"NAYA ZAMANA" - HINDI CLASSICAL ROMANTIC ACTION MOVIE / DHARMENDRA MOVIE




यह कहानी एक ऐसे संघर्ष की है जो अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करती है और समाज में एक नए युग की शुरुआत का संदेश देती है। फिल्म 'नया जमाना' साल उन्नीस सौ इकहत्तर में प्रदर्शित हुई थी, जिसके निर्माता और निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी नजर आए थे, जो उस दौर की सबसे पसंदीदा जोड़ियों में से एक थे। उनके साथ अशोक कुमार, महमूद, प्राण, ललिता पवार और अरुणा ईरानी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने भी अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा है। फिल्म का संगीत महान संगीतकार एस. डी. बर्मन ने दिया है, जो कहानी के हर मोड़ पर भावनाओं को और गहरा बना देता है।


फिल्म की कहानी अनूप नाम के एक युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार धर्मेंद्र ने निभाया है। अनूप एक बहुत ही प्रतिभाशाली लेखक है, लेकिन वह आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा है। वह अपनी माँ (ललिता पवार) और बहन रेखा के साथ एक छोटी सी बस्ती में रहता है। अनूप के विचार बहुत ऊंचे हैं और वह अपनी लेखनी के माध्यम से समाज की बुराइयों को खत्म करना चाहता है। उसकी बस्ती में रहने वाले सभी लोग गरीब हैं लेकिन उनमें आपसी प्रेम और भाईचारा बहुत है। अनूप इन सभी लोगों का मसीहा है और उनकी हर मुसीबत में खड़ा रहता है।


कहानी में मोड़ तब आता है जब अनूप की मुलाकात सीमा से होती है, जिसका किरदार हेमा मालिनी ने निभाया है। सीमा एक बहुत ही अमीर और रईस परिवार की लड़की है। उसके पिता सचिन चौधरी (अशोक कुमार) शहर के बहुत बड़े उद्योगपति हैं। सीमा और अनूप के बीच पहले कुछ छोटी-मोटी तकरार होती है, लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के विचारों और स्वभाव की ओर आकर्षित होने लगते हैं। सीमा को अनूप की सादगी और उसके देशप्रेम से लगाव हो जाता है, वहीं अनूप को सीमा की अच्छाई और उसके निस्वार्थ स्वभाव से प्यार हो जाता है।


जब सीमा के बड़े भाई राजन चौधरी (प्राण) को इस प्रेम संबंध के बारे में पता चलता है, तो वह बहुत क्रोधित हो जाता है। राजन एक बहुत ही घमंडी और लालची इंसान है जिसे केवल पैसे और रुतबे से मतलब है। उसे एक गरीब लेखक का उसकी बहन के जीवन में आना बिल्कुल पसंद नहीं आता। वह सीमा पर पाबंदियां लगा देता है और उसे अनूप से मिलने से मना कर देता है। राजन का मानना है कि गरीब लोग केवल अमीरों का फायदा उठाने के लिए उनसे रिश्ता जोड़ते हैं।


इसी बीच कहानी में एक और प्रेम प्रसंग चल रहा होता है। अनूप की बहन रेखा और राजन का साला महेश (महमूद) भी एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। महेश स्वभाव से थोड़ा मजाकिया और दिल का साफ इंसान है। जब राजन को इस रिश्ते की खबर मिलती है, तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वह इसे अपने परिवार की शान के खिलाफ समझता है। गुस्से में आकर राजन महेश को अपने घर से निकाल देता है। राजन अब अनूप के परिवार को पूरी तरह बर्बाद करने की योजना बनाने लगता है।


अनूप ने एक किताब लिखी होती है जिसका शीर्षक होता है 'नया जमाना'। इस किताब में उसने समाज के बदलते स्वरूप और गरीबों के हक की बात की होती है। अनूप इस किताब को छपवाना चाहता है ताकि उसके विचार दुनिया तक पहुँच सकें। राजन को जब इस पांडुलिपि के बारे में पता चलता है, तो वह अपनी चालाकी से उसे हासिल कर लेता है। वह देखता है कि किताब बहुत ही शानदार लिखी गई है और यह बाजार में बहुत सफल होगी। वह अनूप को धोखा देकर उस किताब को अपने नाम से छपवा देता है।


जब किताब बाजार में आती है और बहुत बड़ी हिट हो जाती है, तब अनूप और सीमा को सच्चाई का पता चलता है। अनूप को अपनी मेहनत का श्रेय न मिलने का दुख होता है, लेकिन उसे उससे ज्यादा दुख इस बात का होता है कि राजन जैसा भ्रष्ट व्यक्ति उसके पवित्र विचारों का इस्तेमाल अपना नाम कमाने के लिए कर रहा है। सीमा अपने भाई की इस हरकत से बहुत शर्मिंदा होती है और वह राजन से मुकाबला करती है। लेकिन राजन को कोई पछतावा नहीं होता। वह कहता है कि पैसे और ताकत के दम पर वह कुछ भी खरीद सकता है।


