"MAYA" - HINDI CLASSIC MOVIE EXPLAIN / A ROMANTIC FAMILY DRAMA WITH DEV ANAND & MALA SINHA




Maya is a 1961 Bollywood film directed by D.D. Kashyap. The film stars Dev Anand and Mala Sinha along with Lalita Pawar in the main lead. the music of the film, composed by Maestro Salil Chowdhury and the songs penned by Majrooh Sultanpuri, the film was a big hit and was much liked. 


माया एक भावनाओं से भरी कहानी है। इस फिल्म का निर्देशन D. D. Kashyap ने किया था। इसमें मुख्य भूमिकाओं में Dev Anand और Mala Sinha थे। एक महत्वपूर्ण भूमिका में Lalita Pawar भी थीं। इस फिल्म का संगीत महान संगीतकार Salil Chowdhury ने बनाया था और गीतों को Majrooh Sultanpuri ने लिखा था। यह फिल्म बहुत पसंद की गई और लोगों के दिलों में जगह बना गई।


कहानी की शुरुआत एक बड़े घर से होती है। यह घर बहुत अमीर सेठ राम नारायण का है। उनका बेटा मनमोहन बहुत ही अमीर परिवार में पला बढ़ा है। उसके पास हर सुख सुविधा है। नौकर चाकर हैं, बड़ी हवेली है, गाड़ियाँ हैं और पैसे की कोई कमी नहीं।


एक दिन घर के नौकर गरिबू ने बाकी नौकरों को बुलाकर एक दावत रखी। सेठ जी शहर से बाहर थे और मनमोहन अपने दोस्तों के साथ अपना जन्मदिन मना रहा था। नौकरों ने सोचा कि जब मालिक नहीं हैं तो वे भी थोड़ी खुशी मना लें। वे अच्छे कपड़े पहनकर खाते पीते और हँसते बोलते हैं।


उधर मनमोहन अपने दोस्तों के साथ एक बड़ी पार्टी में है। सब लोग महंगे कपड़े पहने हुए हैं। संगीत बज रहा है। हँसी मजाक चल रहा है। लेकिन इस चमक दमक के बीच मनमोहन का मन खाली सा है। पार्टी के बाहर उसे उसका पुराना दोस्त दीपक दिखता है। दीपक साधारण कपड़ों में है। वह अंदर आने से हिचक रहा है। वह कहता है कि वह इस माहौल में अच्छा नहीं लगेगा। मनमोहन उसे मनाता है, लेकिन दीपक अंदर नहीं आता।


बातों बातों में मनमोहन को याद आता है कि दीपक ने कभी उससे अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए पैसे मांगे थे। वह कहता है कि वह घूमने चला गया और यह बात भूल गया। दीपक शांत स्वर में कहता है कि उसकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रही। इलाज न होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। यह सुनकर मनमोहन का दिल कांप जाता है। उसे पहली बार अपने अमीर होने का बोझ महसूस होता है। वह वापस पार्टी में जाता है। वहाँ उसे दूसरा झटका लगता है। वह सुनता है कि उसका एक दोस्त कह रहा है कि वह मनमोहन से दोस्ती सिर्फ अपने व्यापार के लिए करता है।


फिर वह अपनी प्रेमिका शीला की बात सुनता है। शीला किसी और से कह रही है कि वह मनमोहन से इसलिए प्यार जताती है क्योंकि वह अमीर है। असली प्यार नहीं है। इन तीन घटनाओं ने मनमोहन का दिल तोड़ दिया। वह उदास होकर घर लौटता है। रात को वह सो नहीं पाता। उसका मन बेचैन है। उसे लगता है कि उसके आसपास सब झूठ है। उसी रात उसके कमरे में एक चोर घुसता है। उसका नाम सुदेश है। वह गरीब है और मजबूरी में चोरी करता है। मनमोहन उसे पकड़ लेता है। उसके हाथ में छुरा है, लेकिन वह उसे चला नहीं पाता।


जब मनमोहन उससे पूछता है तो सुदेश रो पड़ता है। वह कहता है कि वह दिल से बुरा नहीं है। वह अपनी बहन श्यामा के लिए जीता है। अगर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया तो उसकी बहन टूट जाएगी। मनमोहन के मन में दया आ जाती है। वह कहता है कि वह उसे पुलिस को नहीं देगा। लेकिन बदले में वह एक शर्त रखता है। वह सुदेश से कहता है कि वह उसे गरीबों की जिंदगी दिखाए। वह खुद गरीबी में रहकर देखना चाहता है कि असली जीवन क्या होता है।


सुदेश पहले तो चौंकता है, लेकिन फिर मान जाता है। मनमोहन अपने अमीर कपड़े छोड़कर साधारण कपड़े पहन लेता है। वह अपना नाम बदलकर श्याम रख लेता है। दोनों उस बस्ती में जाते हैं जहाँ सुदेश रहता है। वहाँ छोटी छोटी झोपड़ियाँ हैं। लोग मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाते हैं। सुदेश की मौसी एक दयालु और सीधी महिला है। वह श्याम को किराए पर एक कमरा दे देती है। श्याम अब उसी बस्ती का हिस्सा बन जाता है।


