"BE-IMAAN" - HINDI CLASSICAL ACTION DRAMA FILM / MANOJ KUMAR MOVIE




बे-ईमान: ईमानदारी और भ्रष्टाचार के बीच का महासंग्राम

यह कहानी है एक ऐसे समाज की जहाँ ईमानदारी की कीमत चुकाना मुश्किल है और बेईमानी की राह बहुत आसान। फिल्म की शुरुआत एक ईमानदार लेकिन गरीब युवक श्याम (मनोज कुमार) से होती है। श्याम एक स्वाभिमानी इंसान है जो अपनी मेहनत की कमाई पर भरोसा करता है। वह अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता है और उसका मानना है कि इंसान चाहे कितना भी भूखा हो, उसे अपनी ईमानदारी का सौदा नहीं करना चाहिए।


दूसरी ओर, इसी शहर में भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा जाल बिछा हुआ है। पुलिस कमिश्नर (प्रेमनाथ) और सेठ धनराज (प्रेम चोपड़ा) जैसे लोग समाज के रक्षक और प्रतिष्ठित नागरिक होने का नाटक करते हैं, लेकिन परदे के पीछे वे बेईमानी के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। सेठ धनराज एक ऐसा व्यापारी है जो मिलावटखोरी और कालाबाजारी करके मासूम लोगों की जान से खेलता है।





श्याम को एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिलती है। वह अपनी पूरी लगन से काम करता है, लेकिन जल्द ही उसे पता चलता है कि उसका मालिक मिलावट का धंधा कर रहा है। श्याम जब इसके खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे इनाम के बजाय सजा मिलती है। उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है और उस पर चोरी का झूठा इल्जाम लगा दिया जाता है। समाज की नजरों में ईमानदार श्याम रातों-रात 'बे-ईमान' बन जाता है।


जेल की सलाखों के पीछे श्याम का परिचय एक पुराने और शातिर चोर राम सिंह (प्राण) से होता है। राम सिंह का किरदार फिल्म की जान है। वह एक ऐसा इंसान है जिसने दुनिया की बेईमानी देखकर खुद को अपराधी बना लिया है। राम सिंह श्याम को समझाता है कि इस दुनिया में सीधे पेड़ पहले काटे जाते हैं। वह श्याम से कहता है, "अगर तुम्हें इस बेईमान समाज से लड़ना है, तो तुम्हें भी इनकी ही भाषा में बात करनी होगी।"


जेल से छूटने के बाद श्याम बदल चुका है। उसने तय किया है कि वह अब भूखा नहीं मरेगा। वह अपनी चतुराई और साहस का इस्तेमाल करके उन्हीं लोगों को लूटने का फैसला करता है जो गरीबों का खून चूसते हैं। इसी दौरान उसकी मुलाकात सपना (राखी) से होती है। सपना पुलिस कमिश्नर की बेटी है। वह श्याम की सच्चाई और उसकी परिस्थितियों से अनजान है। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार पनपने लगता है। सपना के लिए श्याम एक आदर्श नायक है, लेकिन श्याम अंदर ही अंदर घुट रहा है क्योंकि उसे पता है कि वह कानून की नजरों में एक अपराधी है।


कहानी तब गहराती है जब राम सिंह और श्याम एक साथ मिलकर सेठ धनराज के काले धंधों को चौपट करना शुरू करते हैं। राम सिंह का एक अतीत है जो पुलिस कमिश्नर से जुड़ा हुआ है। दर्शकों को पता चलता है कि राम सिंह वास्तव में कोई पैदाइशी मुजरिम नहीं है, बल्कि वह उन हालातों का मारा हुआ है जो कमिश्नर की एक पुरानी गलती की वजह से पैदा हुए थे। प्राण ने इस भूमिका में जो जान फूँकी है, वह बेमिसाल है। उनका संवाद "एक चोर दूसरे चोर से नहीं डरता" आज भी मशहूर है।


सेठ धनराज को जब पता चलता है कि श्याम ही उसके साम्राज्य के पीछे पड़ा है, तो वह सपना को ढाल बनाता है। वह कमिश्नर को श्याम के खिलाफ भड़काता है। अब स्थिति यह है कि एक तरफ पिता (कमिश्नर) है जो कानून का रखवाला है, और दूसरी तरफ प्रेमी (श्याम) है जिसे कानून की नजर में बेईमान घोषित कर दिया गया है।


फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही नाटकीय और रोमांचक है। श्याम और राम सिंह मिलकर एक ऐसी चाल चलते हैं जिससे सेठ धनराज के गोदाम में जमा मिलावटी सामान और उसके काले कारनामे सबके सामने आ जाते हैं। एक विशाल गोदाम में आग लगती है, गोलियां चलती हैं और भावनाओं का ज्वार उमड़ता है।


अंतिम दृश्य में, राम सिंह अपनी जान जोखिम में डालकर श्याम और सपना को बचाता है। वह खुद को कानून के हवाले कर देता है ताकि श्याम एक नई और साफ-सुथरी जिंदगी जी सके। कमिश्नर को अपनी गलती का अहसास होता है। उन्हें समझ आता है कि वर्दी पहनने वाला हर इंसान ईमानदार नहीं होता और सलाखों के पीछे रहने वाला हर इंसान बेईमान नहीं होता।


श्याम साबित कर देता है कि उसने बेईमानी केवल बेईमानों को सबक सिखाने के लिए की थी। उसकी रूह आज भी उतनी ही पाक है जितनी पहले थी। फिल्म एक बहुत ही खूबसूरत संदेश के साथ समाप्त होती है कि ईमानदारी का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन अंत में जीत सच्चाई की ही होती है।


संगीत: शंकर-जयकिशन का संगीत फिल्म की आत्मा है। "जय बोलो बे-ईमान की" गाना फिल्म के सार को दर्शाता है।


अभिनय: मनोज कुमार ने 'भारत' की अपनी छवि से हटकर एक थोड़े विद्रोही युवक का किरदार निभाया। प्राण को इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, लेकिन उन्होंने इसे लेने से मना कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि संगीत के लिए पुरस्कार 'पाकीजा' को मिलना चाहिए था।


निर्देशन: सोहनलाल कंवर ने एक मसाला फिल्म के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया।


यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि समाज में भ्रष्टाचार और ईमानदारी का संघर्ष आज भी जारी है। बे-ईमान केवल एक मनोरंजन फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक दर्पण है जो हमें हमारे समाज की कमियों को दिखाता है।

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