Bawarchi is a 1972 Indian Hindi-language musical comedy
drama film directed by Hrishikesh Mukherjee and
produced by Mukherjee himself along with N.C. Sippy and Romu N. Sippy. Released
in India on 7 July 1972, the film stars an ensemble
cast of Rajesh
Khanna, Jaya
Bhaduri, Asrani, Harindranath Chattopadhyay, A.K.
Hangal, Durga
Khote, Manisha, Kali
Banerjee, Usha
Kiran and Raju
Shrestha.
यह कहानी साल 1972 की कालजयी भारतीय फिल्म बावर्ची की है, जिसका निर्देशन हिंदी सिनेमा के महान निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था। इस फिल्म का निर्माण भी ऋषिकेश मुखर्जी ने एन.सी. सिप्पी और रोमू एन. सिप्पी के साथ मिलकर किया था। फिल्म की शुरुआत एक बहुत ही अनोखे और रचनात्मक तरीके से होती है, जिसमें पर्दे पर लाल रंग का एक स्थिर पर्दा दिखाई देता है और पार्श्व संगीत में बर्तनों की आवाजें सुनाई देती हैं, जो फिल्म के शीर्षक बावर्ची के साथ पूरी तरह मेल खाती हैं। इस फिल्म की एक और बड़ी विशेषता यह है कि इसमें महान अभिनेता अमिताभ बच्चन ने सूत्रधार यानी नैरेटर की भूमिका निभाई है। उनकी गहरी और प्रभावशाली आवाज पर्दे के पीछे से सुनाई देती है, जो दर्शकों को शांति निवास नामक एक घर और वहां रहने वाले शर्मा परिवार के सदस्यों से परिचित कराती है। शांति निवास कहने को तो शांति का घर है, लेकिन विडंबना यह है कि इस घर में शांति के अलावा सब कुछ मौजूद है। यहां हर वक्त झगड़े, बहस और कलह का माहौल रहता है। यह परिवार इतना झगड़ालू है कि कोई भी घरेलू नौकर या रसोइया यहां कुछ महीनों से ज्यादा टिक नहीं पाता। शर्मा परिवार की बदनामी पूरे शहर में फैल चुकी है और अब कोई भी व्यक्ति उनके घर में बावर्ची के तौर पर काम करने के लिए तैयार नहीं है।
शांति निवास के मुखिया शिवनाथ शर्मा हैं, जिन्हें सब दादूजी कहकर बुलाते हैं। दादूजी का किरदार प्रख्यात कलाकार हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने निभाया है। दादूजी थोड़े सनकी, गुस्सैल लेकिन दिल के बहुत अच्छे इंसान हैं। वे हमेशा अपने बेटों और बहुओं की हरकतों से परेशान रहते हैं और सुबह की एक अच्छी चाय के लिए तरसते रहते हैं। इस घर में दादूजी के तीन बेटे और उनका परिवार रहता है। सबसे बड़े बेटे हैं रामनाथ शर्मा, जिनका किरदार ए.के. हंगल ने निभाया है। रामनाथ एक सीधे-सादे क्लर्क हैं, लेकिन घर की किचकिच से इतने परेशान रहते हैं कि कभी-कभी गम भुलाने के लिए शराब का सहारा लेते हैं। उनकी पत्नी सीता, जिसका किरदार दुर्गा खोटे ने निभाया है, हमेशा अपने जोड़ों के दर्द और गठिया का रोना रोती रहती हैं ताकि उन्हें घर का काम न करना पड़े। उनकी बेटी मीता बहुत आलसी है, जिसे बस नृत्य सीखने और पार्टियों में जाने का शौक है।
दूसरे बेटे की मौत एक कार दुर्घटना में हो चुकी है, जिनकी बेटी कृष्णा शर्मा इस घर की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है। कृष्णा का किरदार जया भादुड़ी ने निभाया है। कृष्णा एक अनाथ लड़की है जो घर के हर सदस्य की सेवा में दिन-रात लगी रहती है, लेकिन बदले में उसे केवल डांट और उपेक्षा ही मिलती है। वह सबकी जी-हजूर करती है, लेकिन चेहरे पर कभी शिकन नहीं आने देती। दादूजी ही घर में एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो कृष्णा के भविष्य और उसकी भलाई के बारे में सोचते हैं। तीसरे बेटे काशीनाथ हैं, जो एक अहंकारी स्कूल अध्यापक हैं। उनकी पत्नी शोभा और बेटा पिंटू भी इसी घर में रहते हैं। काशीनाथ हमेशा अनुशासन की बातें करते हैं, लेकिन खुद अपने भाइयों के साथ उलझते रहते हैं। सबसे छोटा बेटा विश्वनाथ है, जिसे असरानी ने निभाया है। वह फिल्मों में संगीत निर्देशक है, जिसका काम अंग्रेजी गानों की धुनों को चुराकर उनमें हिंदी बोल डालना है। इसके अलावा घर में मीता के डांस टीचर गुरुजी और कृष्णा को पढ़ाने वाले अरुण भी आते-जाते रहते हैं। अरुण और कृष्णा एक-दूसरे को पसंद करते हैं, लेकिन परिवार के विरोध के कारण उनका प्यार परवान नहीं चढ़ पा रहा है।
