STOLEN - HINDI MOVIE REVIEW / A SOCIAL THRILLER FILM

 



स्टोलन एक भारतीय हिंदी भाषा की सामाजिक थ्रिलर फ़िल्म है, जिसका निर्देशन करण तेजपाल ने किया है और निर्माण गौरव ढींगरा ने जंगल बुक स्टूडियो के बैनर तले किया है। फ़िल्म में अभिषेक बनर्जी मुख्य भूमिका में हैं। यह फ़िल्म दो शहरी भाइयों की दर्दनाक यात्रा पर आधारित है, जो एक अपहृत बच्चे की हताश खोज में उलझ जाते हैं। यह फ़िल्म विश्वास, विवेक और सामाजिक विभाजन के विषयों को उजागर करती है। यह फ़िल्म असामाजिक व्यवहार द्वारा कानून प्रवर्तन के शोषण और भीड़ के मनोविज्ञान के प्रभाव को दर्शाती है। इसका प्रीमियर 4 जून 2025 को अमेज़न प्राइम वीडियो पर हुआ।

"Stolen" एक सशक्त और दिल दहला देने वाली सोशल थ्रिलर है, जो मानवता, भरोसे और सामाजिक असमानताओं पर गहरा वार करती है। यह सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं, बल्कि उस भारत की झलक दिखाती है जहाँ अमीर-गरीब के बीच की खाई, कानून व्यवस्था की कमजोरियाँ और भीड़ की मानसिकता, सब कुछ मिलकर एक मासूम की जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं।

 

कहानी की शुरुआत होती है भारत के एक दूरस्थ और सुनसान रेलवे स्टेशन से। रात का समय है, प्लेटफ़ॉर्म पर सन्नाटा पसरा हुआ है। यहाँ दो शहरी भाईगौतम (अभिषेक बनर्जी) और रमन (शुभम वर्धन) — ट्रेन का इंतजार कर रहे होते हैं।

इसी दौरान उनकी नज़र एक गरीब, आदिवासी महिला झुम्पा महतो (मिया मेलज़र) पर पड़ती है, जो अपने छोटे से बच्चे के साथ बैठी होती है। लेकिन अचानक, कुछ अज्ञात लोग आकर झुम्पा के गोद से उसका बच्चा छीनकर भाग जाते हैं।

 

यह घटना रमन को भीतर तक हिला देती है। उसका जमीर कहता है कि उन्हें झुम्पा की मदद करनी चाहिए, चाहे कुछ भी हो जाए। लेकिन गौतम, जो व्यावहारिक और थोड़ा स्वार्थी स्वभाव का है, शुरुआत में इससे बचने की कोशिश करता है। उसका मानना है कि यह मामला पुलिस का है, और उन्हें इसमें उलझने से बचना चाहिए।

पर रमन की जिद और मानवीय संवेदनाओं के आगे गौतम भी तैयार हो जाता है। दोनों भाई झुम्पा के साथ बच्चे को खोजने निकल पड़ते हैं, बिना यह जाने कि यह सफर उन्हें कितनी खतरनाक परिस्थितियों में डाल देगा।

 

जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, हालात पलटने लगते हैं। बच्चे को खोजने के दौरान, वे खुद ही गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। गाँव के कुछ लोग और स्थानीय पुलिस उन्हें ही अपहरणकर्ता समझ लेते हैं।

भीड़ का गुस्सा और शक, कानून से भी ज्यादा खतरनाक साबित होने लगता है। हर कोई उनके पीछे पड़ जाता हैकभी गाँव वाले, कभी संदिग्ध पुलिसवाले। इस बीच, असली अपहरणकर्ताओं का कोई सुराग नहीं मिलता, जिससे तनाव और बढ़ जाता है।

 

फिल्म के कई हिस्सों में यह साफ दिखता है कि कैसे भीड़ बिना सच जाने हिंसक हो सकती है, और कैसे समाज के कमजोर तबके की आवाज़ अक्सर दबा दी जाती है।

झुम्पा, जो एक गरीब आदिवासी महिला है, तो पुलिस से सही मदद पा पाती है, ही समाज से। वहीं, गौतम और रमन जैसे शहरी लोग भी एक बार गरीब के साथ खड़े हो जाते हैं तो उन्हें भी संदेह की नज़र से देखा जाने लगता है।

 

इस पूरे सफर के दौरान, गौतम के भीतर भी बदलाव आता है। जो इंसान शुरुआत में सिर्फ अपनी सुरक्षा के बारे में सोचता था, वह धीरे-धीरे उस बच्चे को खोजने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हो जाता है।

रमन और गौतम की भाईचारा भी इस संकट में और मजबूत हो जाता है। फिल्म यह दिखाती है कि असली इंसानियत तब सामने आती है, जब हालात आपके खिलाफ हों।

 

फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या हम मुश्किल समय में दूसरों पर भरोसा कर सकते हैं?

यह दिखाती है कि बिना पूरी सच्चाई जाने भीड़ कैसे किसी की जिंदगी बर्बाद कर सकती है।

अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण के बीच मौजूद खाई इस कहानी का अहम हिस्सा है।

 

गौतम के किरदार में अभिषेक बनर्जी भावनाओं का बेहतरीन उतार-चढ़ाव दिखाया है।

फिल्म सिर्फ एक थ्रिलर नहीं, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई का आईना है।

ग्रामीण भारत की सच्ची तस्वीर फिल्म में नजर आती है।

शुरुआत से अंत तक दर्शकों को सीट से बांधे रखती है।

फिल्म सोचने पर मजबूर करती है, लेकिन साथ ही थ्रिल और इमोशन का भरपूर डोज़ देती है।

 

"Stolen" एक ऐसी फिल्म है जो थ्रिलर पसंद करने वालों के साथ-साथ, समाज की गहरी सच्चाइयों को समझने वालों के लिए भी खास है। यह आपको सोचने पर मजबूर करती हैकि अगर आप गौतम या रमन की जगह होते, तो क्या करते?



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