यह कहानी एक ऐसी युवती के जीवन पर आधारित है जो नियति के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाती है, लेकिन अंततः उसका संयम और सत्य उसे न्याय दिलाता है। फिल्म कठपुतली साल उन्नीस सौ इकहत्तर में प्रदर्शित हुई थी और इसमें मुख्य भूमिकाओं में जीतेंद्र और मुमताज नजर आए थे। कहानी की शुरुआत निशा नाम की एक लड़की से होती है, जिसका किरदार मुमताज ने निभाया है। निशा एक अनाथ लड़की है जो एक दफ्तर में काम करती है और एक छोटी सी बस्ती में अकेली रहती है। वह स्वाभिमानी है और अपनी मेहनत से अपना जीवन व्यतीत कर रही है। उसी बस्ती में निशा के घर के बगल में विशाल नाम का एक युवक रहने आता है, जिसकी भूमिका जीतेंद्र ने निभाई है। विशाल भी एक अनाथ है और जीवन में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
शुरुआत में निशा और विशाल के बीच कुछ नोक-झोंक होती है और कुछ हास्यपूर्ण घटनाएं घटती हैं, जिससे उनके बीच जान-पहचान बढ़ती है। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के करीब आने लगते हैं और उन्हें एक-दूसरे से प्रेम हो जाता है। वे दोनों साथ में भविष्य के सपने बुनने लगते हैं और अपनी शादी की योजना बनाने लगते हैं। लेकिन तभी उनकी खुशियों को किसी की नजर लग जाती है। एक दिन जब वे कार से कहीं जा रहे होते हैं, तो उनका एक भयानक एक्सीडेंट हो जाता है। इस हादसे में विशाल को गंभीर चोटें आती हैं और उसकी हालत नाजुक हो जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि विशाल की जान बचाने के लिए तुरंत एक बड़ा ऑपरेशन करना होगा, जिसके लिए पांच हजार रुपये की जरूरत है। उस समय के हिसाब से यह एक बहुत बड़ी रकम थी।
निशा के पास इतने पैसे नहीं थे और उसके पास कोई ऐसा सगा-संबंधी भी नहीं था जिससे वह मदद मांग सके। अपने प्रेमी की जान बचाने के लिए निशा व्याकुल हो जाती है और अंत में हार मानकर अपने दफ्तर के मालिक मनमोहन के पास जाती है। मनमोहन एक बहुत ही नीच और चरित्रहीन व्यक्ति था। वह निशा की मजबूरी का फायदा उठाता है और मदद के बदले उसके सामने एक शर्मनाक शर्त रखता है। निशा के सामने एक तरफ उसके प्रेमी की मौत थी और दूसरी तरफ उसकी अपनी अस्मत। विशाल को मरता हुआ न देख पाने के कारण निशा खुद को कुर्बान कर देती है। मनमोहन उसे पैसे दे देता है और विशाल का ऑपरेशन सफल हो जाता है।
विशाल तो ठीक होने लगता है, लेकिन निशा अंदर से पूरी तरह टूट चुकी होती है। उसे लगता है कि अब वह विशाल के सामने खड़े होने के लायक नहीं रही। ग्लानि और दुख के कारण वह अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय लेती है और आत्महत्या की कोशिश करती है। तभी रोमा नाम की एक अमीर महिला, जिसका किरदार हेलन ने निभाया है, वहां पहुंचती है और निशा को बचा लेती है। रोमा को जब निशा की पूरी कहानी पता चलती है, तो उसका दिल पसीज जाता है। वह निशा को ढांढस बंधाती है और उसे याद दिलाती है कि विशाल को अभी उसकी बहुत जरूरत है। रोमा की बातों से निशा को थोड़ी हिम्मत मिलती है और वह वापस विशाल के पास लौट आती है।
विशाल धीरे-धीरे ठीक हो रहा होता है, तभी निशा को पता चलता है कि वह गर्भवती है। यह खबर निशा के लिए एक और बड़ा झटका थी क्योंकि यह बच्चा उस घिनौने हादसे की निशानी था। निशा फिर से संकट में पड़ जाती है। तब रोमा उसकी मदद करती है और उसे दिल्ली में अपनी चाची कमला देवी के पास भेज देती है। दुनिया की नजरों में यह बहाना बनाया जाता है कि निशा किसी ट्रेनिंग के लिए दिल्ली जा रही है। दिल्ली में निशा एक सुंदर बेटे को जन्म देती है। अपने कलेजे के टुकड़े को कमला देवी के पास छोड़कर वह वापस लौट आती है ताकि विशाल को कुछ पता न चले।
