धड़क 2 – एक संजीदा कहानी जातिवाद और मोहब्बत की |
नमस्कार दोस्तों! आज हम बात करेंगे फिल्म "धड़क 2" के बारे में – जो न सिर्फ एक प्रेम कहानी है, बल्कि हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई को भी सामने लाती है। इस फिल्म में लीड रोल में हैं सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी। निर्देशन किया है शाज़िया इक़बाल ने और फिल्म की कहानी पर काम किया है राहुल बड़वेलकर और शाज़िया इक़बाल ने मिलकर।
फिल्म की शुरुआत होती है एक दर्दनाक दृश्य से – एक दलित युवक को इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वह एक उच्च जाति की लड़की से प्यार करता है। ये सीन फिल्म की टोन सेट कर देता है और हमें पहले ही बता देता है कि यह कोई आम रोमांटिक कहानी नहीं है।
इसके बाद कहानी हमें ले चलती है निलेश की दुनिया में – जो एक दलित समुदाय से आने वाला लॉ का छात्र है। उसे कॉलेज में एडमिशन तो मिल गया है, लेकिन वहां का माहौल उसके लिए आसान नहीं है।
कॉलेज में निलेश की मुलाकात होती है विधि से – एक पढ़ी-लिखी, आत्मविश्वासी और उच्च जाति से ताल्लुक रखने वाली लड़की। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती होती है और फिर प्यार भी पनपता है। लेकिन ये प्यार समाज को गवारा नहीं।
विधि के घरवाले, खासकर उसके पिता (हरीश खन्ना), निलेश को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। एक शादी में तो निलेश को सिर्फ इसलिए नहीं बुलाया जाता क्योंकि उसके नाम के साथ उसका जातिसूचक उपनाम लिखा गया था, जिसे जानबूझकर हटा दिया जाता है।
फिल्म में निलेश की ज़िंदगी की तकलीफ़ें बहुत संवेदनशील ढंग से दिखाई गई हैं। क्लासरूम में उसका मजाक उड़ाया जाता है क्योंकि उसकी अंग्रेज़ी कमजोर है। एक प्रोफेसर उसे क्लास से बाहर निकाल देते हैं, कहते हैं – “फ्री सीट पे आए हो न।” इस पर निलेश का जवाब दिल छू जाता है – “फ्री की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।”
कुछ दृश्य इतने मार्मिक हैं कि आंखें नम हो जाती हैं। जैसे जब निलेश के क्लासमेट उसे कीचड़ से लथपथ कर देते हैं, और निलेश बेबस होकर सब सहता है।
निलेश सिर्फ एक प्रेमी नहीं है, वो एक संघर्षरत युवा भी है जो खुद को, अपनी जाति को, और अपने समाज को समझने की कोशिश कर रहा है। शुरुआत में वो छात्र राजनीति से दूरी बनाए रखता है, लेकिन समय के साथ उसमें बदलाव आता है। हालांकि ये राजनीतिक पहलू पूरी तरह से उभर नहीं पाता और अधूरा रह जाता है।
कहानी में कॉलेज के डीन, (जाकिर हुसैन) का किरदार भी काफी अहम है। वो खुद एक निचली जाति से हैं और बताते हैं कि कैसे उन्हें पढ़ाई से रोका गया था, लेकिन अब वही लोग उनके पास आते हैं सिफारिश लेकर। यह दृश्य फिल्म की परतों को और गहराई देता है।
सिद्धांत चतुर्वेदी ने निलेश के रोल में बेहतरीन अभिनय किया है। एक साधारण, डरे हुए लड़के से लेकर एक आत्मविश्वासी युवक तक का सफर उन्होंने बखूबी निभाया है। तृप्ति डिमरी ने विधि के रूप में अपने किरदार को मासूमियत और सच्चाई से निभाया है।
फिल्म का संगीत भी दिल को छू जाता है। "दुनिया अलग" और
"बस एक धड़क" जैसे
गाने कहानी में भावनाओं को और गहराई देते हैं। जावेद-मोहसिन और सिद्धार्थ-गरिमा का संगीत फिल्म की आत्मा जैसा महसूस होता है।
जहां एक ओर फिल्म में जातिवाद की सच्चाई बखूबी दिखती है, वहीं रोमांस का एंगल थोड़ा अधूरा लगता है। निलेश और विधि का रिश्ता और गहराई पा सकता था। इसके अलावा क्लाइमैक्स थोड़ा जल्दबाज़ी में खत्म होता है। फिल्म जिस ऊंचाई तक पहुंचती है, उसका अंत उतना प्रभावी नहीं लगता।
धड़क 2 एक बेहद जरूरी फिल्म है। यह सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक आईना है। यह फिल्म हमें बताती है कि जातिवाद आज भी ज़िंदा है और युवाओं को इससे जूझना पड़ता है। सिद्धांत चतुर्वेदी का अभिनय फिल्म की जान है और शाज़िया इक़बाल का निर्देशन साहसिक और संवेदनशील है।
अगर आप ऐसी फिल्मों को पसंद करते हैं जो समाज को आईना दिखाएं और दिल को छू जाएं, तो धड़क
2 को ज़रूर देखिए। यह फिल्म एक एहसास है – एक सच्चाई, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
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