पहली रात वह सुदेश के बिस्तर पर सोता है। सुबह जब श्यामा आती है तो उसे लगता है कि बिस्तर पर उसका भाई सो रहा है। वह उसे उठाने की कोशिश करती है। जब वह नहीं उठता तो वह उस पर पानी डाल देती है। तब उसे पता चलता है कि यह कोई और है। श्यामा शर्मिंदा हो जाती है। श्याम मुस्कुरा देता है। यही उनकी पहली मुलाकात है। धीरे धीरे दोनों के बीच दोस्ती हो जाती है। श्याम को श्यामा का सरल स्वभाव पसंद आता है। श्यामा को श्याम की सच्चाई और मेहनत पसंद आती है।


श्याम एक आइसक्रीम की गाड़ी पर काम करने लगता है। वह दिन भर मेहनत करता है। धूप में खड़ा रहता है। लोगों को आवाज लगाकर आइसक्रीम बेचता है। पहली बार उसे पसीना बहाकर कमाई का स्वाद मिलता है। उसे लगता है कि यह कमाई उसके अमीर घर के पैसों से ज्यादा सच्ची है। बस्ती में और भी लोग हैं। बांके नाम का एक आदमी है जो सुदेश के साथ काम करता है। वह थोड़ा चालाक है लेकिन दिल का बुरा नहीं है। उसे एक नाचने वाली लड़की से प्यार है जिसे सब मैडम कहते हैं। मैडम उसके प्यार का मजाक उड़ाती है, लेकिन अंदर से वह भी उसे चाहती है।


उन सबका सरदार रणवीर है। वह कठोर और लालची आदमी है। वह चोरी और गलत काम करता है। उसकी नजर श्यामा पर भी है। जब उसे पता चलता है कि श्यामा और श्याम एक दूसरे से प्रेम करते हैं तो वह गुस्से से भर जाता है। इधर श्याम और श्यामा का प्यार गहरा होता जाता है। वे सपने देखते हैं कि एक दिन छोटा सा घर होगा। सुदेश भी खुश है कि उसकी बहन को अच्छा साथी मिल रहा है। लेकिन श्याम के मन में एक डर है। वह जानता है कि उसकी असली पहचान छिपी हुई है। उधर मनमोहन के पिता सेठ राम नारायण शहर लौट आते हैं। उन्हें पता चलता है कि उनका बेटा घर से गायब है। वे परेशान हो जाते हैं।


वे खोज शुरू करते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि उनका अमीर बेटा अचानक कहाँ चला गया। बस्ती में भी हलचल है। रणवीर श्याम को सबक सिखाने की योजना बनाता है। वह चाहता है कि श्यामा उससे दूर हो जाए। एक दिन सच सामने आने लगता है। सेठ जी को पता चलता है कि उनका बेटा गरीब बस्ती में रह रहा है। वे वहाँ पहुँचते हैं। वे अपने बेटे को साधारण कपड़ों में देखकर हैरान हो जाते हैं। वे उसे डांटते हैं और कहते हैं कि यह सब नाटक बंद करो।


श्यामा को भी सच्चाई का पता चलता है कि श्याम असल में अमीर घर का मनमोहन है। उसे लगता है कि उससे धोखा हुआ है। वह रो पड़ती है। उसे लगता है कि उसने जिस पर भरोसा किया, उसने अपनी असली पहचान छिपाई। श्याम समझाने की कोशिश करता है। वह कहता है कि उसने उसे धोखा देने के लिए नहीं बल्कि सच्चाई जानने के लिए ऐसा किया। वह उससे सच्चा प्रेम करता है।रणवीर इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश करता है। लेकिन सुदेश और बांके मिलकर उसका सामना करते हैं। बस्ती के लोग भी साथ देते हैं।


अंत में सच्चाई और प्रेम की जीत होती है। मनमोहन अपने पिता को समझाता है कि असली खुशी पैसे में नहीं, इंसानियत में है। सेठ जी को भी अपनी गलती का एहसास होता है। वे समझते हैं कि उनका बेटा अब बच्चा नहीं रहा। उसने जीवन का सच देख लिया है। श्यामा भी अपने मन का भ्रम दूर करती है। वह समझती है कि श्याम का प्यार सच्चा है। दोनों का मिलन होता है। बस्ती के लोग खुश होते हैं।


यह कहानी हमें बताती है कि धन दौलत सब कुछ नहीं है। असली संपत्ति प्यार, विश्वास और सच्चाई है। माया नाम ही इस बात का संकेत है कि यह दुनिया कभी कभी भ्रम से भरी होती है। जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता। मनमोहन ने जब तक पैसे की चमक देखी, वह अधूरा था। जब उसने गरीबी का दर्द और सादगी की मिठास चखी, तभी वह पूरा इंसान बना। इस फिल्म में प्रेम है, त्याग है, सच्चाई है और जीवन का गहरा संदेश है। यही कारण है कि यह फिल्म लोगों को बहुत पसंद आई और आज भी याद की जाती है।

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