"GHARANA" - HINDI CLASSICAL FAMILY DRAMA FILM / RAAJ KUMAR & RAJENDRA KUMAR MOVIE



Gharana is a 1961 Indian Hindi film that stars Raaj KumarRajendra Kumar and Asha Parekh. It is directed by S. S. Vasan. This film became a box office hit. 


घराना एक ऐसी पारिवारिक कहानी है जो एक संयुक्त परिवार के भीतर चलने वाले प्रेम, अहंकार, गलतफहमी, त्याग और आपसी समझ की गहराई को बहुत सरल और सच्चे ढंग से दिखाती है। यह कहानी हमें बताती है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले लोगों के बीच प्यार भी होता है और टकराव भी, लेकिन अंत में परिवार का बंधन सबसे बड़ा होता है। यह कहानी केवल कुछ लोगों की नहीं है, बल्कि उन सभी घरों की है जहाँ कई पीढ़ियाँ साथ रहती हैं और हर दिन नए संघर्ष और नए रिश्ते जन्म लेते हैं।


कहानी एक बड़े और सम्मानित परिवार से शुरू होती है। इस परिवार का मुखिया एक समझदार और मेहनती व्यक्ति है जिसने अपनी मेहनत से घर और व्यापार खड़ा किया है। उसके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा गंभीर स्वभाव का है, आत्मसम्मानी है और परिवार की इज्जत को सबसे ऊपर रखता है। छोटा बेटा सरल, हँसमुख और भावुक स्वभाव का है। दोनों भाइयों में प्यार है, लेकिन सोच अलग-अलग है।


घर में माँ का स्थान बहुत ऊँचा है। वह परिवार को जोड़े रखने की कोशिश करती है। वह चाहती है कि उसके बेटे एक-दूसरे से अलग न हों। वह जानती है कि संयुक्त परिवार में छोटे-छोटे मतभेद भी बड़ी दूरी बना सकते हैं।


बड़े बेटे की शादी एक ऐसे परिवार में होती है जहाँ संस्कार और परंपरा को महत्व दिया जाता है। उसकी पत्नी समझदार है, लेकिन वह अपने पति के स्वभाव को पूरी तरह समझ नहीं पाती। छोटा बेटा भी विवाह योग्य हो चुका है। उसकी मुलाकात एक चंचल और सीधी लड़की से होती है। दोनों के बीच धीरे-धीरे प्रेम जन्म लेता है।


घर में जब छोटे बेटे की शादी होती है, तो नया उत्साह आता है। बहू घर में हँसी और नई ऊर्जा लेकर आती है। वह सबको खुश रखने की कोशिश करती है। लेकिन संयुक्त परिवार में हर बात सरल नहीं होती। छोटी-छोटी बातों से मन में शंका और तुलना जन्म लेने लगती है।


बड़ी बहू को लगता है कि अब घर में उसका महत्व कम हो रहा है। उसे लगता है कि सास और पति अब छोटी बहू की ज्यादा प्रशंसा करते हैं। छोटी बहू भी कभी-कभी अनजाने में ऐसी बातें कह देती है जिससे बड़ी बहू को ठेस पहुँचती है। धीरे-धीरे घर का वातावरण बदलने लगता है।


बड़ा बेटा अपने स्वाभिमान को लेकर बहुत सजग है। उसे लगता है कि उसके छोटे भाई की जिम्मेदारियाँ कम हैं और फिर भी उसे अधिक स्नेह मिल रहा है। छोटा भाई यह सब समझ नहीं पाता। वह तो बस चाहता है कि घर में शांति बनी रहे।


पिता इन बदलते हालात को देख रहे होते हैं। वह चाहते हैं कि दोनों बेटे मिलकर घर का काम संभालें। लेकिन व्यापार में भी मतभेद शुरू हो जाते हैं। बड़े भाई का तरीका सख्त और अनुशासित है। छोटे भाई का तरीका सरल और थोड़ा भावुक है। दोनों की सोच टकराने लगती है।


एक दिन व्यापार से जुड़ा एक बड़ा निर्णय लेना होता है। बड़े भाई की राय अलग होती है और छोटे भाई की राय अलग। बात बहस तक पहुँच जाती है। परिवार के अन्य सदस्य भी दो हिस्सों में बँटने लगते हैं। घर में पहली बार ऊँची आवाजें सुनाई देती हैं।


माँ बहुत दुखी होती है। वह दोनों बेटों को समझाने की कोशिश करती है। वह उन्हें बचपन की बातें याद दिलाती है। वह कहती है कि जब तुम छोटे थे, तो एक रोटी भी बाँटकर खाते थे। आज धन और अहंकार ने तुम्हें अलग कर दिया है।


