"BADI DIDI" - HINDI EMOTIONAL FAMILY DRAMA FILM / JEETENDRA / NANDA MOVIE

 




Badi Didi is a 1969 Hindi-language drama film, produced by Narendra Suri and Nand Kumar under the Archana Films banner and directed by Narendra Suri. Starring JeetendraNanda and music composed by Ravi.


यह एक हिंदी कहानी है जो परिवार, त्याग, कर्तव्य और सच्चे प्रेम पर आधारित है।


केशव प्रसाद डाकघर में काम करने वाले एक ईमानदार और सम्मानित व्यक्ति हैं। वह अपनी बेटी भावना के साथ सादा और आदरपूर्ण जीवन जीते हैं। उनके बड़े भाई के देहांत के बाद उन्होंने भाई के बच्चों अनिल और अनीता को भी अपने घर में पाला और उन्हें अपने बच्चों की तरह रखा। केशव प्रसाद का जीवन कठिन जरूर है, लेकिन वह अपने कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटते।


एक यात्रा के दौरान भावना की मुलाकात अमर वर्मा से होती है, जो सेना में अधिकारी हैं। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगते हैं। थोड़े समय में उनके मन में प्रेम जन्म लेता है। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि दोनों एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और फिर लंबे समय तक एक-दूसरे का कोई पता नहीं चलता।


इसी बीच केशव प्रसाद अनीता के विवाह की चिंता में डूबे रहते हैं। उनके पास दहेज के लिए पैसे नहीं होते, जिससे वह बहुत परेशान हो जाते हैं। उनके मित्र दयाल, जो डाकघर में ही काम करते हैं, उन्हें ढाढ़स बंधाते हैं और सही राह पर चलने की सलाह देते हैं।


भावना के कॉलेज के प्रधानाचार्य दीनदयाल वर्मा भावना के अच्छे संस्कार, मेहनत और त्याग से बहुत प्रभावित होते हैं। वे चाहते हैं कि भावना का विवाह उनके बेटे से हो। केशव प्रसाद इस रिश्ते से बहुत खुश होते हैं और इसे स्वीकार कर लेते हैं। जब भावना होने वाले दूल्हे को देखने जाती है, तो वह अमर को देखकर चकित और बहुत प्रसन्न हो जाती है। दोनों को लगता है कि किस्मत ने उन्हें फिर से मिला दिया है।


एक रात एक दुखी महिला मदद मांगने के लिए केशव प्रसाद के घर आती है। वह डाकघर से पैसे निकालना चाहती है। इंसानियत के कारण केशव प्रसाद नियम तोड़ देते हैं। इस गलती की सजा उन्हें मिलती है और उन्हें जेल जाना पड़ता है। इसके बाद भावना पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ जाती है।


भावना बहुत कठिनाइयों का सामना करती है, लेकिन अमर उसका साथ देता है। भावना अपनी पढ़ाई पूरी करती है, अनिल को स्नातक बनते देखती है और अनीता का विवाह भी सफलतापूर्वक करा देती है। वह हर जिम्मेदारी चुपचाप निभाती रहती है।


इसी दौरान देश में आपात स्थिति घोषित होती है और अमर को युद्ध के लिए जाना पड़ता है। उसका और भावना का विवाह रुक जाता है। अमर देश की रक्षा के लिए निकल जाता है। उसी समय अनिल अपनी प्रेमिका आरती से विवाह कर लेता है। आरती का व्यवहार भावना के प्रति अपमानजनक होता है, जिससे भावना को बहुत दुख होता है।


कुछ समय बाद खबर आती है कि अमर युद्ध में शहीद हो गया है। यह सुनकर भावना पूरी तरह टूट जाती है। उसका जीवन फिर अंधेरे में डूब जाता है। बाद में दीनदयाल वर्मा भावना पर दबाव डालकर उसका विवाह कहीं और तय करना चाहते हैं। भावना मन से तैयार नहीं होती, लेकिन हालात के आगे चुप हो जाती है।


तभी किस्मत एक बार फिर करवट लेती है। अमर जीवित लौट आता है। उसी समय केशव प्रसाद भी निर्दोष साबित होते हैं और उन्हें सम्मान के साथ आज़ादी मिल जाती है। अनिल और आरती अपनी गलतियों का एहसास करते हैं और भावना से माफी मांगते हैं।


अंत में सभी दुख समाप्त हो जाते हैं। अमर और भावना का विवाह होता है। परिवार फिर से एक साथ खुशहाल जीवन जीने लगता है। कहानी प्रेम, त्याग और सच्चाई की जीत के साथ सुखद अंत पर समाप्त होती है।

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