"VICTORIA 203" - HINDI CLASSICAL ROMANTIC COMEDY FILM




यह कहानी सन् 1972 की प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म 'विक्टोरिया नंबर 203' की है जो एक बहुत ही रोमांचक और कॉमेडी से भरपूर डकैती की कहानी है। इस फिल्म का निर्माण और निर्देशन ब्रिज ने किया था और यह अपने समय की एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। फिल्म की शुरुआत एक बहुत ही कीमती और बेशकीमती हीरों की चोरी से होती है। सेठ दुर्गादास नाम का एक अमीर और प्रतिष्ठित व्यक्ति समाज की नजरों में एक बहुत बड़ा व्यापारी है और उसका बेटा कुमार भी अपने पिता का बहुत सम्मान करता है। लेकिन दुर्गादास की असलियत बहुत ही खौफनाक और अपराधी है। वह वास्तव में एक बहुत बड़े तस्कर गिरोह का सरगना है जो शहर में होने वाली तमाम बड़ी चोरियों और तस्करी के पीछे का मास्टरमाइंड होता है। समाज में उसकी अच्छी साख होने के कारण उसे हर विभाग की गुप्त जानकारी मिल जाती है जिसका फायदा उठाकर उसका गिरोह बड़ी-बड़ी वारदातों को अंजाम देता है।


एक बार दुर्गादास के कहने पर उसका गिरोह बहुत ही महंगे हीरे चुराता है। लेकिन जब लालच इंसान के दिमाग पर हावी हो जाता है तो वह अपनों से भी गद्दारी कर बैठता है। दुर्गादास का एक भरोसेमंद गुंडा उन हीरों को देखकर लालच में आ जाता है और वह गिरोह को धोखा देकर उन हीरों को लेकर भाग खड़ा होता है। जब दुर्गादास को इस गद्दारी का पता चलता है तो वह आगबबूला हो जाता है और वह अपने दूसरे गुंडों को उस गद्दार का पीछा करने और उसे खत्म करके हीरे वापस लाने का हुक्म देता है। दुर्गादास का दूसरा आदमी उस गद्दार को ढूंढ निकालता है और उसे मार डालता है लेकिन किस्मत का खेल देखिए कि वह आदमी भी हीरे लेकर फरार हो जाता है। दुर्गादास अब और भी ज्यादा परेशान हो जाता है क्योंकि उसके हाथ से हीरे बार-बार फिसल रहे होते हैं। वह अपने और भी गुंडों को उस दूसरे गद्दार के पीछे भेजता है। वे गुंडे उस आदमी को घेर लेते हैं और उसे मौत के घाट उतार देते हैं लेकिन मरने से पहले वह चालाक आदमी उन हीरों को कहीं सुरक्षित जगह पर छिपाने में कामयाब हो जाता है।


ठीक उसी समय उस लाश के पास एक विक्टोरिया यानी घोड़ा-गाड़ी वाला मौजूद होता है। पुलिस मौके पर पहुँचती है और केवल परिस्थितियों के आधार पर उस मासूम विक्टोरिया ड्राइवर को गिरफ्तार कर लेती है क्योंकि वह उस मरे हुए आदमी के पास देखा गया आखिरी व्यक्ति था। अदालत उस निर्दोष ड्राइवर को उम्रकैद की सजा सुना देती है। यहीं से कहानी में दो बहुत ही दिलचस्प किरदारों का प्रवेश होता है जिनका नाम राजा और राणा है। राजा और राणा दो बूढ़े और छोटे-मोटे चोर हैं जिनका दिल सोने का है। वे अपनी सजा काटकर जेल से रिहा होने वाले होते हैं। राणा का एक दुखद अतीत है कि सालों पहले उसका एक छोटा बेटा एक पार्क से अगवा हो गया था और आज तक राणा को यह नहीं पता कि उसका बेटा जिंदा भी है या नहीं या उसे किसने अगवा किया था। जेल से बाहर आने के बाद राजा और राणा यह फैसला करते हैं कि अब वे अपनी बाकी की जिंदगी एक शरीफ इंसान की तरह गुजारेंगे और कोई गलत काम नहीं करेंगे।


