"HUM DONO" - HINDI ROMANTIC ACTION DRAMA FILM / DEV ANAND / VIJAY ANAND / SADHANA MOVIE



हम दोनो एक बहुत भावनात्मक और सुंदर प्रेम कहानी है। यह कहानी उस समय की है जब देश में बड़ा युद्ध चल रहा था। चारों ओर चिंता और डर का माहौल था। बहुत से जवान अपने घर और परिवार को छोड़कर देश की रक्षा के लिए जा रहे थे। इसी समय एक नौजवान की कहानी शुरू होती है, जिसका नाम आनंद है।


आनंद एक सीधा सादा, हंसमुख और बेफिक्र स्वभाव का युवक है। उसके पास धन दौलत नहीं है, कोई बड़ी नौकरी भी नहीं है, लेकिन उसके मन में बहुत प्रेम है और जीवन के प्रति विश्वास है। वह एक अमीर घर की लड़की मीता से प्रेम करता है। मीता भी आनंद से सच्चा प्रेम करती है। दोनों का सपना है कि वे विवाह करके एक छोटा सा सुखी घर बसाएं।


एक दिन मीता अपने पिता से आनंद के बारे में बात करती है। उसके पिता बहुत धनी और घमंडी व्यक्ति हैं। उन्हें अपनी इज्जत और समाज में ऊंची जगह का बहुत अभिमान है। अगले दिन आनंद उनसे मिलने उनके घर जाता है। उसी दिन आनंद को नौकरी के लिए एक साक्षात्कार में भी जाना था, लेकिन वह पहले मीता के पिता से मिलने पहुंच जाता है क्योंकि वह मीता से किया वादा निभाना चाहता है।


मीता के पिता आनंद को देखकर नाराज हो जाते हैं। वे कहते हैं कि जो युवक अपनी होने वाली पत्नी को खिलाने के लिए भी कमाई नहीं करता, वह विवाह की बात कैसे कर सकता है। वे यह भी कहते हैं कि जो व्यक्ति नौकरी पाने से पहले विवाह की सोचता है, वह जिम्मेदार नहीं है। उनके शब्द बहुत कठोर होते हैं। आनंद को गहरा आघात पहुंचता है। उसे लगता है कि उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है। वह चुपचाप वहां से चला जाता है।


घर लौटते समय वह रास्ते में सेना की एक बड़ी तस्वीर देखता है, जिसमें जवानों को देश सेवा के लिए बुलाया जा रहा है। उसके मन में अचानक एक विचार आता है। वह सोचता है कि यदि वह सेना में भर्ती हो जाए तो उसे नौकरी भी मिलेगी और सम्मान भी। वह तुरंत सेना में नाम लिखवा देता है। जब वह घर आकर अपनी मां को यह बात बताता है तो उसकी मां बहुत दुखी होती है। वह अपने बेटे को खोने के डर से रोने लगती है, लेकिन आनंद उसे समझाता है कि वह देश के लिए जा रहा है और जल्दी लौट आएगा।


मीता को अभी तक यह नहीं पता कि आनंद और उसके पिता के बीच क्या हुआ था। जब वह आनंद के घर जाती है तो उसे पता चलता है कि आनंद सेना में चला गया है। वह बहुत दुखी होती है। वह आनंद की मां से कहती है कि अब वह खुद को इस घर की बहू मानती है और जब तक आनंद लौटकर नहीं आता, वह उसकी मां की सेवा करेगी। वह यह भी ध्यान रखती है कि आनंद को यह बात पता न चले, क्योंकि वह नहीं चाहती कि उसका ध्यान डगमगाए।


समय बीतता है। आनंद को कठिन प्रशिक्षण दिया जाता है। वह धीरे धीरे एक सच्चा सैनिक बन जाता है। उसे युद्ध क्षेत्र में भेज दिया जाता है। वहां उसका परिचय मेजर वर्मा नाम के एक अधिकारी से होता है। आश्चर्य की बात यह है कि मेजर वर्मा का चेहरा बिल्कुल आनंद जैसा है। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि मेजर के चेहरे पर मूंछ है। पहली बार मिलते ही दोनों हैरान रह जाते हैं।


धीरे धीरे दोनों के बीच गहरी मित्रता हो जाती है। मेजर वर्मा गंभीर और जिम्मेदार स्वभाव के हैं। वे आनंद को अपने परिवार के बारे में बताते हैं। उनकी पत्नी का नाम रूमा है। उनकी मां भी उनके साथ रहती हैं। वे अपने घर और परिवार से बहुत प्रेम करते हैं। आनंद भी अपनी मां और मीता के बारे में बताता है। दोनों एक दूसरे के सुख दुख के साथी बन जाते हैं।


युद्ध बहुत भयानक होता है। गोलियां चलती हैं, बम गिरते हैं और हर दिन मौत का खतरा बना रहता है। एक दिन युद्ध के दौरान मेजर वर्मा लापता हो जाते हैं। बहुत खोजबीन होती है, लेकिन उनका कोई पता नहीं चलता। सेना उनके परिवार को एक संदेश भेजती है कि वे उन्हें खोज नहीं पा रहे हैं। सब लोग समझ लेते हैं कि शायद वे अब इस दुनिया में नहीं रहे।


