यह कहानी साल 1972 की एक बहुत ही मशहूर और सुपरहिट फिल्म 'जवानी दीवानी' की है। यह फिल्म अपने समय की एक बेहतरीन संगीतमय प्रेम कहानी मानी जाती है जिसे निर्देशक नरेंद्र बेदी ने बनाया था। इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में रणधीर कपूर, जया भादुड़ी, बलराज साहनी और निरुपा रॉय जैसे दिग्गज कलाकार शामिल थे। इस फिल्म की एक खास बात यह भी है कि मशहूर अभिनेता और लेखक कादर खान ने इसी फिल्म से संवाद लेखक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। फिल्म का संगीत महान संगीतकार आर. डी. बर्मन ने दिया था और इसके गाने आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं जैसे कि "जाने जां ढूंढता फिर रहा", "सामने ये कौन आया", "नहीं नहीं अभी नहीं" और फिल्म का शीर्षक गीत "ये जवानी है दीवानी"।
कहानी की शुरुआत एक बड़े और सम्मानित ठाकुर परिवार से होती है। ठाकुर अपने उसूलों और खानदान की मर्यादा को सबसे ऊपर रखते हैं। उनकी एक बहन है जिसका नाम मधु है। मधु एक बहुत ही चंचल और साफ दिल की लड़की है। मधु को रवि आनंद नाम के एक युवक से प्यार हो जाता है। रवि आनंद कोई अमीर घराने का लड़का नहीं है बल्कि वह उसी ठाकुर के घर में काम करने वाले एक कर्मचारी का बेटा है। जब ठाकुर को इस बात का पता चलता है कि उनकी बहन एक मामूली नौकर के बेटे से प्यार करती है तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे मधु को बहुत समझाते हैं और उसे खानदान की इज्जत की दुहाई देते हैं लेकिन मधु अपने प्यार पर अडिग रहती है। अंत में मधु और रवि शादी कर लेते हैं। इस बात से नाराज होकर ठाकुर मधु से अपने सारे रिश्ते तोड़ लेते हैं और उसे हमेशा के लिए घर से निकाल देते हैं।
शादी के बाद मधु रवि के घर रहने आ जाती है। रवि का एक छोटा भाई है जिसका नाम विजय है। विजय एक बहुत ही जिंदादिल, हंसमुख और कॉलेज जाने वाला नौजवान है। विजय को अपनी पढ़ाई और दोस्तों के साथ मस्ती करना बहुत पसंद है। रवि और मधु विजय को अपने बच्चे की तरह प्यार करते हैं। रवि के घर की आर्थिक स्थिति ठाकुर के घर जैसी तो नहीं है लेकिन वहां प्यार और खुशियों की कोई कमी नहीं है। मधु बहुत ही समझदारी से उस छोटे से घर को संभालती है और रवि का पूरा साथ देती है। विजय अपनी भाभी मधु का बहुत सम्मान करता है और वे दोनों एक अच्छे दोस्त की तरह रहते हैं।
कहानी में नया मोड़ तब आता है जब विजय की मुलाकात कॉलेज में नीता नाम की एक लड़की से होती है। नीता बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान है। शुरुआत में विजय और नीता के बीच छोटी-मोटी तकरार होती है जो अक्सर कॉलेज के दिनों में लड़के-लड़कियों के बीच देखी जाती है। विजय नीता को चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता और नीता भी उसे करारा जवाब देती है। धीरे-धीरे यह नोकझोंक दोस्ती में बदल जाती है और फिर दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है। विजय और नीता के प्यार के बीच कई खूबसूरत गाने और रोमांटिक पल आते हैं जो फिल्म को बहुत ही रंगीन बनाते हैं। लेकिन विजय को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि नीता असल में उसी ठाकुर की बेटी है जिसने उसकी भाभी मधु को घर से निकाल दिया था।