लेकिन उनकी यह शराफत ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाती क्योंकि जैसे ही उन्हें उन खोए हुए हीरों की खबर लगती है उनकी पुरानी आदतें जाग उठती हैं। उन्हें पता चलता है कि वे हीरे उसी विक्टोरिया गाड़ी से जुड़े हुए हैं जिसका ड्राइवर जेल में है। उन्हें यह भी एहसास होता है कि अभी तक किसी को भी उन हीरों के सही ठिकाने का पता नहीं चला है। हीरों के करीब पहुँचने के लिए राजा और राणा एक योजना बनाते हैं। वे उस जेल में बंद विक्टोरिया ड्राइवर के दूर के भाई बनकर उसके घर पहुँच जाते हैं। वहां ड्राइवर की बड़ी बेटी रेखा रहती है। रेखा शुरुआत में उन पर शक करती है और उन्हें घर में घुसने देने से हिचकिचाती है लेकिन फिर वह उन्हें रहने की जगह दे देती है। राजा और राणा जल्द ही देखते हैं कि रेखा का व्यवहार बहुत ही अजीब है। दिन के समय रेखा एक मर्द का वेश धारण करके विक्टोरिया चलाती है ताकि वह अपने पिता की अनुपस्थिति में घर का खर्च चला सके और रात के समय वह चुपके से घर से बाहर निकल जाती है जब सबको लगता है कि वह सो रही है।


एक रात राजा और राणा उसका पीछा करते हैं और वे देखते हैं कि रेखा एक ऐसे आदमी के घर जा रही है जो असल में दुर्गादास का एक गुंडा है। उन्हें यह देखकर बड़ा धक्का लगता है कि रेखा उस गुंडे को लुभाने की कोशिश कर रही है। लेकिन जब वह गुंडा रेखा के साथ बदतमीजी करने की कोशिश करता है और उस पर हमला करता है तो राजा और राणा उसे बचा लेते हैं। वहां रेखा उन्हें सच बताती है कि वह उस आदमी के करीब इसलिए आई थी क्योंकि उसने देखा था कि जब उसके पिता गिरफ्तार हुए थे तो यह आदमी उस विक्टोरिया के आसपास बहुत ही संदिग्ध तरीके से घूम रहा था। रेखा को यकीन है कि यही वह आदमी है जिसने उसके पिता को फंसाया है। लेकिन इससे पहले कि वे उस गुंडे से कुछ उगलवा पाते कोई उसे गोली मार देता है और वह वहीं मर जाता है। राजा और राणा को जब विक्टोरिया ड्राइवर की पूरी कहानी पता चलती है तो उनका दिल पिघल जाता है। वे तय करते हैं कि वे एक बार अपनी जिंदगी में कोई नेक काम करेंगे और रेखा के पिता को निर्दोष साबित करेंगे।


वे रेखा को अपनी असलियत बता देते हैं और हीरों के बारे में भी बात करते हैं। लेकिन रेखा को उन हीरों के बारे में कुछ भी नहीं पता होता। वे मिलकर पूरी विक्टोरिया गाड़ी की तलाशी लेते हैं उसे एक-एक पुर्जे में खोलकर देखते हैं लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिलता। इसी बीच रेखा की मुलाकात दुर्गादास के बेटे कुमार से होती है जब वह टैक्सी ड्राइवर के वेश में होती है। रेखा को कुमार से प्यार हो जाता है। वह एक अमीर लड़की का वेश बनाकर कुमार को रिझाने की कोशिश करती है और उनकी प्रेम कहानी आगे बढ़ती है। हालांकि जल्द ही कुमार को पता चल जाता है कि रेखा असल में कौन है लेकिन उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता और वह रेखा से शादी करने का फैसला कर लेता है चाहे उसका पिता अपराधी ही क्यों न हो। कुमार को जब अपने पिता दुर्गादास की असलियत का पता चलता है कि वह एक तस्कर है तो उसे गहरा धक्का लगता है और वह अपने पिता का घर छोड़ देता है।