राजन की क्रूरता यहीं खत्म नहीं होती। वह उस बस्ती की जमीन को हड़पना चाहता है जहाँ अनूप और उसके जैसे कई गरीब परिवार रहते हैं। वह वहां एक बड़ा कारखाना बनाना चाहता है। वह उन लोगों को वहां से निकालने की कोशिश करता है, लेकिन अनूप और सीमा मिलकर लोगों को एकजुट करते हैं और राजन के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। सीमा अपने पिता और भाई के ऐशो-आराम को छोड़कर गरीबों के हक के लिए सड़क पर उतर आती है।


इससे चिढ़कर राजन अपने खास आदमी सीताराम के जरिए एक खतरनाक साजिश रचता है। वह चुपके से पूरी बस्ती में आग लगवा देता है। देखते ही देखते गरीबों के आशियाने जलकर राख हो जाते हैं। राजन बड़ी चतुराई से इस आगजनी का इल्जाम अनूप पर ही लगा देता है। वह पुलिस को रिश्वत देकर अनूप को गिरफ्तार करवा देता है। अनूप की माँ और बहन दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं।


सीमा के पिता सचिन चौधरी भी अब अपनी बेटी के व्यवहार से परेशान हो जाते हैं। वे सीमा को सख्त हिदायत देते हैं कि वह अनूप से रिश्ता तोड़ ले और इन गरीब लोगों की लड़ाई से दूर रहे। सीमा के सामने अब एक बहुत बड़ी चुनौती होती है। एक तरफ उसका पिता है जिसे वह बहुत प्यार करती है, और दूसरी तरफ उसका प्रेमी अनूप और वह सच्चाई जिसके लिए वह लड़ रही थी। सीमा को अब अपने सुख और अपने सिद्धांतों के बीच चुनाव करना होता है।


जेल में रहने के दौरान अनूप को बहुत प्रताड़ित किया जाता है, लेकिन उसके हौसले नहीं टूटते। उधर सीमा हार नहीं मानती और वह अनूप की बेगुनाही के सबूत जुटाना शुरू करती है। उसे महेश और रेखा का भी साथ मिलता है। महेश अपनी मजाकिया छवि को छोड़कर एक गंभीर भूमिका निभाता है और राजन के काले कारनामों का पर्दाफाश करने में मदद करता है।


फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही प्रभावशाली है। अदालत में सच्चाई सामने आती है कि किताब का असली लेखक अनूप ही है और बस्ती में आग राजन ने ही लगवाई थी। सचिन चौधरी को भी अपनी गलती का अहसास होता है कि उन्होंने अपने बेटे के गलत कामों को नजरअंदाज किया। वे अनूप से माफी मांगते हैं और सीमा को उसके साथ जाने की अनुमति देते हैं। राजन को उसके कर्मों की सजा मिलती है।


'नया जमाना' हमें सिखाती है कि सत्य को दबाया जा सकता है लेकिन उसे मिटाया नहीं जा सकता। धर्मेंद्र ने एक जुझारू लेखक के रूप में बहुत ही सशक्त अभिनय किया है। उनके चेहरे पर दिखने वाला आत्मविश्वास और समाज के प्रति चिंता दर्शकों को प्रभावित करती है। हेमा मालिनी ने एक अमीर लेकिन संवेदनशील लड़की के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। महमूद और अरुणा ईरानी की जोड़ी ने फिल्म में मनोरंजन का तड़का लगाया है।


एस. डी. बर्मन का संगीत इस फिल्म की जान है। 'दुनिया ओ दुनिया' और 'किधर जाए रे' जैसे गीत आज भी लोगों को याद हैं। यह फिल्म हमें यह संदेश देती है कि आने वाला जमाना उन लोगों का होगा जो मेहनत और ईमानदारी पर विश्वास रखते हैं, न कि उन लोगों का जो दूसरों का हक मारकर अमीर बनते हैं। यह फिल्म बिमल रॉय की पुरानी फिल्मों की याद दिलाती है जिनमें सामाजिक संदेश को बहुत ही खूबसूरती से बुना जाता था।


अनूप और सीमा का मिलन केवल दो प्रेमियों का मिलन नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग विचारधाराओं का मिलन है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब समाज के संपन्न लोग गरीबों के साथ खड़े होते हैं, तभी वास्तव में एक 'नया जमाना' आता है। यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि अमीर-गरीब का संघर्ष और सच्चाई की लड़ाई हमेशा चलती रहती है।


फिल्म का अंत एक नई उम्मीद के साथ होता है जहाँ जली हुई बस्ती की जगह नए घर बनाए जाते हैं और अनूप की किताब 'नया जमाना' दुनिया को एक नई राह दिखाती है। यह एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म है जो मनोरंजन के साथ-साथ एक बहुत बड़ा सबक भी देती है।


राज कुमार के संवादों की तरह धर्मेंद्र के इस फिल्म के डायलॉग भी बहुत सीधे और चोट करने वाले हैं। प्राण ने एक बार फिर साबित किया कि वे खलनायकी के बेताज बादशाह क्यों माने जाते थे। ललिता पवार ने एक मां के ममतामयी और संघर्षपूर्ण रूप को पर्दे पर बखूबी उतारा है।

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