Boy Friend is a 1961 Hindi-language romantic
comedy film directed by Naresh Saigal. The film
stars Shammi Kapoor, Madhubala, Dharmendra in
lead roles. The film's music is composed by Shankar-Jaikishan.
It revolves around Madan, who ran away from his house as a child and becomes a
thief.
यह कहानी एक मनोरंजक और भावनाओं से भरी फिल्म की है जिसका नाम है Boy Friend। इस फिल्म का निर्देशन Naresh Saigal ने किया था। इसमें मुख्य भूमिकाओं में थे Shammi Kapoor, Madhubala और Dharmendra। फिल्म का संगीत प्रसिद्ध जोड़ी Shankar-Jaikishan ने तैयार किया था। यह कहानी प्रेम, बिछड़न, पहचान, संघर्ष और सुधार की है। इसमें एक ऐसे युवक की कहानी है जो बचपन में अपने माता पिता से बिछड़ जाता है और बड़ा होकर गलत रास्ते पर चल पड़ता है, लेकिन अंत में सच्चाई और प्रेम उसे सही राह पर ले आते हैं।
कहानी की शुरुआत एक अमीर परिवार से होती है। ठाकुर हरचरण सिंह एक बहुत बड़े जमींदार और धनवान व्यक्ति हैं। उनकी पत्नी का नाम रजनी है। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा मदन और छोटा बेटा सुनील। घर में खुशियां हैं, धन है, सम्मान है। लेकिन एक दिन एक भयानक घटना सब कुछ बदल देती है।
आठ साल का मदन एक दिन किसी कारण से घर से दूर चला जाता है। भीड़ में वह अपने माता पिता से बिछड़ जाता है। बहुत खोजबीन होती है, पर वह नहीं मिलता। माता पिता का दिल टूट जाता है। वे हर जगह उसे ढूंढते हैं, पर कोई खबर नहीं मिलती। धीरे धीरे साल बीत जाते हैं। छोटा बेटा सुनील बड़ा होता है। वह अपने भाई को कभी नहीं भूलता। वह निश्चय करता है कि बड़ा होकर वह कानून की सेवा करेगा और अपने भाई को ढूंढेगा।
उधर मदन एक अनजान दुनिया में भटक रहा है। उसे कोई सहारा नहीं मिलता। भूख, गरीबी और अकेलापन उसे घेर लेते हैं। धीरे धीरे वह गलत संगत में पड़ जाता है। पेट की आग बुझाने के लिए वह छोटी मोटी चोरी करने लगता है। समय बीतता है और वह जवान हो जाता है। अब वह मदन के नाम से नहीं, बल्कि श्याम के नाम से जाना जाता है। वह एक छोटा चोर बन चुका है। कई बार पकड़ा जाता है और जेल भी जाता है।
जेल में उसकी मुलाकात शांति लाल नाम के एक बूढ़े आदमी से होती है। शांति लाल बहुत कमजोर और बीमार है। वह अपने अतीत को याद करके रोता है। वह बताता है कि गरीबी और कर्ज के कारण उसे अपनी दो बेटियों को छोड़ना पड़ा था। उनकी बेटियों के नाम हैं संगीता और सुषमा। वह श्याम से कहता है कि अगर वह कभी बाहर जाए तो उसकी बेटियों को ढूंढ कर यह संदेश दे कि उनका पिता उन्हें बहुत याद करता है और उनसे मिलना चाहता है।
कुछ समय बाद श्याम जेल से छूटता है। वह जीवन से थक चुका है। वह सोचता है कि क्या हमेशा चोरी करके ही जीना है। वह एक रेलगाड़ी में बैठकर मुंबई जाने का निश्चय करता है। वह मन में ठान लेता है कि शांति लाल की बेटियों को जरूर ढूंढेगा।
मुंबई पहुंचकर वह भीड़ भरी सड़कों पर घूमता है। वह जगह जगह पूछताछ करता है। एक दिन उसकी नजर एक लड़की पर पड़ती है। वह लड़की सुषमा है। वह एक गाड़ी में बैठकर कहीं जा रही होती है। श्याम उसका पीछा करता है। वह गाड़ी एक नाटक घर के सामने रुकती है। वह नाटक घर ठाकुर हरचरण सिंह का है।
उसी समय ठाकुर हरचरण सिंह अपनी पत्नी के साथ वहां पहुंचते हैं। उन्हें अपने बेटे की कोई खबर नहीं है, पर उनका जीवन आगे बढ़ चुका है। छोटा बेटा सुनील अब पुलिस अधिकारी बन चुका है। वह अपने खोए हुए भाई की तलाश में लगा रहता है।
नाटक घर में सुषमा की बड़ी बहन संगीता एक नए नाटक के लिए नृत्य का अभ्यास कर रही है। नाटक का नाम है बाय फ्रेंड। इस नाटक में नायिका तो है, पर नायक नहीं मिल रहा। सब लोग परेशान हैं कि कौन मुख्य भूमिका निभाएगा।
इसी बीच भीड़ में कोई ठाकुर साहब की पत्नी का हार चुरा लेता है। पुलिस अधिकारी सुनील अपने सिपाहियों के साथ वहां आता है। वह चोर को पकड़ने की कोशिश करता है। भागदौड़ मच जाती है। श्याम यह सब देख रहा होता है। वह देखता है कि असली चोर वह हार सुषमा की गाड़ी में रखे एक डिब्बे में छिपा देता है।