कुमार की मुलाकात राजा और राणा से होती है और शुरुआत में वह उन पर शक करता है। लेकिन जब उसे पूरी सच्चाई पता चलती है तो वह भी उनके साथ मिल जाता है। अब यह चौकड़ी यानी रेखा, कुमार, राजा और राणा मिलकर हीरों को खोजने और दुर्गादास का पर्दाफाश करने में जुट जाते हैं। दुर्गादास को जब पता चलता है कि रेखा उस विक्टोरिया ड्राइवर की बेटी है तो वह उसे अगवा कर लेता है। बाद में कुमार, राजा और राणा भी उसकी कैद में आ जाते हैं और दुर्गादास उन्हें बुरी तरह टॉर्चर करता है ताकि वे हीरों का पता बता सकें। एक दृश्य में जब दुर्गादास शराब पी रहा होता है तो उसकी शराब एक सजी हुई ट्रे में आती है जिसके किनारे पर विक्टोरिया गाड़ी का एक पुराना हेडलाइट लैंप सजावट के लिए लगा होता है। अचानक राणा की नजर उस लैंप पर पड़ती है और उसे पुरानी बात याद आती है। उसे एहसास होता है कि वह गद्दार गुंडा जिस विक्टोरिया में आखिरी बार सवार था उसने हीरे उसी गाड़ी के हेडलाइट के लैंप के अंदर छिपाए थे।


राणा अपनी चतुराई से कुछ समय मांगता है और वह और राजा वहां से निकलकर असली विक्टोरिया के लैंप के पास पहुँचते हैं। उन्हें वहां वाकई में वे कीमती हीरे मिल जाते हैं। वे उन हीरों को लेकर दुर्गादास के अड्डे पर पहुँचते हैं और वहां एक ऐसा ड्रामा रचते हैं जिससे दुर्गादास के अपने ही गुंडे हीरों के लालच में आपस में लड़ने लगते हैं। दुर्गादास यह देखकर शर्मिंदा हो जाता है कि उसके गिरोह का एक भी सदस्य उसके प्रति वफादार नहीं है। इसी हंगामे के बीच एक बहुत बड़ा मोड़ आता है। दुर्गादास का एक पुराना वफादार गुंडा एक राज खोलता है। वह बताता है कि कुमार असल में दुर्गादास का बेटा नहीं है बल्कि वह राणा का वही खोया हुआ बेटा है जिसे बरसों पहले अगवा किया गया था। वह बताता है कि दुर्गादास के पिता ने उसे बेदखल करने की धमकी दी थी क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी और इसी वजह से दुर्गादास ने उस गुंडे को किसी का बच्चा चोरी करने का आदेश दिया था ताकि वह उसे अपना वारिस बता सके।


इस खुलासे के बाद राणा की खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह अपने बेटे को गले लगा लेता है। अंत में पुलिस वहां पहुँचती है और दुर्गादास के साथ-साथ उसके गिरोह को गिरफ्तार कर लिया जाता है। रेखा के पिता को बेगुनाह साबित कर दिया जाता है और उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाता है। राणा अपने बेटे और अपनी होने वाली बहू रेखा के साथ सुखी जीवन बिताने का फैसला करता है। लेकिन राजा को लगता है कि उसकी किस्मत में शायद कुछ और ही लिखा है और वह चुपचाप वहां से जाने लगता है। कुछ दूर जाने के बाद राजा एक बुर्का पहनी हुई औरत को देखता है और उसका पीछा करने लगता है। जब वह उस "औरत" को रोकता है तो पता चलता है कि वह कोई और नहीं बल्कि राणा ही था जो वेश बदलकर उसे रोकने आया था। राणा राजा से कहता है कि वह उसे अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाने देगा क्योंकि उनके बिना उसकी जिंदगी अधूरी है। राजा मान जाता है और दोनों दोस्त हंसते हुए अपने घर की ओर चल पड़ते हैं।


Credits:

  • Producer and Director: Brij

  • Starring: Saira Banu, Navin Nischol, Ranjeet, Anwar Hussain, Helen, Ashok Kumar, Pran

  • Music: Kalyanji–Anandji

  • Lyrics: Indeevar and Verma Malik

  • Cinematography: Anwar Siraj

  • Film Editing: Waman Bhonsle and Gurudutt Shirali




 

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