सच्चाई, साज़िश और देशभक्ति की अधूरी कहानी.
2025 में
रिलीज़ हुई फिल्म Sarzameen को डायरेक्ट किया है कायोज़े ईरानी ने और इसमें लीड रोल में हैं प्रितिविराज सुकुमारन, काजोल और इब्राहिम अली खान।
Sarzameen एक इमोशनल थ्रिलर बनने का दम रखती थी – इसमें था एक दिल को छूने वाला बैकग्राउंड, एक रहस्यमयी कहानी और दमदार कलाकार। लेकिन अफ़सोस, फिल्म अपने दम पर खड़ी नहीं हो पाई। चलिए जानते हैं क्यों।
फिल्म की शुरुआत होती है कश्मीर में एक आर्मी ऑपरेशन से, जहां एक खतरनाक आतंकवादी मो़हसिन, जो 2006 में मरा हुआ माना जाता था, अचानक फिर से सामने आता है। इस मिशन को लीड कर रहे हैं कर्नल विजय मेनन। लेकिन मिशन असफल हो जाता है और यह पता चलता है कि सब एक जाल था।
इसी दौरान विजय और काजोल (जो फिल्म में मेहर का किरदार निभा रही हैं) का बेटा हरमन आतंकवादियों द्वारा अगवा कर लिया जाता है। बदले में आतंकवादी अपने दो पकड़े गए साथियों की रिहाई मांगते हैं। लेकिन विजय देश के लिए बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो जाता है।
हरमन के मरे होने की खबर सब मान लेते हैं… लेकिन 8 साल बाद हरमन कुछ और बंधकों के साथ जिंदा वापस आता है। अब वो बच्चा, जो पहले डरपोक और हकलाने वाला था, एक आत्मविश्वास से भरा, मजबूत नौजवान बन चुका है।
यहां से फिल्म में असली कहानी शुरू होती है। अब सवाल ये है – क्या यह लड़का सच में हरमन है? या यह कोई बड़ी साज़िश का हिस्सा है?
प्रितिविराज सुकुमारन ने एक ड्यूटी और परिवार के बीच फंसे हुए आर्मी अफसर का किरदार बखूबी निभाया है। उनकी आँखों में मजबूरी, शक और पिता का दर्द साफ दिखता है।
काजोल
हमेशा की तरह इस फिल्म में भी शानदार रही हैं। एक मां की भावनाएं, उम्मीद और संदेह – उन्होंने बारीकी से निभाया है।
इब्राहिम अली खान, जो इस फिल्म से एक्टिंग में कदम रख रहे हैं, ने कुछ दृश्यों में प्रभावशाली काम किया है, खासकर जहां वे अकेलेपन और मानसिक पीड़ा को दिखाते हैं। लेकिन उनके किरदार को और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था।
अब बात करते हैं फिल्म की कमजोरियों की। फिल्म की स्क्रिप्ट क्लिच और फॉर्मूला बेस्ड है। कहानी में देशभक्ति, पारिवारिक भावनाएं, साज़िश और रहस्य सब कुछ है – लेकिन सबकुछ ऊपरी स्तर पर ही रहता है।
कई भावनात्मक सीन, जैसे एक पिता और बेटे की 8 साल बाद मुलाक़ात, या मां की भावनाएं, अच्छी शुरुआत के बावजूद अधूरी रह जाती हैं। निर्देशक ने इन पलों को गहराई देने की बजाय सिर्फ सतही रूप में दिखाया।
विजय और मेहर के रिश्ते की दरारें भी फिल्म में साफ दिखती हैं, लेकिन इस पर भी ध्यान नहीं दिया गया। ये दर्शकों को जोड़ने में असफल रहता है।
बड़ा ट्विस्ट, यानी मोहसिन की असली पहचान, भी जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है – न उसमें कोई सस्पेंस है, न ही प्रभाव।
फिल्म की लंबाई करीब 2 घंटे 17 मिनट की है, और इसकी एडिटिंग टाइट है – यानी फिल्म जल्दी-जल्दी चलती है।
लेकिन तेज़ गति होने के बावजूद फिल्म जुड़ाव नहीं बना पाती।
बैकग्राउंड म्यूज़िक ठीक-ठाक है, लेकिन कोई खास इम्पैक्ट नहीं छोड़ता।
Sarzameen में वो सब कुछ था जो एक दमदार थ्रिलर में होना चाहिए – सशक्त कहानी का आधार, अच्छे कलाकार, और देशभक्ति की भावनाएं। लेकिन इन सबको जोड़ने वाला धागा – यानी स्क्रिप्ट और निर्देशन, कमजोर रह गए।
अगर कहानी को ज्यादा गहराई, सस्पेंस और भावनात्मक वजन दिया गया होता, तो ये फिल्म एक यादगार थ्रिलर बन सकती थी।
अगर आप देशभक्ति और थ्रिलर के फैन हैं, और कलाकारों का काम देखना चाहते हैं – तो एक बार देख सकते हैं।
लेकिन अगर आप एक दमदार कहानी और प्रभावशाली क्लाइमैक्स की उम्मीद कर रहे हैं, तो ये फिल्म आपको निराश कर सकती है।
आपको हमारा ये वीडियो रिव्यू कैसा लगा, हमें कमेंट में ज़रूर बताएं। अगर आपने Sarzameen
देखी है, तो आपके विचार जानना हमें अच्छा लगेगा।
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