यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसका जीवन एक पल की नादानी और नशे की लत के कारण पूरी तरह बदल जाता है। फिल्म का नायक सुरजीत सिंह (राजेश खन्ना) है, जो पेशे से एक ट्रक ड्राइवर है। सुरजीत स्वभाव से बहुत ही लापरवाह, जिद्दी और घमंडी किस्म का आदमी है। उसे शराब पीने और अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करने का बहुत शौक है। उसका मानना है कि जिंदगी बस तेजी से भागने और मजे करने का नाम है। वह अक्सर अपनी गाड़ी नशे की हालत में चलाता है और उसे कानून या किसी की जान की कोई परवाह नहीं होती।
एक काली रात, सुरजीत शराब के नशे में धुत होकर एक कोठे पर जाता है जहाँ उसकी मुलाकात चमेलीबाई नाम की महिला से होती है। वह पूरी रात वहीं बिताता है और जब अगली सुबह उसकी आँख खुलती है, तो उसे अहसास होता है कि उसे काम पर पहुँचने में बहुत देरी हो गई है। अपनी इस देरी की भरपाई करने के लिए वह अपना ट्रक स्टार्ट करता है और बहुत ही तेज रफ्तार से सड़क पर दौड़ाने लगता है। बाहर बहुत घना कोहरा छाया हुआ है, सामने की सड़क साफ दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन सुरजीत की रफ्तार कम नहीं होती। वह रास्ते में फिर से शराब पीता है। तभी अचानक धुंध के बीच से एक किसान रामदीन अपनी बैलगाड़ी लेकर सामने आ जाता है। सुरजीत ब्रेक मारने की कोशिश करता है, लेकिन ट्रक अनियंत्रित होकर रामदीन को कुचल देता है। रामदीन की मौके पर ही मौत हो जाती है।
आमतौर पर ऐसे मामलों में ड्राइवर भाग जाते हैं, लेकिन सुरजीत के अंदर कहीं न कहीं इंसानियत बची थी। वह भागने के बजाय वहीं रुक जाता है और पुलिस के आने का इंतजार करता है। पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है और मामला अदालत में पहुँचता है। अदालत में सुरजीत अपना गुनाह कबूल कर लेता है। जज साहब (रहमान) बहुत ही समझदार और नेक इंसान हैं। कानून के मुताबिक सुरजीत को दो साल की जेल होनी चाहिए थी। लेकिन जज साहब जब रामदीन के परिवार की हालत देखते हैं, तो उनका दिल भर आता है। रामदीन के पीछे उसकी विधवा पत्नी मालती (मीना कुमारी), उसकी बहन कमला, दो छोटे बेटे, एक अपाहिज पिता गंगादीन और उसकी अंधी माँ रह गए थे। घर का कमाने वाला एकमात्र इंसान चला गया था।
जज साहब को लगता है कि सुरजीत को जेल भेजने से रामदीन के परिवार का कोई भला नहीं होगा। जेल में सुरजीत को मुफ्त की रोटियां मिलेंगी, जबकि बाहर रामदीन का परिवार भूख से मर जाएगा। इसलिए जज साहब एक बहुत ही अनोखा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हैं। वे सुरजीत को जेल भेजने के बजाय उसे रामदीन के घर भेज देते हैं। फैसला यह था कि सुरजीत को रामदीन के परिवार के साथ रहना होगा, एक किसान की तरह खेत में काम करना होगा और उस पूरे परिवार का खर्चा उठाना होगा। सुरजीत इस फैसले से दंग रह जाता है। वह जज साहब से भीख मांगता है कि उसे कालकोठरी में डाल दिया जाए, लेकिन उसे उन लोगों के साथ न भेजा जाए जिनके घर का उसने चिराग बुझाया है। मगर जज साहब अपना फैसला नहीं बदलते।
सुरजीत को पुलिस की सुरक्षा में उस गाँव ले जाया जाता है। जैसे ही वह गाँव पहुँचता है, पूरे गाँव के लोग उसे नफरत की निगाह से देखते हैं। रामदीन का परिवार उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। घर के लोग उसे 'दुश्मन' कहकर पुकारते हैं और कोई उससे बात नहीं करता। पहली रात सुरजीत वहां से भागने की कोशिश करता है, लेकिन पुलिस उसे पकड़ लेती है और वापस उसी 'खुली जेल' में छोड़ देती है। सुरजीत के लिए यह किसी नर्क से कम नहीं था। उसे हर वक्त रामदीन की विधवा मालती की सूनी आँखों और बूढ़े पिता की लाचारी का सामना करना पड़ता था।
