"BETI" - HINDI EMOTIONAL FAMILY DRAMA FILM REVIEW / SANJAY KHAN & NANDA MOVIE



Beti, is a 1969 Hindi drama film starring Sanjay KhanNanda and Kamini Kaushal in lead roles. READ MORE ...


यह कहानी एक बेटी के त्याग, सहनशीलता, प्रेम और कर्तव्य की है। यह कहानी हमें बताती है कि एक छोटी सी बच्ची कैसे हालात के बोझ तले बड़ी हो जाती है और अपने पूरे जीवन को परिवार के लिए समर्पित कर देती है।


वर्मा जी एक सीधे सादे और ईमानदार व्यक्ति थे। उनकी पत्नी का देहांत बहुत पहले हो गया था। घर में अब केवल वे और उनके दो बच्चे थे। बड़ा बच्चा एक छोटी सी बेटी थी, जिसका नाम सुधा था। वह खुद भी बहुत छोटी थी। उसकी उम्र इतनी कम थी कि उसे अभी खेलना चाहिए था, लेकिन हालात ने उसे बहुत जल्दी समझदार बना दिया। दूसरा बच्चा एक नन्हा सा बेटा था, जिसका नाम मुन्ना था। मुन्ना अभी ठीक से बोल भी नहीं पाता था।


घर में कोई और नहीं था। वर्मा जी दफ्तर जाते थे और सुधा घर संभालती थी। वह अपने छोटे भाई को संभालती, उसे खिलाती, सुलाती और पिता के आने का इंतजार करती। सुधा खुद भी बच्ची थी, लेकिन उसकी आंखों में मासूमियत के साथ जिम्मेदारी भी झलकती थी। वह पिता के लिए पानी लाती, खाना बनाने की कोशिश करती और घर को साफ रखती।


एक दिन जब सुधा चूल्हे पर खाना बना रही थी, उसका पैर जल गया। दर्द बहुत था, लेकिन उसने रोना नहीं किया। उसने अपना पैर पानी में रखा और फिर भी खाना बनाती रही। उसे लगता था कि अगर वह काम नहीं करेगी तो उसके पिता और भाई भूखे रह जाएंगे। वर्मा जी यह सब देखकर अंदर ही अंदर टूट जाते थे। उन्हें अपनी बेटी पर गर्व भी होता था और दुख भी।


कुछ समय बाद वर्मा जी ने दोबारा विवाह करने का फैसला किया। उन्हें लगा कि घर में एक औरत होगी तो बच्चों को सहारा मिलेगा। उन्होंने कमला नाम की एक औरत से शादी कर ली। शुरुआत में कमला ठीक लगती थी, लेकिन धीरे धीरे उसका असली स्वभाव सामने आने लगा।


कमला सुधा को पसंद नहीं करती थी। वह हर बात पर सुधा को डांटती, उसे काम में झोंक देती और उसे प्यार नहीं देती थी। मुन्ना को भी वह बोझ समझती थी। वर्मा जी काम पर चले जाते और घर में कमला का राज चलता। सुधा चुपचाप सब सहती रहती। वह पिता से कभी शिकायत नहीं करती थी क्योंकि उसे डर था कि कहीं घर और बिगड़ न जाए।


एक दिन एक बहुत बड़ा दुख घर पर आ गिरा। मुन्ना खेलते खेलते कुएं के पास चला गया। किसी का ध्यान नहीं था। अचानक मुन्ना कुएं में गिर गया और डूब गया। जब तक लोग पहुंचे, बहुत देर हो चुकी थी। मुन्ना की मौत हो गई।


यह हादसा पूरे घर को तोड़ गया। वर्मा जी गहरे सदमे में चले गए। सुधा घंटों रोती रही। कमला ने दुख दिखाया जरूर, लेकिन उसके मन में सच्चा दर्द नहीं था। इसके बाद घर का माहौल और भी कड़वा हो गया। कमला सुधा को इस हादसे का दोष देने लगी। वह कहती कि अगर सुधा ठीक से देखभाल करती तो मुन्ना जिंदा होता।


