चलता है कि सौदामिनी को प्रताड़ित किया जा रहा है, तो वे उसे अपने महल ले आते हैं।


महल में ज्ञान शंकर सौदामिनी का नाम बदलकर माधुरी रख देते हैं। वे उसके सौंदर्य के प्रति आकर्षित होते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध भी बन जाते हैं, लेकिन ज्ञान शंकर उसे अपनी पत्नी का दर्जा देने या उससे विवाह करने से मना कर देते हैं। माधुरी धीरे-धीरे पूरे महल पर अपना नियंत्रण कर लेती है और ज्ञान शंकर उसकी उंगलियों पर नाचने लगते हैं। ज्ञान शंकर माधुरी को शिक्षित करने और उसे संगीत सिखाने का प्रयास करते हैं, लेकिन समय के साथ उन्हें अहसास होता है कि माधुरी की सोच बहुत सीमित है। उसके भीतर एक नकारात्मकता और ईर्ष्या का भाव है जिसे शिक्षा से नहीं बदला जा सकता। ज्ञान शंकर धीरे-धीरे माधुरी से ऊबने लगते हैं। दस साल बीत जाते हैं और ज्ञान शंकर अब युवा नहीं रहे, लेकिन उनका अकेलापन और बढ़ता जाता है।


एक दिन ज्ञान शंकर अपने महल से दूर एक संगीत सभा में जाते हैं जहाँ उनकी मुलाकात सुमिता नाम की एक बहुत ही कम उम्र की युवती से होती है। सुमिता का किरदार राखी ने निभाया है। ज्ञान शंकर को पता चलता है कि सुमिता के पिता हरिश्चंद्र चक्रवर्ती जुए के आदी हैं और उन पर बहुत कर्ज है। ज्ञान शंकर सुमिता के पिता के साथ एक आर्थिक समझौता करते हैं और सुमिता से विवाह कर लेते हैं। सुमिता की माँ इस रिश्ते के खिलाफ थी, लेकिन उसके पिता ने पैसों के लालच में सुमिता का जीवन एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया जो उससे उम्र में बहुत बड़ा था। वास्तव में सुमिता अपने बचपन के साथी शेखर से प्रेम करती थी, जो लंदन में था और जल्द ही भारत आकर उससे शादी करने वाला था।


जब सुमिता दुल्हन बनकर महल आती है, तो माधुरी की ईर्ष्या की कोई सीमा नहीं रहती। वह सुमिता को अपना दुश्मन समझने लगती है। माधुरी के क्रोध और उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए ज्ञान शंकर सुमिता के साथ अपने वैवाहिक संबंधों को आगे नहीं बढ़ाते। सुमिता अपने नसीब को स्वीकार कर लेती है, लेकिन वह अंदर से दुखी है। इसी बीच शेखर भारत लौट आता है। सुमिता उसे बताती है कि उसने केवल अपनी माँ को पिता के जुल्मों से बचाने के लिए यह शादी की है। ज्ञान शंकर को जब सुमिता और शेखर की पुरानी दोस्ती का पता चलता है, तो वे ईर्ष्या करने के बजाय शेखर से दोस्ती कर लेते हैं और उसे संगीत के रियाज के लिए महल आमंत्रित करते हैं।


यहीं से माधुरी अपना खतरनाक खेल शुरू करती है। वह ज्ञान शंकर के कान भरना शुरू करती है कि सुमिता और शेखर के बीच आज भी प्रेम संबंध हैं। वह ज्ञान शंकर को पागलपन की हद तक उकसाती है। एक दिन जब ज्ञान शंकर महल में नहीं होते, माधुरी शेखर को सुमिता के कमरे में ले जाती है और झूठ बोलती है कि यह ज्ञान शंकर का आदेश है। ज्ञान शंकर जब वापस आते हैं और शेखर को सुमिता के कमरे में देखते हैं, तो उनका संदेह गहरा जाता है। हालांकि शेखर केवल सुमिता को ढांढस बंधा रहा था कि वह अपनी शादी को समय दे, लेकिन ज्ञान शंकर इसे गलत समझ बैठते हैं।


कहानी में एक बड़ा मोड़ तब आता है जब ज्ञान शंकर को पता चलता है कि माधुरी शेखर को लुभाने की कोशिश कर रही है ताकि वह सुमिता को नीचा दिखा सके। ज्ञान शंकर को अहसास होता है कि माधुरी ईर्ष्या में अंधी हो चुकी है। वे उसे कोड़े से मारते हैं जिससे उसके चेहरे पर एक गहरा निशान बन जाता है और उसे महल से निकाल देते हैं। इसके बाद वे सुमिता को लेकर आगरा चले जाते हैं। वहां वे सुमिता को सलीम चिश्ती की दरगाह पर मन्नत मांगते देखते हैं। ज्ञान शंकर को लगता है कि सुमिता शेखर को पाने की मन्नत मांग रही है, जबकि वास्तव में वह संतान प्राप्ति की दुआ मांग रही थी।


