Badnam Farishte is a 1971 Bollywood court drama film. The film has Rajesh Khanna and Sharmila Tagore as lawyers who fight for unemployed youth who had gotten into the crime world. These two actors made extended guest appearances in this film. The introduction commentary was done by Dharmendra. The cast included mostly the newcomers and struggling artistes of that time.
बदनाम फरिश्ते एक ऐसी कहानी है जो समाज की सच्चाई को बहुत सरल और गहरे ढंग से दिखाती है। यह कहानी उन युवाओं की है जो बेरोजगारी और गरीबी के कारण गलत रास्ते पर चले जाते हैं, और उन लोगों की भी है जो उन्हें वापस सही रास्ते पर लाने के लिए संघर्ष करते हैं। यह कहानी अदालत, कानून, इंसाफ, उम्मीद और बदलाव की है। इसमें दर्द है, लेकिन साथ ही आशा भी है। यह कहानी बताती है कि कोई भी इंसान जन्म से बुरा नहीं होता, परिस्थितियां उसे बुरा बना देती हैं।
कहानी की शुरुआत एक बड़े शहर से होती है जहां चमक दमक है, ऊंची इमारतें हैं, बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन उसी शहर के कोनों में झुग्गियां भी हैं, जहां लोग गरीबी में जीते हैं। वहां कई युवा रहते हैं जो पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनके पास काम नहीं है। वे दिन भर नौकरी की तलाश में भटकते हैं, लेकिन हर जगह से निराश होकर लौटते हैं। धीरे धीरे उनके दिल में गुस्सा और निराशा भरने लगती है।
इन्हीं युवाओं में से एक है रमेश। रमेश ने पढ़ाई पूरी की है। उसके माता पिता ने बहुत मेहनत करके उसे पढ़ाया है। उसके पिता एक छोटे कर्मचारी थे, जो अब बूढ़े हो चुके हैं। घर की हालत अच्छी नहीं है। रमेश रोज सुबह घर से निकलता है और नौकरी की तलाश में दफ्तरों के चक्कर लगाता है। हर जगह उससे अनुभव मांगा जाता है, या फिर किसी सिफारिश की जरूरत बताई जाती है। उसके पास न तो अनुभव है, न ही कोई पहचान। वह थक जाता है, लेकिन हार नहीं मानता।
रमेश का दोस्त शंकर भी उसी बस्ती में रहता है। वह भी पढ़ा लिखा है, लेकिन काम नहीं मिला। दोनों अक्सर साथ बैठकर अपने भविष्य की बात करते हैं। वे सपने देखते हैं कि एक दिन उनकी जिंदगी बदलेगी। लेकिन धीरे धीरे समय बीतता है और हालात और खराब होते जाते हैं। घर में पैसों की कमी बढ़ती है। परिवार वालों की उम्मीदें टूटने लगती हैं।
एक दिन बस्ती में कुछ लोग आते हैं। वे अच्छे कपड़े पहनते हैं, बड़ी बातें करते हैं और युवाओं को आसान कमाई का लालच देते हैं। वे कहते हैं कि अगर वे उनके साथ काम करें तो जल्दी पैसा मिलेगा। शुरुआत में काम छोटा होता है, जैसे सामान पहुंचाना या किसी जगह नजर रखना। धीरे धीरे वही काम अपराध में बदल जाता है। कई युवा लालच और मजबूरी में उनके साथ जुड़ जाते हैं।
रमेश पहले मना करता है। उसे अपने माता पिता की सीख याद है। लेकिन जब घर में दवा के पैसे नहीं होते, बहन की पढ़ाई रुकने लगती है और पिता की तबीयत बिगड़ती है, तो उसका मन डगमगाने लगता है। एक रात वह शंकर के साथ उन लोगों से मिलने जाता है। वे उसे भरोसा दिलाते हैं कि यह बस कुछ दिन का काम है, किसी को नुकसान नहीं होगा। रमेश सोचता है कि वह बस थोड़े समय के लिए यह करेगा।
धीरे धीरे वह उस जाल में फंस जाता है। पहले वह केवल संदेश पहुंचाता है, फिर चोरी में मदद करता है, और फिर एक दिन एक बड़ी वारदात में उसका नाम जुड़ जाता है। पुलिस उस गिरोह पर नजर रख रही होती है। एक दिन छापा पड़ता है और कई युवक पकड़े जाते हैं। रमेश और शंकर भी गिरफ्तार हो जाते हैं।
पूरे शहर में खबर फैलती है कि बेरोजगार युवाओं का एक गिरोह पकड़ा गया है। लोग उन्हें अपराधी कहते हैं। अखबारों में उनके नाम छपते हैं। परिवार वाले शर्म से सिर झुका लेते हैं। रमेश के पिता को गहरा आघात लगता है। वे सोचते हैं कि उनका बेटा कैसे इस रास्ते पर चला गया।
मामला अदालत में जाता है। सरकार की ओर से सख्त सजा की मांग की जाती है। कहा जाता है कि अपराध अपराध होता है, चाहे वजह कुछ भी हो। तभी दो वकील सामने आते हैं। एक हैं अरुण और दूसरी हैं सीमा। दोनों युवा हैं, पढ़े लिखे हैं और समाज के प्रति संवेदनशील हैं। वे इन युवाओं का पक्ष लेने का निर्णय करते हैं।
