"TUMSE ACHHA KAUN HAI" - HINDI MOVIE REVIEW / SHAMMI KAPOOR / BABITA MOVIE

 



Tumse Achha Kaun Hai, is a 1969 Romantic-Comedy Drama Indian film, written by Sachin Bhowmick and produced-directed by pramod chakravorty. The film starred Shammi Kapoor, Babita, Mehmood, and Pran. The music was composed by the duo Shankar Jaikishan and song lyrics written by Hasrat Jaipuri.

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यह कहानी अशोक नाम के एक युवक की है। अशोक बहुत ही सीधा, सच्चा और मेहनती लड़का है। उसके जीवन में सबसे ज़्यादा मायने उसकी छोटी बहन रूपा रखती है। बचपन में एक दिन अशोक ने हँसी मज़ाक में एक छोटी सी शरारत कर दी थी। वह शरारत इतनी छोटी थी कि उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि उसका नतीजा इतना भयानक होगा। उसी दिन एक हादसा हुआ और उस हादसे में रूपा की आँखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। उस दिन के बाद से अशोक का मन कभी शांत नहीं हुआ। वह हर समय खुद को दोषी मानता रहा। उसे लगता था कि अगर उसने वह मज़ाक न किया होता, तो आज उसकी बहन दुनिया देख पा रही होती।


अशोक ने उसी दिन अपने दिल में एक बात ठान ली। उसने तय कर लिया कि चाहे उसे कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े, वह अपनी बहन की आँखों की रोशनी वापस ज़रूर लाएगा। वह दिन रात काम करने लगा। कभी छोटी नौकरी, कभी बड़ा काम, जो भी मिला वह करता गया। लेकिन जितना वह पैसा जोड़ता, उतना ही उसे यह एहसास होता कि इलाज का खर्च उसकी पहुँच से बहुत दूर है।


एक दिन उसे पता चला कि अब एक नया इलाज आया है, जिससे अंधे लोगों की आँखों की रोशनी लौट सकती है। यह खबर सुनकर अशोक को पहली बार उम्मीद की एक किरण दिखाई दी। लेकिन जब उसने इलाज का खर्च सुना, तो उसका दिल बैठ गया। इतना पैसा उसके पास कभी नहीं हो सकता था। फिर भी उसने हार नहीं मानी। वह रोज़ भगवान से प्रार्थना करता और किसी चमत्कार की उम्मीद करता रहा।


उसी शहर में एक बहुत अमीर और सख्त स्वभाव वाली बूढ़ी औरत रहती थी, जिसका नाम सरोजिनी देवी था। उसके विचार बहुत पुराने थे। वह प्रेम से बनी शादियों को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। इसके पीछे एक दर्दनाक कारण था। उसकी जुड़वाँ बहन ने कभी प्रेम में पड़कर घर छोड़ दिया था और बाद में उसका जीवन पूरी तरह बिगड़ गया था। उसी घटना ने सरोजिनी देवी के मन में यह डर बैठा दिया था कि प्यार इंसान को तबाह कर देता है।


सरोजिनी देवी अपनी तीन पोतियों के साथ रहती थी। सबसे बड़ी पोती आशा थी। आशा पढ़ी लिखी, समझदार और अपने आत्मसम्मान पर जीने वाली लड़की थी। उसे पुरुषों पर भरोसा नहीं था। बाकी की दो पोतियाँ पहले से ही अपने अपने प्रेम में थीं। सरोजिनी देवी चाहती थी कि तीनों की शादी उसकी पसंद के लड़कों से हो और वह भी बिना किसी प्यार के।


लेकिन उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। आशा शादी का नाम सुनते ही नाराज़ हो जाती थी और छोटी दोनों पोतियाँ अपने प्रेम से पीछे हटने को तैयार नहीं थीं। इसी परेशानी के बीच सरोजिनी देवी की मुलाकात अशोक से होती है। सरोजिनी देवी उसकी मजबूरी समझ जाती है और उसे एक अजीब सा काम सौंपती है। वह अशोक से कहती है कि वह छोटी दोनों लड़कियों के प्रेम को तोड़ दे और आशा को शादी के लिए तैयार कर दे। बदले में वह उसे बहुत सारा पैसा देने का वादा करती है।


अशोक पहले इस काम को सुनकर घबरा जाता है। उसे लगता है कि यह गलत है। लेकिन जब उसे रूपा का चेहरा याद आता है, उसकी अंधी आँखें और उसका सहता हुआ दर्द याद आता है, तो उसका दिल पिघल जाता है। वह भारी मन से यह काम स्वीकार कर लेता है।