साल बीतते गए। सुधा बड़ी होती गई। घर में प्यार नाम की कोई चीज नहीं थी। कमला का व्यवहार और कठोर होता गया। सुधा ने पढ़ाई पूरी की और एक दफ्तर में नौकरी करने लगी। वह वहां सचिव का काम करती थी। उसका स्वभाव शांत, मेहनती और ईमानदार था। दफ्तर में सभी लोग उसकी इज्जत करते थे।


एक दिन दफ्तर जाते समय सड़क पर एक घटना घटी। एक तेज रफ्तार गाड़ी सुधा को टक्कर मारते मारते बची। गाड़ी से एक युवक उतरा और माफी मांगने लगा। उसका नाम राजेश था। वह पढ़ा लिखा, सभ्य और अच्छे दिल का इंसान था। उस दिन के बाद दोनों की कभी कभी मुलाकात होने लगी।


राजेश का एक दोस्त था, जिसका नाम सुधीर था। परिवार वालों ने सुधा के लिए एक रिश्ता तय किया। सुधा को बताया गया कि उसका रिश्ता राजेश से तय हुआ है। उधर सुधीर को भी यही बताया गया कि उसका रिश्ता सुधा से है, लेकिन वह समझ बैठा कि सुधा वही लड़की है जिसे राजेश पसंद करता है। इस गलतफहमी में दोनों खुश थे।


सुधा ने राजेश को बताया कि घर वालों ने उसकी सगाई तय कर दी है और वह बहुत खुश है। राजेश यह सुनकर चुप हो गया। उसे लगा कि सुधा का रिश्ता सुधीर से है, लेकिन वह अपनी दोस्ती की वजह से कुछ कह नहीं सका। उधर सुधीर भी यही समझता रहा कि सुधा राजेश की होने वाली पत्नी है और वह बस एक औपचारिक रिश्ता निभा रहा है।


जब सच्चाई सामने आई तो सब हैरान रह गए। सुधा को पता चला कि जिससे उसका रिश्ता तय हुआ है, वह राजेश नहीं बल्कि सुधीर है। इस सच्चाई से सुधा का दिल टूट गया। लेकिन उसने अपने दिल की बात किसी से नहीं कही। उसने परिवार की इज्जत के बारे में सोचा और तय किया कि वह सुधीर से ही शादी करेगी।


शादी की तैयारी शुरू हुई। वर्मा जी के पास ज्यादा पैसे नहीं थे। दहेज के लिए उन्होंने अपना घर बेच दिया। उन्हें चालीस हजार रुपये मिले। यह उनके जीवन की सारी पूंजी थी। उन्होंने वह पैसा कमला को संभालने के लिए दिया।


कमला के मन में लालच था। उसने सारे पैसे चुरा लिए और घर से चली गई। शादी वाले दिन जब दहेज नहीं मिला तो बारात लौट गई। शादी टूट गई। यह अपमान वर्मा जी सहन नहीं कर पाए। उन्हें लकवा मार गया और उनका शरीर काम करना बंद कर गया।


अब घर में न पैसा था, न सहारा। कमला जा चुकी थी। सुधा ने पिता की सेवा करना शुरू किया। वह दिन रात उनकी देखभाल करती। कई बार घर में खाने को कुछ नहीं होता था। दोनों भूखे सो जाते थे। सुधा काम पर जाती और जो थोड़ा बहुत कमाती, उसी से घर चलाती।


इधर राजेश को जब पता चला कि सुधा की शादी टूट गई है, तो वह उसे ढूंढने निकल पड़ा। वह सुधा से मिलना चाहता था और उसे अपने दिल की बात बताना चाहता था।


वर्मा जी खुद को बेटी पर बोझ समझने लगे। एक दिन वह चुपचाप घर से निकल गए। सुधा जब घर लौटी तो पिता को न पाकर टूट गई। उसने समझ लिया कि पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे।


आगे की कहानी दर्द, आंसू और अंत में सच्चे प्रेम और त्याग की जीत की है। सुधा की जिंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखाया, लेकिन उसने कभी अपने संस्कार नहीं छोड़े। यह कहानी एक बेटी की है, जो हर दुख सहकर भी अपने परिवार को संभालती है और अंत में सच्चाई और प्रेम की राह पर आगे बढ़ती है।

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