धीरे-धीरे वक्त बीतता है। सुरजीत को समझ आता है कि भागने का कोई रास्ता नहीं है। वह मन मारकर खेत में काम करना शुरू करता है। उसे खेती का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन वह मेहनत करता है। इसी बीच उसकी मुलाकात फूलमती (मुमताज) से होती है। फूलमती एक बहुत ही चुलबुली और खुशमिजाज लड़की है जो गाँव के बच्चों को बायोस्कोप दिखाकर उनका मनोरंजन करती है। फूलमती को सुरजीत की सच्चाई पता चलती है और उसे उससे सहानुभूति होने लगती है। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती प्यार में बदल जाती है। फूलमती सुरजीत के जीवन में रोशनी की एक किरण बनकर आती है।
सुरजीत अब पूरी ईमानदारी से रामदीन के परिवार की सेवा करने लगता है। वह खेत में खून-पसीना एक कर देता है ताकि फसल अच्छी हो और परिवार का पेट भर सके। वह गाँव के एक लालची जमींदार से भी रामदीन की जमीन बचाता है। वह जमींदार न केवल जमीन हड़पना चाहता था, बल्कि उसकी नजर रामदीन की बहन कमला पर भी थी। सुरजीत एक ढाल बनकर उस परिवार की रक्षा करता है। वह कमला की शादी उसके बचपन के प्रेमी से कराने में भी मदद करता है। जज साहब और पुलिस भी समय-समय पर आकर सुरजीत की प्रगति देखते हैं और खुश होते हैं।
हालाँकि, मालती अभी भी सुरजीत को माफ नहीं कर पाई थी। उसके लिए सुरजीत वही इंसान था जिसने उसके सुहाग को छीना था। कहानी में मोड़ तब आता है जब सुरजीत को एक झूठे केस में फँसा दिया जाता है। फूलमती के दादा की अचानक मौत हो जाती है और इसका इल्जाम सुरजीत पर लगा दिया जाता है। उसी समय जमींदार गाँव वालों की फसल में आग लगा देता है और फूलमती का अपहरण कर लेता है। मालती, जो अब तक जमींदार को एक भला इंसान समझकर उसकी मिल में काम कर रही थी, उसकी असलियत देख लेती है। जमींदार मालती के साथ भी बदतमीजी करने की कोशिश करता है।
सुरजीत जेल की सलाखें तोड़कर भागता है और सही समय पर पहुँचकर मालती और फूलमती को जमींदार के चंगुल से बचाता है। वह जमींदार की जमकर धुलाई करता है और पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है। इस घटना के बाद मालती का दिल पिघल जाता है। उसे अहसास होता है कि सुरजीत ने अपने पाप का प्रायश्चित कर लिया है। रामदीन का पूरा परिवार सुरजीत को अपना सदस्य मान लेता है और उसकी शादी फूलमती से तय कर दी जाती है।
फिल्म के अंत में एक बहुत ही भावनात्मक दृश्य आता है। सुरजीत के दो साल की सजा पूरी हो जाती है और पुलिस उसे वापस ले जाने आती है। अब सुरजीत वह पुराना ड्राइवर नहीं रहा था। वह रोते हुए जज साहब से विनती करता है कि उसे वापस शहर न भेजा जाए। वह कहता है कि यह गाँव और यह परिवार ही अब उसकी दुनिया है। वह ताउम्र इसी परिवार की सेवा करना चाहता है। जज साहब मुस्कुराते हैं क्योंकि उनका प्रयोग सफल रहा था। उन्होंने एक अपराधी को मार दिया था और एक नेक इंसान को जन्म दिया था।
यह कहानी हमें सिखाती है कि सजा का असली मकसद इंसान को सुधारना होना चाहिए, न कि केवल उसे प्रताड़ित करना। राजेश खन्ना ने सुरजीत के किरदार में जो जान फूँकी है, वह आज भी मिसाल दी जाती है। मीना कुमारी की खामोशी और मुमताज की चंचलता ने इस फिल्म को एक मुकम्मल शाहकार बना दिया। दुश्मन फिल्म समाज के प्रति एक गहरी संवेदना और सुधार की भावना का प्रतीक है।
यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रभावशाली है क्योंकि यह न्याय के एक नए रूप को पेश करती है। सुरजीत सिंह का सफर अहंकार से विनम्रता तक का सफर है, जो दर्शकों के दिलों को गहराई से छू जाता है। यह विस्तृत कहानी मानवीय भावनाओं के हर उस कोने को उजागर करती है जहाँ रोशनी पहुँचनी जरूरी है।



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