तीन साल बीत जाते हैं। विशाल को अब अपनी मनचाही नौकरी मिल जाती है और उसका तबादला दिल्ली हो जाता है। निशा भी उसके साथ दिल्ली आती है, लेकिन वहां उसका अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ता। उसे पता चलता है कि कमला देवी की मृत्यु हो चुकी है और उसका बेटा, जिसका नाम मुन्ना है, अब पड़ोस में रहने वाली एक बूढ़ी महिला की देखरेख में है। वह बूढ़ी महिला वास्तव में विशाल के दोस्त मुरली की मां है। वह बूढ़ी औरत निशा को पहचान लेती है, लेकिन निशा की आंखों में दर्द देखकर वह चुप रहती है और किसी को कुछ नहीं बताती।
इधर विशाल की मुलाकात मुन्ना से होती है। उसे मुन्ना से एक अनजाना लगाव महसूस होने लगता है और वह उसे गोद लेने का फैसला करता है। उसे यह बिल्कुल नहीं पता होता कि मुन्ना वास्तव में निशा का ही बेटा है। लेकिन एक दिन अचानक विशाल को मुन्ना के असली माता-पिता के बारे में पता चल जाता है। उसे लगता है कि निशा ने उसे धोखा दिया है और वह मुन्ना और निशा दोनों को छोड़कर चला जाता है। निशा एक बार फिर अकेली पड़ जाती है और बहुत दुखी होती है। इस कठिन समय में रोमा फिर से विशाल को समझाने की कोशिश करती है और उसे सच्चाई का आईना दिखाती है।
कहानी में एक और मोड़ आता है जब मुन्ना अपने पिता विशाल की तलाश में घर से निकल जाता है और रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो जाता है। विशाल को जब यह पता चलता है, तो वह उसे अस्पताल ले जाता है। इसी बीच, निशा का पुराना मालिक मनमोहन फिर से उसकी जिंदगी में आता है और उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है। निशा का धैर्य जवाब दे जाता है और गुस्से में आकर वह मनमोहन की हत्या कर देती है। पुलिस निशा को गिरफ्तार कर लेती है।
जब निशा जेल में होती है, तब रोमा विशाल के पास जाती है और उसे वह सब कुछ बताती है जो निशा ने विशाल की जान बचाने के लिए सहा था। विशाल को अपनी गलती का अहसास होता है और उसे समझ आता है कि निशा कोई गुनहगार नहीं बल्कि एक महान बलिदानी महिला है। वह तुरंत जेल भागता है और निशा से माफी मांगता है। वह मुन्ना को भी अपने बेटे के रूप में स्वीकार कर लेता है। अदालत में निशा की मजबूरी और उसके साथ हुए अन्याय को देखते हुए उसे बरी कर दिया जाता है। फिल्म का अंत बहुत ही सुखद होता है जहाँ विशाल, निशा और मुन्ना एक खुशहाल परिवार की तरह फिर से एक हो जाते हैं।
यह फिल्म हमें सिखाती है कि प्रेम में त्याग की पराकाष्ठा क्या होती है। निशा का किरदार एक ऐसी नारी का प्रतीक है जो अपनों के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी दे सकती है। जीतेंद्र और मुमताज की जोड़ी ने इस भावनात्मक कहानी को बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। कल्याणजी-आनंदजी का संगीत फिल्म की रूह है, जो दर्शकों के दिलों को छू लेता है। यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि किसी के चरित्र का फैसला उसकी परिस्थितियों को जाने बिना नहीं करना चाहिए। सत्य और निस्वार्थ प्रेम की हमेशा जीत होती है, चाहे राह कितनी ही कठिन क्यों न हो।
कठपुतली केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज के उस क्रूर चेहरे को भी उजागर करती है जो मजबूरियों का फायदा उठाता है। लेकिन साथ ही, यह रोमा जैसे किरदारों के माध्यम से मानवता की उम्मीद भी जगाती है। यह फिल्म उस दौर की एक बेहतरीन रचना मानी जाती है जो आज भी प्रासंगिक है।
निशा और विशाल की इस यात्रा में हमने देखा कि कैसे गलतफहमियां अच्छे रिश्तों को तबाह कर सकती हैं, लेकिन अगर विश्वास की बुनियाद मजबूत हो, तो कोई भी आंधी उसे गिरा नहीं सकती। मुन्ना का मासूम चेहरा फिल्म में उस पुल का काम करता है जो बिखरे हुए रिश्तों को फिर से जोड़ देता है। अंत में, विशाल का निशा को पूरे दिल से स्वीकार करना पुरुष प्रधान समाज की उस सोच पर प्रहार है जो स्त्री की पवित्रता को केवल शरीर से जोड़कर देखती है। यह फिल्म एक सच्ची जीत की कहानी है।
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