ठाकुर अपनी बेटी नीता को बहुत प्यार करते हैं लेकिन वे आज भी अपनी पुरानी सोच और अहंकार में डूबे हुए हैं। उन्होंने नीता की शादी बचपन में ही बेनी सिन्हा नाम के एक अमीर लड़के से तय कर दी थी। बेनी सिन्हा एक धूर्त और मतलबी इंसान है जो केवल ठाकुर की जायदाद में दिलचस्पी रखता है। जब नीता को पता चलता है कि उसके पिता ने उसकी शादी तय कर दी है तो वह बहुत परेशान हो जाती है क्योंकि वह केवल विजय से प्यार करती है। दूसरी तरफ जब विजय को नीता की असली पहचान का पता चलता है तो वह भी दंग रह जाता है। उसे समझ आ जाता है कि उसका रास्ता कांटों भरा है क्योंकि ठाकुर कभी भी उस परिवार में अपनी बेटी नहीं देंगे जिसे उन्होंने सालों पहले ठुकरा दिया था।
विजय हार मानने वालों में से नहीं था। वह तय करता है कि वह न केवल नीता का प्यार हासिल करेगा बल्कि अपने परिवार और ठाकुर के बीच की कड़वाहट को भी खत्म करेगा। वह वेश बदलकर और अलग-अलग तरीकों से ठाकुर के करीब पहुँचने की कोशिश करता है। फिल्म में कई ऐसे मजेदार दृश्य हैं जहाँ विजय अपनी चतुराई से ठाकुर और बेनी सिन्हा को बेवकूफ बनाता है। वह नीता से छिप-छिपकर मिलता है और उसे हिम्मत देता है कि वे एक दिन जरूर एक होंगे। इसी बीच रवि और मधु को भी विजय और नीता के प्यार के बारे में पता चल जाता है। मधु डर जाती है क्योंकि वह अपने भाई के गुस्से को अच्छी तरह जानती है लेकिन रवि विजय का साथ देने का फैसला करता है।
जैसे-जैसे शादी का दिन करीब आता है तनाव बढ़ता जाता है। बेनी सिन्हा को विजय पर शक होने लगता है और वह ठाकुर को भड़काने की कोशिश करता है। एक दिन ठाकुर के सामने सारी सच्चाई आ जाती है कि विजय कोई और नहीं बल्कि उनके दुश्मन रवि का भाई है। ठाकुर गुस्से में आगबबूला हो जाते हैं और विजय को बेइज्जत करके घर से बाहर निकाल देते हैं। वे नीता पर पाबंदियां लगा देते हैं और उसे कमरे में बंद कर देते हैं। लेकिन विजय और नीता का प्यार सच्चा था। विजय अपने दोस्तों की मदद से ठाकुर के घर में घुसता है और नीता को वहां से निकालने की योजना बनाता है।
फिल्म के आखिरी हिस्से में बहुत ही ड्रामा और एक्शन देखने को मिलता है। एक तरफ बेनी सिन्हा और उसके गुंडे हैं और दूसरी तरफ विजय और उसके साथी। एक जबरदस्त लड़ाई के बाद विजय बेनी सिन्हा की असलियत ठाकुर के सामने लाने में कामयाब हो जाता है। ठाकुर को अहसास होता है कि जिस इंसान को वह अपना दामाद बनाना चाहते थे वह एक अपराधी है जबकि विजय जैसा लड़का उनकी बेटी के लिए बिल्कुल सही है। ठाकुर का हृदय परिवर्तन होता है और उन्हें अपनी पुरानी गलतियों का पछतावा होता है। वे मधु को गले लगा लेते हैं और रवि को भी माफ कर देते हैं। फिल्म का सुखद अंत होता है जहाँ विजय और नीता की शादी हो जाती है और पूरा परिवार फिर से एक हो जाता है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि प्यार और ईमानदारी से किसी भी नफरत को जीता जा सकता है और जवानी का असली मतलब केवल मस्ती नहीं बल्कि अपनों के लिए खड़े होना भी है।


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