ज्ञान शंकर का मानसिक संतुलन अब बिगड़ने लगता है। वे शेखर को भी आगरा बुला लेते हैं। वे शेखर और सुमिता को ताज महल देखने भेजते हैं और खुद उनका पीछा करते हैं। उनकी बातों के कुछ हिस्सों को सुनकर वे पक्का मान लेते हैं कि दोनों अब भी एक-दूसरे से प्यार करते हैं। इसके बाद वे पूर्णिमा की रात को शेखर को फतेहपुर सीकरी का किला दिखाने ले जाते हैं। वहां वे एक नाटक रचते हैं जिसमें वे शेखर को विश्वास दिलाते हैं कि किले में भूत रहते हैं। वे एक व्यक्ति को भूत का रूप देकर उस पर नकली गोलियां चलाते हैं। लेकिन फिर वे चुपके से बंदूक में असली गोलियां भर देते हैं और जब एक महिला भूत के वेश में सामने आती है, तो वे बंदूक शेखर को दे देते हैं। शेखर गोली चला देता है और वह 'भूत' कोई और नहीं बल्कि सुमिता थी, जिसे ज्ञान शंकर ने ही वहां बुलाया था।


मरते समय सुमिता ज्ञान शंकर को बताती है कि वह केवल उनके बच्चों की माँ बनना चाहती थी। यह सुनकर ज्ञान शंकर पूरी तरह पागल हो जाते हैं। वे खुद को भी मारना चाहते हैं, लेकिन शेखर उन्हें रोकने की कोशिश करता है। इसी खींचतान में गोली चल जाती है और शेखर की भी मौत हो जाती है। सोनमई का श्राप पूरा होता है। ज्ञान शंकर अब उसी किले में पागलों की तरह भटकते रहते हैं और हर पूर्णिमा की रात सुमिता की आत्मा का इंतजार करते हैं। फिल्म के अंत में एक बहुत बड़ा खुलासा होता है कि माधुरी जिसे निकाल दिया गया था, वह आज भी जीवित है। वह सुमिता का रूप धरकर ज्ञान शंकर के सामने आती है ताकि उनके पागलपन को थोड़ा सुकून मिल सके। यह कहानी प्रेम, ईर्ष्या और भाग्य के उन खूनी खेल को दर्शाती है जो इंसान को कहीं का नहीं छोड़ते।


फिल्म के सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है। राज कुमार की संवाद अदायगी और हेमा मालिनी का नकारात्मक रूप इस फिल्म को एक क्लासिक बनाता है। राखी ने सुमिता के रूप में अपनी सादगी से सबका दिल जीत लिया। शंकर-जयकिशन का संगीत फिल्म की आत्मा है। 'रे मन सुर में गा' जैसे गीत आज भी कानों में मिश्री घोलते हैं। लाल पत्थर केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह मानवीय ईर्ष्या और उसके विनाशकारी परिणामों की एक दर्दनाक दास्तां है जिसे फतेहपुर सीकरी की ऐतिहासिक दीवारों के बीच बहुत ही खूबसूरती से बुना गया है।


यह कहानी हमें सिखाती है कि संदेह एक ऐसा जहर है जो सबसे सुंदर रिश्तों को भी राख बना सकता है। ज्ञान शंकर ने माधुरी को जीवन दिया, लेकिन माधुरी ने उनके जीवन में जहर घोल दिया। सुमिता ने त्याग किया, लेकिन उसका अंत दुखद रहा। अंत में केवल पश्चाताप और वह लाल पत्थर बच जाते हैं जिन पर एक और खूनी दास्तां दर्ज हो गई। इस प्रकार यह फिल्म भारतीय सिनेमा की एक बेमिसाल कृति बन गई जो आज भी उतनी ही प्रभावशाली है।



फिल्म की सफलता की एक बड़ी वजह इसका सीधा और सरल कहानी कहने का तरीका है। हालाँकि यह एक जटिल मनोवैज्ञानिक ड्रामा है, लेकिन निर्देशक ने इसे इस तरह से पेश किया है कि आम दर्शक भी ज्ञान शंकर की मानसिक पीड़ा और माधुरी की ईर्ष्या को महसूस कर सकता है। फिल्म में फतेहपुर सीकरी का उपयोग केवल एक लोकेशन की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र की तरह किया गया है। लाल रंग का पत्थर हिंसा, जुनून और प्रेम की तीव्रता का प्रतीक बनकर उभरता है।


