यह कहानी एक ऐसे गांव की है जहां परंपराएं, वादे और पारिवारिक मान-मर्यादा किसी के व्यक्तिगत प्रेम से कहीं अधिक बड़े माने जाते हैं। फिल्म कंगन हमें एक ऐसे भावनात्मक सफर पर ले जाती है जहां प्यार, त्याग और गलतफहमियों का एक गहरा ताना-बाना बुना गया है। इस कहानी के मुख्य पात्र सुनील और शांता हैं, जिनके बचपन का साथ जवानी के प्यार में बदल जाता है। सुनील का किरदार संजीव कुमार ने निभाया है और शांता की भूमिका में माला सिन्हा हैं। सुनील एक मध्यमवर्गीय परिवार का युवक है जो अपनी विधवा माँ जानकी के साथ गांव में रहता है। जानकी ने अपने पति की मृत्यु के बाद बहुत कठिनाइयों से सुनील को पाला-पोसा है और अब उसका एक ही सपना है कि उसका बेटा एक बड़ा डॉक्टर बनकर गांव का नाम रोशन करे।
सुनील शहर में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन उसका दिल हमेशा अपने गांव और अपनी बचपन की सहेली शांता में अटका रहता है। पूरा गांव यह जानता है कि सुनील और शांता एक-दूसरे के लिए बने हैं और सभी को यह उम्मीद है कि जल्द ही इन दोनों का विवाह हो जाएगा। शांता एक बहुत ही सरल, भोली और नेकदिल लड़की है, लेकिन वह पढ़ी-लिखी नहीं है। वह गांव के खुले माहौल में पली-बढ़ी है और उसके पास किताबी ज्ञान की कमी है। यही बात सुनील की माँ जानकी को खटकती है। जानकी एक अनुशासन प्रिय महिला है और वह चाहती है कि उसके डॉक्टर बेटे की पत्नी भी पढ़ी-लिखी और संस्कारी हो जो शहर के समाज में उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके।
जानकी की नजर में शोभा नाम की एक लड़की है जो पढ़ी-लिखी भी है और धनी परिवार से भी ताल्लुक रखती है। जानकी मन ही मन सुनील का रिश्ता शोभा के साथ तय करने का मन बना लेती है। वह शांता को बिल्कुल पसंद नहीं करती और उसे अनपढ़ और गँवार मानती है। जब सुनील को अपनी माँ की इस इच्छा के बारे में पता चलता है, तो वह धर्मसंकट में पड़ जाता है। एक तरफ उसका वह प्रेम है जिसके बिना वह जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता, और दूसरी तरफ उसकी वह माँ है जिसने उसके लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया।
कहानी में एक बड़ा मोड़ तब आता है जब शांता की माँ पार्वती अचानक बहुत बीमार हो जाती है। पार्वती की हालत इतनी खराब हो जाती है कि उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं दिखती। सुनील को तुरंत शहर से गांव बुलाया जाता है। अपनी अंतिम सांसें गिन रही पार्वती सुनील का हाथ शांता के हाथ में देती है और उससे यह वादा मांगती है कि वह उसकी बेटी का साथ कभी नहीं छोड़ेगा और उससे विवाह करेगा। अपनी माँ जैसी पार्वती की ममता और शांता के प्रति अपने प्रेम के कारण सुनील भारी मन से यह वादा कर देता है। पार्वती चैन की नींद सो जाती है और सुनील वापस शहर चला जाता है ताकि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सके और एक योग्य डॉक्टर बनकर लौट सके।
शहर में रहकर सुनील केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता है ताकि वह जल्द से जल्द अपनी डिग्री हासिल कर सके और गांव आकर शांता से विवाह कर सके। वह शांता को पत्र लिखता रहता है और उसे अपने भविष्य के सपने बताता है। लेकिन गांव में स्थितियां बहुत तेजी से बदल रही होती हैं। जानकी अपनी जिद पर अड़ी हुई थी और वह किसी भी कीमत पर शांता को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। इधर शांता के घर की स्थिति भी बिगड़ने लगती है। माँ के जाने के बाद वह अकेली पड़ जाती है और गांव के कुछ लोग उसकी सादगी का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।
समय बीतता है और सुनील अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर लेता है। वह एक काबिल डॉक्टर बनकर बड़े उत्साह के साथ अपने गांव वापस लौटता है। उसका इरादा गांव में ही एक अस्पताल खोलकर गरीबों की सेवा करना और शांता के साथ अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करना है। लेकिन जैसे ही वह गांव की सीमा में कदम रखता है, उसे एक ऐसा समाचार मिलता है जो उसके पैरों तले जमीन खिसका देता है। उसे पता चलता है कि शांता का विवाह हो चुका है। सुनील को विश्वास नहीं होता कि जिस शांता ने उसकी प्रतीक्षा करने का वचन दिया था और जिसकी माँ को उसने खुद वचन दिया था, वह इतनी जल्दी किसी और की कैसे हो सकती है।
