फिल्म 'समाधि' के निर्माण और निर्देशन का श्रेय निर्देशक प्रकाश मेहरा और निर्माता रमेश बहल को जाता है, जिसकी पटकथा सतीश भटनागर और गुलशन नंदा द्वारा लिखी गई है। इस फिल्म में धर्मेंद्र ने लखन सिंह और अजय की दोहरी भूमिका निभाई है, जबकि आशा पारेख ने चंपा और जया भादुड़ी ने रेखा के रूप में मुख्य भूमिकाएं अदा की हैं; इनके साथ राज मेहरा, मुराद और अभि भट्टाचार्य जैसे कलाकार भी सहायक भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म का संगीत आर. डी. बर्मन ने तैयार किया है, जिसके बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे हैं और इसे किशोर कुमार, लता मंगेशकर एवं आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी है। तकनीकी पक्ष में एन. सत्यन ने छायांकन और आर. डी. महाडिक ने संपादन का कार्य संभाला है, जबकि इसका वितरण रोज़ मूवीज़ और यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स द्वारा किया गया है।
यह कहानी साल 1972 की मशहूर हिंदी फिल्म 'समाधि' की है, जिसका निर्देशन फिल्म जगत के दिग्गज निर्देशक प्रकाश मेहरा ने किया था। यह फिल्म अपने समय की एक बड़ी हिट साबित हुई थी और आज भी इसे धर्मेंद्र के बेहतरीन अभिनय और आर. डी. बर्मन के शानदार संगीत के लिए याद किया जाता है। इस फिल्म में धर्मेंद्र ने दोहरी भूमिका निभाई है, जिसमें वे पिता और पुत्र दोनों के किरदारों में नजर आते हैं। उनके साथ मुख्य अभिनेत्रियों के रूप में आशा पारेख और जया भादुड़ी ने काम किया है।
कहानी की शुरुआत लखन सिंह नाम के एक व्यक्ति से होती है, जिसे धर्मेंद्र ने निभाया है। लखन सिंह एक बहुत ही स्वाभिमानी लेकिन डकैतों के गिरोह में फंसा हुआ इंसान है। वह असल में बुरा आदमी नहीं है, लेकिन परिस्थितियों ने उसे एक अपराधी बना दिया है। वह अपनी पत्नी चंपा (आशा पारेख) से बहुत प्यार करता है। लखन सिंह का एक छोटा बेटा है जिसका नाम अजय है। लखन चाहता है कि उसका बेटा पढ़-लिखकर एक नेक इंसान बने और कभी भी अपराध की दुनिया में कदम न रखे। वह अपनी पत्नी से वादा करता है कि वह जल्द ही यह सब छोड़ देगा और एक नई जिंदगी शुरू करेगा।
लेकिन अपराध की दुनिया से बाहर निकलना इतना आसान नहीं होता। लखन सिंह का सामना पुलिस अधिकारी से होता है और एक मुठभेड़ के दौरान वह बुरी तरह घायल हो जाता है। मरने से पहले वह अपनी पत्नी चंपा को कहता है कि वह अजय को लेकर कहीं दूर चली जाए और उसे कभी न बताए कि उसका बाप एक डाकू था। लखन सिंह की मौत के बाद चंपा अपने बेटे अजय को लेकर शहर चली जाती है। वह अपनी पहचान बदल लेती है और बड़ी मुश्किलों से मेहनत-मजदूरी करके अजय को पढ़ाती-लिखाती है। अजय बड़ा होकर एक ईमानदार और जांबाज पुलिस ऑफिसर बनता है। बड़े अजय की भूमिका भी धर्मेंद्र ने ही निभाई है।
अजय को अपने पिता के बारे में कुछ भी पता नहीं होता। उसे लगता है कि उसके पिता एक साधारण इंसान थे जिनकी मौत बीमारी या किसी हादसे में हुई थी। चंपा ने उसे हमेशा यही सिखाया कि कानून का सम्मान करना ही सबसे बड़ा धर्म है। शहर में अजय की मुलाकात रेखा (जया भादुड़ी) से होती है। रेखा एक चुलबुली और नेक दिल लड़की है। दोनों के बीच प्यार हो जाता है। फिल्म में अजय और रेखा के बीच कई खूबसूरत गाने फिल्माए गए हैं, जैसे "जाने जाना"।
कहानी में मोड़ तब आता है जब अजय को एक बड़े डकैत गिरोह को पकड़ने की जिम्मेदारी दी जाती है। यह वही गिरोह होता है जिससे उसके पिता लखन सिंह जुड़े हुए थे। इस गिरोह का मुखिया बहुत ही चालाक और निर्दयी है। जब अजय अपनी जांच शुरू करता है, तो उसे धीरे-धीरे अपने अतीत के पन्ने खुलने का अहसास होता है। उसे कुछ ऐसे सुराग मिलते हैं जो सीधे उसके पिता की ओर इशारा करते हैं। चंपा यह सब देखकर बहुत घबरा जाती है। उसे डर है कि अगर अजय को सच्चाई पता चली, तो वह टूट जाएगा या फिर समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा।
इसी बीच फिल्म का सबसे मशहूर गाना "कांटा लगा" आता है, जो एक कव्वाली के रूप में है और फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करता है। अजय अपनी ड्यूटी के प्रति बहुत वफादार है। वह डकैतों के अड्डे पर छापा मारता है। वहां उसकी मुठभेड़ एक बूढ़े डकैत से होती है जो कभी लखन सिंह का करीबी दोस्त था। वह अजय की शक्ल देखकर हैरान रह जाता है क्योंकि अजय बिल्कुल अपने पिता लखन सिंह जैसा दिखता है। वह डकैत अजय को सच्चाई बता देता है कि वह जिस वर्दी पर गर्व करता है, उसी वर्दी ने उसके पिता की जान ली थी।
अजय के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। वह अपनी मां चंपा से जाकर सवाल करता है। चंपा रोते हुए सब सच बता देती है। वह बताती है कि लखन सिंह बुरे नहीं थे, बस हालात ने उन्हें डाकू बना दिया था। अजय अब एक बड़े धर्मसंकट में फंस जाता है। एक तरफ उसके पिता का सम्मान है और दूसरी तरफ उसकी अपनी पुलिस की ड्यूटी। वह तय करता है कि वह अपने पिता के नाम पर लगे दाग को साफ करेगा। वह उन डकैतों को पकड़ने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देता है जिन्होंने उसके पिता को गलत रास्ते पर धकेला था।
फिल्म के क्लाइमेक्स में जबरदस्त एक्शन और ड्रामा देखने को मिलता है। अजय अपनी चतुराई और बहादुरी से पूरे गिरोह का खात्मा कर देता है। अंत में उसे अहसास होता है कि इंसान की पहचान उसके कर्मों से होती है, उसके जन्म से नहीं। लखन सिंह ने जो बलिदान दिया था और चंपा ने जो तपस्या की थी, अजय उसे सफल बनाता है। फिल्म का अंत बहुत ही भावनात्मक होता है जहाँ अजय और रेखा एक हो जाते हैं और चंपा को संतोष मिलता है कि उसका बेटा एक सच्चा नायक बना।
यह फिल्म बलिदान, प्यार और ईमानदारी की एक अनूठी गाथा है। प्रकाश मेहरा ने जिस तरह से पिता और पुत्र के रिश्तों को पर्दे पर उतारा, वह काबिले तारीफ है। आर. डी. बर्मन का संगीत इस फिल्म की जान है। "जब तक रहे" और "कांटा लगा" जैसे गाने आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उस समय थे। धर्मेंद्र ने दोनों भूमिकाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।



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