ये कहानी है निकिता रॉय की, जो एक लेखिका है और अपने भाई सनल की अचानक हुई मौत से अंदर तक हिल जाती है। उसे यकीन है कि ये कोई हादसा नहीं बल्कि एक साज़िश है। भाई की मौत के पीछे कुछ ऐसा है जिसे दुनिया से छुपाया जा रहा है। इसी सच्चाई की तलाश में निकिता जाती है लंदन — वहाँ जहाँ उसका भाई एक खतरनाक रहस्य को उजागर करने की कोशिश कर रहा था।
लंदन पहुँचकर निकिता को पता चलता है कि उसका भाई किसी आम केस की तह में नहीं था, बल्कि वो एक धार्मिक पंथ
और उसके रहस्यमयी नेता अमर देव
के खिलाफ सबूत जुटा रहा था। सनल को कुछ ऐसा मिल गया था, जिसे दुनिया के सामने लाना उसके लिए जानलेवा साबित हुआ।
अमर देव सिर्फ एक आध्यात्मिक गुरु नहीं है, बल्कि उस पर काला जादू और एक शैतानी आत्मा से संबंध रखने का शक भी है। निकिता को पता चलता है कि सनल को एक डेमॉनिक एंटिटी, (राक्षसी शक्ति) ने सताया था। अब यही अंधेरा, यही शक्ति निकिता के भी पीछे लग चुकी है।
निकिता को जब यह सब पता चलता है, तो वो पीछे हटने की जगह, खुद ही उस पंथ और अमर देव को बेनकाब करने की ठान लेती है। अमर देव उसे चेतावनी देता है — "तुम्हारे पास सिर्फ तीन दिन हैं..." और निकिता जवाब देती है — "मुझे
पूरे सात दिन चाहिए, और मैं सच्चाई को उजागर करके रहूंगी।"
कुश एस सिन्हा इस फिल्म से निर्देशन की दुनिया में कदम रखते हैं। उन्होंने इस फिल्म को एक हॉरर-थ्रिलर बनाने की कोशिश की है — ऐसा जॉनर जो बॉलीवुड में आज भी बहुत कम दिखता है। फिल्म का थीम है आस्था बनाम अंधविश्वास, और विज्ञान बनाम तंत्र-मंत्र।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसका डरावना माहौल। कई सीन ऐसे हैं जो आपको चौंका देते हैं। कैमरा वर्क, बैकग्राउंड म्यूज़िक और लोकेशन्स, सब मिलकर एक भूतिया एहसास देते हैं। लेकिन जहां फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ती है, वो है किरदारों का विकास और कहानी की गहराई।
फिल्म की शुरुआत से ही कहानी सीधे जांच पर चली जाती है। दर्शक को यह जानने का मौका ही नहीं मिलता कि निकिता और सनल के बीच क्या रिश्ता था, या अमर देव की असली ताकत क्या है। यही वजह है कि जब फिल्म क्लाइमैक्स पर पहुँचती है, तो भावनात्मक जुड़ाव थोड़ा कम महसूस होता है।
सोनाक्षी सिन्हा ने निकिता के किरदार में अच्छा काम किया है। उनका आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प झलकता है, लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि उनका किरदार खतरे को समझ ही नहीं रहा। बहादुरी अच्छी बात है, लेकिन समझदारी उससे भी जरूरी।
परेश रावल
जैसे सीनियर कलाकार को ज़्यादा स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था। अमर देव और निकिता के बीच की टकराव को और भी रोमांचक बनाया जा सकता था।
अर्जुन रामपाल अपने छोटे से रोल में असर छोड़ते हैं, लेकिन उनका किरदार पूरी फिल्म में एक रहस्य की तरह ही बना रहता है।
‘निकिता रॉय और द बुक ऑफ डार्कनेस’ एक ऐसा थ्रिलर है जिसमें डर तो है, लेकिन थ्रिल उतना नहीं। ये फिल्म एक बेहतरीन आइडिया पर बनी है — एक राक्षसी आत्मा, एक धार्मिक पंथ, और एक बहादुर औरत की कहानी — लेकिन अगर इसे थोड़ी और गहराई दी जाती, और किरदारों को थोड़ा और वक्त मिलता, तो यह एक ज़्यादा असरदार फिल्म बन सकती थी।
यह फिल्म अगर वेब सीरीज़ के रूप में आती, तो शायद ज़्यादा असर डालती। फिर भी, अगर आप डार्क थीम्स, धार्मिक रहस्य, और डरावनी कहानियों के शौकीन हैं, तो ये फिल्म एक बार देखने लायक ज़रूर है।
अगर आप एक डर और रहस्य से भरी फिल्म देखना चाहते हैं, जिसमें एक महिला अपने भाई की मौत के पीछे की सच्चाई ढूंढते हुए एक राक्षसी साजिश से टकराती है — तो ‘निकिता रॉय और द बुक ऑफ डार्कनेस’ आपको निराश नहीं करेगी। बस कुछ अधूरी कड़ियाँ हैं, जिन्हें अगर जोड़ा जाता, तो यह फिल्म वाकई में एक नया मुकाम हासिल कर सकती थी।



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