अशोक उस घर में रहने लगता है। धीरे धीरे वह सबको समझने लगता है। वह देखता है कि आशा बाहर से जितनी सख्त दिखती है, अंदर से उतनी ही संवेदनशील है। वह किसी से नफरत नहीं करती, बल्कि खुद को चोट से बचाने के लिए दीवार बना लेती है। अशोक उसके साथ बात करता है, कभी हँसी मज़ाक करता है, कभी गंभीर बातें करता है। बिना जाने कब दोनों के बीच अपनापन बढ़ने लगता है।


समय के साथ अशोक को यह एहसास होने लगता है कि वह जिस काम के लिए आया था, उससे कहीं ज़्यादा वह आशा के करीब आ चुका है। वह खुद को रोकने की कोशिश करता है, लेकिन उसका दिल उसकी बात नहीं मानता। उसे आशा से सच्चा प्यार हो जाता है। उधर आशा भी धीरे धीरे अशोक पर भरोसा करने लगती है।


लेकिन यह खुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकती। सरोजिनी देवी को सच्चाई का पता चल जाता है कि अशोक पैसे के बदले यह सब कर रहा था। उसे यह भी पता चलता है कि अब अशोक खुद आशा से प्यार करने लगा है। सरोजिनी देवी को यह विश्वासघात लगता है। वह गुस्से में अशोक को सबके सामने अपमानित करती है और उसे घर से निकाल देती है।


अशोक टूट जाता है। न उसे पैसा मिला, न इलाज का रास्ता खुला, और न ही उसका प्यार उसके साथ है। वह खाली हाथ अपने घर लौटता है। लेकिन वहाँ जो वह देखता है, उससे उसका दिल पूरी तरह टूट जाता है। उसकी बहन रूपा घर में नहीं होती। बाद में उसे पता चलता है कि उसकी गैर मौजूदगी में किसी बुरे इंसान ने रूपा के साथ बहुत बड़ा अपराध किया है और वह डर के मारे घर छोड़कर चली गई है।


अशोक का दिल गुस्से और दुख से भर जाता है। वह खुद को संभालता है और कसम खाता है कि वह उस अपराधी को ढूँढ कर सज़ा दिलाएगा। उसी अपराधी का नाम प्रण होता है। प्रण बाहर से सभ्य और अमीर दिखता है, लेकिन अंदर से बहुत ही निर्दयी और चालाक है। वही आदमी आगे चलकर आशा से सगाई कर लेता है।


प्रण यहीं नहीं रुकता। वह एक और खतरनाक साज़िश रचता है। वह सरोजिनी देवी का अपहरण कर लेता है और उसकी बुरी जुड़वाँ बहन को उसकी जगह बैठा देता है। घर के सभी लोग धोखे में रहते हैं। अशोक इस साज़िश का पता लगाने की कोशिश करता है, लेकिन प्रण एक धमाका करवा देता है, जिसमें अशोक बुरी तरह घायल हो जाता है।


अशोक को अस्पताल पहुँचाया जाता है। वहीं एक चमत्कार होता है। एक दयालु डॉक्टर बिना पैसे लिए रूपा का इलाज कर देता है और उसकी आँखों की रोशनी लौट आती है। रूपा अपने भाई की सेवा करती है, लेकिन जब अशोक को होश आता है, तो वह चुपचाप वहाँ से चली जाती है ताकि उसका भाई और ज़्यादा दुखी न हो।


अशोक जब ठीक होता है, तो उसे आशा के ड्राइवर महेश का साथ मिलता है। महेश बहुत ईमानदार इंसान होता है। दोनों मिलकर प्रण की साज़िश का पर्दाफाश करते हैं। वे सरोजिनी देवी को आज़ाद कराते हैं और सबके सामने सच्चाई लाते हैं।


अंत में प्रण को उसके किए की सज़ा मिलती है। सरोजिनी देवी को अपनी गलती का एहसास होता है। उसे समझ आता है कि प्यार से भागा नहीं जा सकता। वह आशा और अशोक के रिश्ते को स्वीकार कर लेती है। रूपा को उसकी रोशनी मिल चुकी होती है और अशोक का वर्षों पुराना दर्द खत्म हो जाता है।


इस तरह यह कहानी सिखाती है कि सच्चा प्यार, त्याग और सच्चाई किसी भी बुराई से बड़ी होती है। यह कहानी बताती है कि गलतियों का पश्चाताप और उन्हें सुधारने की कोशिश इंसान को महान बनाती है। अच्छाई देर से सही, लेकिन अंत में जीतती ज़रूर है।

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