आनंद बहुत दुखी होता है। वह अपने मित्र को खो चुका है। वह युद्ध में बहादुरी दिखाता है और उसे पदोन्नति मिलती है। कुछ समय बाद उसे छुट्टी मिलती है और वह घर लौट आता है। घर आकर उसे पता चलता है कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं रही। यह सुनकर उसका दिल टूट जाता है। मीता ने उसकी मां की आखिरी समय तक सेवा की थी। आनंद को यह जानकर मीता के प्रति और भी सम्मान होता है।


लेकिन आनंद के मन में एक और चिंता है। वह सोचता है कि मेजर वर्मा की पत्नी और मां किस हाल में होंगी। वह तय करता है कि वह खुद जाकर उन्हें यह दुखद समाचार देगा। जब वह उनके घर पहुंचता है तो मेजर की मां उसे देखकर खुशी से रो पड़ती हैं। उन्हें लगता है कि उनका बेटा वापस आ गया है। रूमा भी उसे देखकर बहुत प्रसन्न होती है।


आनंद सच्चाई बताने की कोशिश करता है, लेकिन वह उनकी खुशी देखकर चुप हो जाता है। वह परिवार के डॉक्टर से मिलकर सब कुछ सच बता देता है। डॉक्टर कहते हैं कि रूमा को दिल की बीमारी है। यदि उसे अचानक यह पता चला कि उसका पति नहीं रहा तो वह यह दुख सह नहीं पाएगी। डॉक्टर आनंद से विनती करते हैं कि वह कुछ समय तक मेजर वर्मा का अभिनय करता रहे।


आनंद बहुत उलझन में पड़ जाता है। वह झूठ नहीं बोलना चाहता, लेकिन वह किसी की जान भी खतरे में नहीं डालना चाहता। अंत में वह रूमा की सेहत के लिए यह भूमिका निभाने को तैयार हो जाता है। वह रोज उनके घर जाने लगता है। वह मेजर की तरह व्यवहार करता है, लेकिन उसके मन में अपराधबोध रहता है।


उधर मीता यह सब देख रही है। उसे समझ नहीं आता कि आनंद अचानक उस घर में इतना समय क्यों बिताने लगा है। एक दिन वह मंदिर में आनंद को रूमा के साथ देख लेती है। उसे लगता है कि आनंद उसे धोखा दे रहा है। उसका दिल टूट जाता है और वह आनंद से दूर हो जाती है।


आनंद खुद भी इस स्थिति से खुश नहीं है। वह रूमा से दूरी बनाए रखता है। रूमा को लगता है कि उसके पति का व्यवहार बदल गया है। वह पूछती है कि क्या अब वह उससे प्रेम नहीं करते। वह यह भी कहती है कि वह मां बनना चाहती है। आनंद उसे समझाता है कि युद्ध ने उसे बदल दिया है और वह अब संतान नहीं चाहता। रूमा को लगता है कि शायद उसका पति उससे दूर हो गया है।


उसी समय एक सच्चाई सामने आती है। मेजर वर्मा जीवित हैं। युद्ध में उनका एक पैर घायल हो गया है, लेकिन वे बच गए हैं। जब वे घर लौटते हैं तो देखते हैं कि उनके स्थान पर कोई और व्यक्ति है। वे गुस्से से भर जाते हैं। उन्हें लगता है कि आनंद उनकी पत्नी के साथ गलत संबंध बना रहा है।


एक दिन वे सुनसान रास्ते में आनंद को रोक लेते हैं। दोनों के बीच झगड़ा होता है। मेजर उसे मारने की कोशिश करते हैं, लेकिन आनंद उन्हें सच्चाई बताता है। वह कहता है कि उसने केवल उनके परिवार की खुशी और रूमा की जान बचाने के लिए यह सब किया है। वह कहता है कि यदि वे चाहें तो वह मंदिर में सबके सामने सच बता देगा।


अगले दिन मंदिर में सब इकट्ठा होते हैं। आनंद रूमा से पूछता है कि यदि उसका पति अपंग हो जाए तो क्या वह उसे छोड़ देगी। रूमा बिना एक पल सोचे कहती है कि वह अपने पति का साथ कभी नहीं छोड़ेगी। तभी असली मेजर सामने आते हैं। रूमा उन्हें देखकर भावुक हो जाती है और उनके गले लग जाती है।


मीता भी वहां होती है। वह सारी सच्चाई सुन लेती है। उसे अपनी गलती का एहसास होता है। वह समझ जाती है कि आनंद ने कोई गलत काम नहीं किया। दोनों की आंखों में आंसू आ जाते हैं और वे एक दूसरे को माफ कर देते हैं।


अंत में दोनों जोड़े साथ खड़े होते हैं। एक ओर मेजर और रूमा हैं, जिन्होंने सच्चे प्रेम की परीक्षा पास की। दूसरी ओर आनंद और मीता हैं, जिनका विश्वास फिर से जुड़ गया। मंदिर की घंटियां बजती हैं और सबके चेहरों पर मुस्कान लौट आती है। कहानी सुखद अंत के साथ समाप्त होती है, जहां प्रेम, त्याग और सच्चाई की जीत होती है।

****************************************

Post a Comment

0 Comments