राज कुमार ने ज्ञान शंकर के किरदार में अपनी खास शैली का उपयोग किया है। उनका चलना, बात करना और शांत रहकर भी अपने भीतर के तूफान को दिखाना, यह सब उनके अभिनय की विशेषता रही है। विशेष रूप से जब वे माधुरी को दंड देते हैं या जब वे सुमिता की मृत्यु के बाद टूट जाते हैं, वह दृश्य राज कुमार के अभिनय करियर के सर्वश्रेष्ठ दृश्यों में से एक है। हेमा मालिनी के लिए यह फिल्म एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि वे उस समय अपनी 'ड्रीम गर्ल' की छवि के लिए जानी जाती थीं। एक नकारात्मक और ईर्ष्यालु प्रेमिका की भूमिका निभाना उनके लिए साहसी कदम था और उन्होंने अपनी अदाकारी से यह साबित कर दिया कि वे किसी भी तरह का किरदार निभा सकती हैं। उनकी आंखों में दिखने वाला गुस्सा और सुमिता के प्रति उनकी नफरत दर्शकों के मन में डर पैदा करती है।


राखी ने सुमिता के रूप में एक पीड़ित नारी का चित्रण किया है जो चुपचाप अपने दुखों को सहती है। उसकी सुंदरता और उसकी मधुर आवाज फिल्म में एक सुकून लेकर आती है, जो अंत में एक गहरी उदासी में बदल जाती है। विनोद मेहरा ने शेखर के रूप में एक सच्चे प्रेमी और मित्र की भूमिका को बखूबी निभाया है। उनका किरदार दिखाता है कि सच्चा प्रेम कभी अधिकार नहीं जताता, बल्कि वह अपने प्रिय की खुशी में ही अपनी खुशी ढूंढता है।


फिल्म का संगीत इस कहानी का एक अभिन्न हिस्सा है। 'गीत गाता हूँ मैं' और 'रे मन सुर में गा' जैसे गीत न केवल मधुर हैं, बल्कि वे कहानी को आगे बढ़ाते हैं। शास्त्रीय संगीत का उपयोग फिल्म की गंभीरता और उसके राजसी परिवेश को और अधिक पुख्ता करता है। शंकर-जयकिशन ने जिस तरह से धुनें बनाई हैं, वे आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं।


फिल्म का अंत बहुत ही दार्शनिक और भावुक है। माधुरी का ज्ञान शंकर की सेवा करना और उनकी मानसिक शांति के लिए सुमिता का स्वांग रचना यह दिखाता है कि प्रेम में समर्पण की कोई सीमा नहीं होती। भले ही माधुरी ने ईर्ष्या में आकर सब कुछ बर्बाद कर दिया, लेकिन अंत में उसके भीतर का प्रेम ही था जिसने उसे ज्ञान शंकर के पास वापस खींच लाया। वह जानती थी कि वह कभी सुमिता की जगह नहीं ले सकती, लेकिन वह कम से कम ज्ञान शंकर के दर्द को कम करने का प्रयास तो कर सकती थी।


लाल पत्थर हमें याद दिलाती है कि हमारे कर्मों का फल हमें इसी जीवन में भोगना पड़ता है। राय नगर के राजवंश का गौरव उनकी अपनी गलतियों और उस पुराने श्राप के कारण मिट्टी में मिल गया। यह फिल्म मानवीय स्वभाव की उन कमियों को उजागर करती है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। ईर्ष्या, क्रोध और संदेह ऐसे शत्रु हैं जो बाहर से नहीं, हमारे भीतर से ही हमें नष्ट करते हैं।


फिल्म की तकनीकी खूबियां भी काबिले तारीफ हैं। सत्तर के दशक की रोशनी और कैमरा वर्क ने महलों के अंदर के रहस्यमयी वातावरण को बहुत अच्छे से कैद किया है। डायलॉग्स बहुत ही वजनदार हैं और हर कलाकार ने उन्हें अपनी पूरी शक्ति के साथ बोला है। यह फिल्म आज के दौर के सिनेमा से बहुत अलग है क्योंकि इसमें शोर-शराबा कम और भावनाओं की गहराई ज्यादा है।


अंततः, लाल पत्थर एक ऐसी गाथा है जो समय की सीमाओं को पार कर चुकी है। यह हमें यह संदेश देती है कि सच्चाई और मासूमियत की बलि भले ही चढ़ जाए, लेकिन वह अपनी छाप हमेशा के लिए छोड़ जाती है। सुमिता मरकर भी ज्ञान शंकर की यादों में अमर हो गई, जबकि माधुरी को अपना अस्तित्व ही मिटाना पड़ा। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के प्रेमियों के लिए एक अनमोल रत्न की तरह है जिसे बार-बार देखा जा सकता है और हर बार इसमें एक नया अर्थ खोजा जा सकता है।

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