लेकिन मन में जमा हुआ अभिमान तुरंत नहीं पिघलता। बड़े भाई को लगता है कि उसका सम्मान कम हो रहा है। छोटा भाई सोचता है कि उसे बिना कारण दोष दिया जा रहा है। बहुओं के बीच भी दूरी बढ़ती जाती है।


एक दिन बात इतनी बढ़ जाती है कि अलग होने की बात उठती है। घर में सन्नाटा छा जाता है। पिता का दिल टूट जाता है। वह सोच भी नहीं सकते कि उनका बनाया हुआ घर दो हिस्सों में बँट जाएगा।


छोटा भाई अलग होने का निर्णय ले लेता है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि हर दिन झगड़ा हो। वह सोचता है कि दूरी से शायद रिश्ते बच जाएँ। वह अपनी पत्नी के साथ घर छोड़ देता है। माँ की आँखों में आँसू होते हैं। बड़ा भाई बाहर से कठोर दिखता है, लेकिन अंदर से वह भी टूट चुका होता है।


अलग होने के बाद दोनों भाइयों की जिंदगी बदल जाती है। बड़ा भाई अब पूरे व्यापार की जिम्मेदारी अकेले उठाता है। उसे एहसास होता है कि छोटे भाई की मदद कितनी जरूरी थी। छोटा भाई भी नई जगह संघर्ष करता है। उसे समझ आता है कि संयुक्त परिवार का सहारा कितना महत्वपूर्ण था।


समय बीतता है। दोनों परिवारों में कठिनाइयाँ आती हैं। एक बार व्यापार में भारी नुकसान होता है। बड़ा भाई परेशानी में आ जाता है। वह किसी से मदद नहीं माँगता, क्योंकि उसका स्वाभिमान उसे रोकता है।


उधर छोटे भाई को जब यह बात पता चलती है, तो उसका दिल पिघल जाता है। वह अपने पुराने घर को याद करता है। वह सोचता है कि चाहे कितना भी झगड़ा हुआ हो, बड़ा भाई उसका भाई ही है।


वह चुपचाप मदद करने का निश्चय करता है। वह अपने बचाए हुए धन से बड़े भाई की सहायता करता है, लेकिन अपना नाम सामने नहीं आने देता। जब बड़े भाई को सच्चाई पता चलती है, तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसे अपनी गलती का एहसास होता है।


उधर बहुओं के बीच भी बदलाव आता है। छोटी बहू बड़ी बहू से मिलने जाती है। वह कहती है कि उसने कभी जानबूझकर कोई गलती नहीं की। बड़ी बहू भी मान लेती है कि उसके मन में ईर्ष्या ने जगह बना ली थी। दोनों एक-दूसरे को गले लगा लेती हैं।


माँ की तबीयत अचानक बिगड़ जाती है। यह खबर दोनों भाइयों को एक साथ घर ले आती है। माँ उन्हें अपने पास बुलाकर कहती है कि परिवार टूटने से बड़ा दुख कोई नहीं होता। वह कहती है कि धन और मान कभी स्थायी नहीं होते, लेकिन भाईचारा हमेशा साथ रहता है।


माँ की हालत देखकर दोनों भाइयों का हृदय बदल जाता है। वे एक-दूसरे से माफी माँगते हैं। बड़ा भाई कहता है कि उसे अपने छोटे भाई पर गर्व है। छोटा भाई कहता है कि वह हमेशा अपने बड़े भाई का सम्मान करेगा।


परिवार फिर से एक हो जाता है। घर में फिर से हँसी लौट आती है। व्यापार भी संभल जाता है। पिता को सुकून मिलता है कि उनका घर फिर से बस गया है।


यह कहानी हमें सिखाती है कि संयुक्त परिवार में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद और समझ से हर समस्या हल हो सकती है। अहंकार रिश्तों को तोड़ देता है, लेकिन प्रेम उन्हें फिर से जोड़ सकता है। घर केवल दीवारों से नहीं बनता, वह दिलों के मेल से बनता है।


घराना हमें यह भी याद दिलाता है कि भाई-भाई का रिश्ता अनमोल होता है। चाहे कितनी भी दूरी आ जाए, खून का रिश्ता पुकार ही लेता है। अंत में परिवार की जीत होती है और अलगाव की हार।


यह कहानी सरल है, लेकिन इसमें जीवन की गहरी सच्चाई छिपी है। जब परिवार साथ होता है, तो हर कठिनाई छोटी लगती है। जब मन में प्रेम हो, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है। यही इस कहानी का संदेश है।

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