अरुण और सीमा का मानना है कि इन युवाओं को केवल अपराधी कह देना आसान है, लेकिन उनके अपराध के पीछे की वजह समझना जरूरी है। वे अदालत में कहते हैं कि ये युवक जन्म से बुरे नहीं हैं। ये परिस्थितियों के शिकार हैं। अगर समाज उन्हें अवसर देता तो वे आज अपराधी नहीं होते।
मुकदमा शुरू होता है। सरकारी वकील कड़े शब्दों में आरोप लगाता है। वह कहता है कि अगर इन्हें सजा नहीं मिली तो कानून की इज्जत खत्म हो जाएगी। अरुण और सीमा शांति से हर गवाह से सवाल पूछते हैं। वे दिखाते हैं कि गिरोह का असली सरगना कोई और है, जिसने इन युवाओं को बहकाया और खुद छिपा रहा।
अदालत में कई गवाह आते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने युवाओं को चोरी करते देखा। कुछ पुलिस अधिकारी अपने बयान देते हैं। अरुण हर बयान में छिपी सच्चाई ढूंढते हैं। वे पूछते हैं कि असली नेता कहां है। क्यों केवल गरीब और बेरोजगार युवक ही पकड़े गए।
सीमा अदालत में युवाओं के परिवार वालों को बुलाती हैं। रमेश के पिता कांपते हुए गवाही देते हैं। वे बताते हैं कि उनका बेटा हमेशा ईमानदार था। वह घर चलाने के लिए परेशान था। उनकी आंखों में आंसू होते हैं। अदालत का माहौल भावुक हो जाता है।
शंकर की मां भी आती हैं। वह कहती हैं कि उनका बेटा पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन काम न मिलने के कारण टूट गया। वह कहती हैं कि अगर उसे एक मौका मिले तो वह बदल सकता है। अरुण और सीमा इन बातों को अदालत के सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि सजा देना आसान है, लेकिन सुधार करना कठिन है। समाज को सुधार का रास्ता चुनना चाहिए।
इसी बीच पुलिस असली सरगना को पकड़ लेती है। वह एक प्रभावशाली व्यक्ति निकलता है, जिसने अपने फायदे के लिए युवाओं को मोहरा बनाया। अदालत में उसके खिलाफ भी मुकदमा चलता है। अब सच्चाई धीरे धीरे सामने आने लगती है।
आखिरकार न्यायाधीश फैसला सुनाने का दिन आता है। अदालत में सन्नाटा होता है। न्यायाधीश कहते हैं कि अपराध हुआ है, लेकिन इन युवाओं की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि असली दोषी वह व्यक्ति है जिसने इनकी मजबूरी का फायदा उठाया। युवाओं को कठोर सजा देने के बजाय सुधार गृह भेजने और उन्हें शिक्षा तथा काम का अवसर देने का आदेश दिया जाता है।
यह फैसला सुनकर कई लोग हैरान होते हैं, लेकिन धीरे धीरे लोग समझने लगते हैं कि यह सजा नहीं, बल्कि सुधार का अवसर है। रमेश और शंकर जैसे युवक सुधार गृह में जाकर पढ़ाई और प्रशिक्षण लेते हैं। उन्हें ईमानदारी से काम करने का मौका मिलता है। वे धीरे धीरे बदलते हैं।
कुछ साल बाद वही युवक समाज में लौटते हैं। रमेश एक छोटे उद्योग में काम करने लगता है। वह अपनी मेहनत से आगे बढ़ता है। शंकर भी एक कार्यशाला में काम सीखकर आत्मनिर्भर बनता है। वे दोनों अरुण और सीमा का धन्यवाद करते हैं। वे कहते हैं कि अगर उन्हें वह मौका न मिला होता तो वे हमेशा अपराधी कहलाते।
अरुण और सीमा अदालत के बाहर खड़े होकर मुस्कुराते हैं। उन्हें पता है कि उनकी लड़ाई आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने इंसाफ की एक नई मिसाल कायम की है। वे समझते हैं कि कानून केवल सजा देने के लिए नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने के लिए भी होता है।
कहानी का अंत इस संदेश के साथ होता है कि बेरोजगारी और गरीबी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक समस्या है। अगर युवाओं को सही दिशा और अवसर मिले तो वे देश का भविष्य बन सकते हैं। अगर उन्हें नजरअंदाज किया जाए तो वे भटक सकते हैं। इसलिए समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि हर युवा को काम और सम्मान मिले।
बदनाम फरिश्ते की यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जिन्हें हम अपराधी कहते हैं, वे कभी कभी हालात के मारे होते हैं। अगर उन्हें विश्वास, मार्गदर्शन और अवसर मिले तो वही लोग समाज के लिए वरदान बन सकते हैं। सच्चा न्याय वही है जिसमें दया और सुधार की भावना हो। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है।
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