सुनील को पता चलता है कि शांता का विवाह गांव के सबसे अमीर व्यक्ति लक्ष्मीपति से हुआ है। लक्ष्मीपति का किरदार अशोक कुमार ने निभाया है। लक्ष्मीपति न केवल शांता से उम्र में बहुत बड़े हैं, बल्कि वे एक विधुर भी हैं जिनका एक बच्चा भी था जो अब इस दुनिया में नहीं है। सुनील के मन में शांता के प्रति कड़वाहट भर जाती है। उसे लगता है कि शांता ने धन और ऐशो-आराम के लालच में आकर उसके प्रेम को ठुकरा दिया और अपनी माँ को दिए गए अंतिम वादे को भी तोड़ दिया।
हताश और क्रोधित सुनील शांता के सामने जाकर उससे यह सवाल पूछता है कि उसने ऐसा क्यों किया। वह उसे बेवफा और लालची कहता है। लेकिन शांता खामोश रहती है। उसकी आंखों में आंसू तो हैं, लेकिन उसकी जुबान पर एक अजीब सी चुप्पी है। वह सुनील को सच नहीं बता पाती कि किन परिस्थितियों में उसे यह विवाह करना पड़ा। वास्तव में, शांता ने यह बलिदान केवल सुनील के भविष्य और उसकी माँ की खुशी के लिए दिया था। जानकी ने शांता को यह विश्वास दिला दिया था कि यदि वह सुनील के जीवन में रही, तो सुनील कभी एक बड़ा डॉक्टर नहीं बन पाएगा और उसका करियर बर्बाद हो जाएगा। शांता ने सुनील की भलाई के लिए खुद को एक ऐसे रिश्ते में बांध लिया जहां प्रेम नहीं, केवल कर्तव्य था।
लक्ष्मीपति एक बहुत ही नेक इंसान हैं। वे शांता का बहुत सम्मान करते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि शांता के दिल में कौन है। जब सुनील गांव में अपना औषधालय खोलता है, तो उसका सामना बार-बार शांता और लक्ष्मीपति से होता है। सुनील का व्यवहार शांता के प्रति बहुत रूखा और अपमानजनक रहता है, जो लक्ष्मीपति को थोड़ा हैरान करता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, सुनील को धीरे-धीरे उन सच्चाइयों का पता चलता है जो शांता ने उससे छुपा रखी थीं।
फिल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया है, जो कहानी की संवेदनाओं को बहुत गहराई से छूता है। माला सिन्हा ने एक ऐसी महिला का किरदार बहुत ही प्रभावशाली ढंग से निभाया है जो अपने प्रेम की आहुति दे देती है लेकिन अपनी गरिमा नहीं खोती। संजीव कुमार ने एक दुखी और आक्रोशित प्रेमी के रूप में अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाया है। अशोक कुमार की उपस्थिति फिल्म को एक परिपक्वता प्रदान करती है।
अंत में, जब सुनील को जानकी की साजिश और शांता के महान त्याग के बारे में पता चलता है, तो उसका सारा क्रोध ग्लानि में बदल जाता है। वह शांता से क्षमा मांगना चाहता है, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी होती है। शांता अब लक्ष्मीपति की पत्नी है और वह अपने इस नए रिश्ते के प्रति पूरी तरह समर्पित है। फिल्म का अंत बहुत ही भावुक है, जहां यह दिखाया गया है कि कभी-कभी जीवन में प्यार पाना ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि निभाए गए कर्तव्य और दिए गए बलिदान इंसान को महान बनाते हैं।
यह फिल्म समाज की उन कुरीतियों पर भी प्रहार करती है जहां शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान से मापा जाता है, जबकि शांता जैसी अनपढ़ लड़की का चरित्र किसी भी शिक्षित व्यक्ति से कहीं अधिक ऊंचा और संस्कारी दिखाया गया है। कंगन एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में प्रेम का अर्थ केवल पाना है, या फिर अपने प्रिय की खुशी के लिए उसे छोड़ देना ही सच्चा प्रेम है।
इस कहानी का हर दृश्य मानवीय भावनाओं की एक नई परत खोलता है। गांव का दृश्य, मध्यमवर्गीय परिवार की मजबूरियां और एक माँ की अपनी संतानों के प्रति महत्वाकांक्षा, ये सभी तत्व मिलकर फिल्म को एक जीवंत रूप देते हैं। संजीव कुमार और माला सिन्हा की जोड़ी ने पर्दे पर जो जादू बिखेरा है, वह आज भी दर्शकों को याद है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि रिश्तों में कंगन की तरह चमक और मजबूती होनी चाहिए, जो हर मुश्किल घड़ी में साथ निभा सके।
फिल्म का निर्देशन बहुत ही सधा हुआ है और पटकथा इतनी मजबूत है कि दर्शक शुरू से अंत तक कहानी से जुड़े रहते हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि पुराने दौर के सिनेमा में किस तरह से सरल कहानियों के माध्यम से जीवन के बड़े पाठ पढ़ाए जाते थे। त्याग और समर्पण की यह गाथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि सत्तर के दशक में थी।
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