इस अशांत माहौल में एक दिन एक युवक प्रवेश करता है, जिसका नाम रघु है। रघु का किरदार महान अभिनेता राजेश खन्ना ने निभाया है। वह खुद चलकर शांति निवास आता है और बावर्ची का काम करने का प्रस्ताव रखता है। वह बहुत ही कम वेतन पर काम करने को तैयार हो जाता है, जो शर्मा परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। रघु केवल एक रसोइया नहीं है; वह तो प्रतिभाओं का खजाना है। वह लाजवाब खाना बनाने के साथ-साथ दर्शनशास्त्र की बातें करता है, सुरीला गाता है, कविताएं सुनाता है और नृत्य सिखाने में भी माहिर है। देखते ही देखते रघु घर के हर सदस्य का चहेता बन जाता है। वह घर की कलह को अपनी बुद्धिमानी और मीठी बातों से खत्म करना शुरू कर देता है। वह सबको अहसास कराता है कि परिवार और प्रेम का महत्व क्या है। वह कृष्णा की प्रतिभा को निखारता है और उसे संगीत और कला की ओर प्रेरित करता है।
रघु के आने से घर में शांति तो आ गई, लेकिन उसके बारे में कुछ रहस्यमयी बातें भी थीं। वह दादूजी के बिस्तर के नीचे रखी उस भारी तिजोरी में बहुत दिलचस्पी लेता था, जिसमें परिवार के सारे गहने और कीमती सामान रखे थे। उसी समय शहर में चोरियों की खबरें भी आ रही थीं, जिससे रघु पर शक की एक हल्की लकीर खिंच जाती है। रघु घर के सदस्यों के बीच सुलह करवाता है और दादूजी को लगने लगता है कि रघु कोई साधारण इंसान नहीं बल्कि ईश्वर का भेजा हुआ कोई दूत है। रघु को पता चलता है कि कृष्णा और अरुण एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन घरवाले अरुण को पसंद नहीं करते। रघु उन दोनों की मदद करने का फैसला करता है।
अचानक एक सुबह पूरे परिवार को पता चलता है कि रघु घर से गायब है और उसके साथ ही दादूजी के बिस्तर के नीचे वाली गहनों की तिजोरी भी गायब है। पूरे घर में कोहराम मच जाता है। सबको यकीन हो जाता है कि रघु एक शातिर चोर था जिसने सबका भरोसा जीतकर यह बड़ी चोरी की। दादूजी और विश्वनाथ सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। तभी वहां अरुण आता है और सबके सामने वह गहनों वाली तिजोरी रख देता है। अरुण बताता है कि उसने रघु को संदिग्ध अवस्था में तिजोरी के साथ भागते हुए देखा था। उसने रघु को रोका, उनके बीच लड़ाई हुई और वह रघु को पकड़ने ही वाला था कि रघु तिजोरी फेंककर भाग निकला। परिवार वाले अरुण की बहादुरी से इतने प्रभावित होते हैं कि वे तुरंत कृष्णा और अरुण की शादी के लिए राजी हो जाते हैं।
लेकिन कृष्णा और मीता को रघु पर शक नहीं होता। वे मान ही नहीं सकतीं कि रघु ऐसा कर सकता है। जब सब लोग रघु को बुरा-भला कह रहे होते हैं, तब अरुण का जमीर उसे कचोटने लगता है। वह सबके सामने सच उगल देता है। वह बताता है कि रघु असल में चोर नहीं है। रघु उससे अखाड़े में मिला था और रघु ने खुद उसे वह तिजोरी सौंपी थी। रघु ने ही अरुण से कहा था कि वह परिवार के सामने यह झूठ बोले कि उसने रघु से लड़कर तिजोरी वापस ली है, ताकि अरुण परिवार का भरोसा जीत सके और कृष्णा से उसकी शादी हो सके। रघु ने अपनी छवि खराब करके भी दूसरों का घर बसाने की कोशिश की।
यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह जाता है। कृष्णा घर के बाहर रघु को ढूंढने निकलती है और उसे सड़क पर जाते हुए देख लेती है। वह रघु से पूछती है कि उसने ऐसा क्यों किया और वह वास्तव में कौन है। तब रघु अपनी असलियत बताता है कि उसका असली नाम रघु नहीं बल्कि प्रोफेसर प्रभाकर है। वह एक बहुत पढ़ा-लिखा इंसान है जिसने अपनी जिंदगी ऐसे टूटे हुए परिवारों को जोड़ने के लिए समर्पित कर दी है। वह वेश बदलकर घरों में जाता है और वहां की कड़वाहट को दूर कर देता है। शर्मा परिवार को अपनी गलती का अहसास होता है और वे रघु के प्रति कृतज्ञता से भर जाते हैं। वे उसे रोकना चाहते हैं, लेकिन रघु कहता है कि उसका काम यहां पूरा हो गया है और अब उसे किसी और घर की शांति बहाल करने जाना है। फिल्म के अंत में अमिताभ बच्चन की आवाज फिर सुनाई देती है, जो कहते हैं कि "रघु एक नए घर की तलाश में निकल पड़ा है, उम्मीद है कि वह घर आपका न हो।"



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