श्याम के मन में संघर्ष होता है। वह खुद भी चोर है, पर वह जानता है कि यह चोरी बहनों ने नहीं की। रात को वह चुपके से उनके घर में जाता है। वह गाड़ी से वह हार निकाल लेता है। वहां उसकी मुलाकात संगीता से होती है। पहले तो वह डर जाती है, पर जब श्याम शांति लाल का संदेश देता है, तो दोनों बहनें भावुक हो जाती हैं। उन्हें अपने पिता की याद आ जाती है। वे श्याम को धन्यवाद देती हैं और उसे अपने घर में रहने का निमंत्रण देती हैं।
श्याम के मन में पहली बार सच्चा अपनापन आता है। उसे लगता है कि जैसे उसे परिवार मिल गया हो। वह अगले दिन सुबह हार वापस करने के लिए निकलता है ताकि निर्दोष लोगों पर आरोप न लगे। वह सुनील को हार देने जा रहा होता है, पर रास्ते में ठाकुर साहब का नौकर संपत उससे हार छीन लेता है और एक सौदागर को बेच देता है।
जब चोरी का दोष बहनों पर आता है तो श्याम बहुत दुखी होता है। वह निश्चय करता है कि अब वह चोरी का जीवन छोड़ देगा। वह ईमानदारी से काम करेगा। तभी उसकी नजर एक सूचना पर पड़ती है जिसमें लिखा है कि नाटक बाय फ्रेंड के लिए एक नायक की आवश्यकता है। वह हिम्मत करके नाटक घर में जाता है और अभिनय के लिए खड़ा होता है।
ठाकुर हरचरण सिंह उसे देखते हैं। श्याम का अभिनय सबको पसंद आता है। उसे नाटक का नायक बना लिया जाता है। संगीता और श्याम साथ में अभ्यास करते हैं। धीरे धीरे दोनों के बीच प्रेम जन्म लेता है। संगीता को श्याम का सरल मन और सच्चाई अच्छी लगती है। श्याम भी उसे दिल से चाहने लगता है।
नाटक शिमला में प्रस्तुत किया जाता है। वहां लोगों को यह बहुत पसंद आता है। श्याम अब एक नया जीवन शुरू कर चुका है। वह अपने अतीत को पीछे छोड़ देना चाहता है। लेकिन भाग्य फिर परीक्षा लेता है।
एक दिन श्याम और संगीता बर्फ पर घूमने जाते हैं। खेलते खेलते संगीता गिर जाती है और उसका पैर टूट जाता है। डॉक्टर कहते हैं कि उसका इलाज और शल्य चिकित्सा बहुत महंगी है। अब वह नाटक में काम नहीं कर सकती। आय का साधन बंद हो जाता है।
ठाकुर हरचरण सिंह का प्रबंधक बहनों के घर आता है। वह कहता है कि उन पर कर्ज है। अगर वे पैसा नहीं चुकाएंगी तो उनका घर छीन लिया जाएगा। यह सुनकर श्याम का खून खौल उठता है। वह गुस्से में नाटक की नौकरी छोड़ देता है। वह सोचता है कि ऐसे कठोर आदमी के लिए काम नहीं करेगा।
अब समस्या यह है कि संगीता के इलाज के लिए बहुत धन चाहिए। श्याम के पास कोई काम नहीं है। उसके सामने फिर वही पुराना रास्ता खड़ा है। चोरी करके वह तुरंत पैसा ला सकता है। लेकिन वह अपने आप से वादा कर चुका है कि वह गलत काम नहीं करेगा।
वह दिन रात मेहनत की तलाश करता है। छोटे छोटे काम करता है। वह भूखा भी रहता है, पर चोरी नहीं करता। उसके मन में संघर्ष चलता है। एक ओर संगीता का इलाज, दूसरी ओर ईमानदारी का रास्ता। वह सोचता है कि अगर वह फिर चोरी करेगा तो सबका विश्वास टूट जाएगा।
इधर पुलिस अधिकारी सुनील भी एक बड़े चोर की तलाश में है। उसे नहीं पता कि उसका अपना भाई उसके सामने है। कई बार दोनों आमने सामने आते हैं, पर पहचान नहीं पाते। भाग्य दोनों को पास ला रहा है।
धीरे धीरे सच सामने आने लगता है। संपत की साजिश उजागर होती है। वह मान लेता है कि उसी ने हार चुराया था। श्याम निर्दोष साबित होता है। ठाकुर हरचरण सिंह को भी अपने व्यवहार पर पछतावा होता है। उन्हें एहसास होता है कि धन से बड़ा इंसान का दिल होता है।
आखिरकार सुनील को पता चलता है कि श्याम ही उसका खोया हुआ बड़ा भाई मदन है। कुछ पुराने निशान और यादें इस सच्चाई को सामने लाती हैं। माता रजनी अपने बेटे को पहचान लेती हैं। परिवार फिर से एक हो जाता है। श्याम की आंखों में आंसू आ जाते हैं। उसे अपना असली घर मिल जाता है।
ठाकुर हरचरण सिंह भी अपनी गलती मानते हैं। वे बहनों का कर्ज माफ कर देते हैं और संगीता के इलाज का खर्च उठाते हैं। शल्य चिकित्सा सफल होती है। संगीता धीरे धीरे ठीक हो जाती है।
अंत में प्रेम और सच्चाई की जीत होती है। श्याम अब मदन के रूप में अपने परिवार के साथ है। वह संगीता से विवाह करता है। सुषमा को भी सुख मिलता है। सुनील को अपना भाई मिल जाता है। शांति लाल को भी अपनी बेटियों का समाचार मिलता है।
यह कहानी बताती है कि इंसान चाहे कितना भी गिर जाए, अगर वह सच्चाई और प्रेम का साथ दे तो वह फिर उठ सकता है। परिवार का बिछड़ना दुख देता है, पर मिलन सब घाव भर देता है। ईमानदारी कठिन है, पर अंत में वही जीतती है। प्रेम सबको बदल सकता है और अंधेरे जीवन में भी उजाला ला सकता है।
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