CHUPP - HINDI CRIME THRILLER MOVIE / JEETENDRA STARRING

 



दोस्तों, आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी रहस्यमयी थ्रिलर फ़िल्म की, जिसमें हर सीन में नया मोड़ है। यह है चुप,

 एक हिंदी थ्रिलर मूवी, जिसका निर्देशन किया था अमब्रिश सांगल ने। फ़िल्म का निर्माण किया था रमेश यू लखियानी और केशव आर तोलानी ने, और इसे के आर फ़िल्म्स के बैनर तले रिलीज़ किया गया।

इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में नज़र आते हैंजीतेन्द्र, ओम पुरी, सोमी अली और अविनाश वधावन संगीत दिया था प्रदीप लाड ने।
यह फ़िल्म दरअसल एक कन्नड़ थ्रिलरतर्क” (1989) की रीमेक है, जो स्वयं आगाथा क्रिस्टी के मशहूर नाटक The Unexpected Guest से प्रेरित थी।

अब आइए, इस रोमांचक और रहस्यमयी कहानी को विस्तार से समझते हैं।

कहानी की शुरुआत होती है राकेश राय से, जो जेल से फरार हो चुका है। शहर की चारों ओर पुलिस ने घेरा बना रखा है और उसकी तलाश जारी है।
भागते-भागते राकेश एक बड़े उद्योगपति केशव नारंग के घर में घुस जाता है। घर पर उस समय सिर्फ़ उसकी पत्नी आशा अकेली होती है।

आशा तुरंत पहचान लेती है कि यह वही क़ैदी राकेश है जिसकी तलाश पुलिस कर रही है। लेकिन राकेश उसे धमका देता है और खुद को छुपाने की कोशिश करता है।

इसी बीच उसे एक ऐसा नज़ारा दिखता है जो उसे हैरान कर देता है। कमरे के बीचोंबीच, केशव नारंग की लाश पड़ी होती हैऔर हत्यारी कोई और नहीं, बल्कि आशा ही होती है!

जैसे ही राकेश को यह सच्चाई पता चलती है, तभी दरवाज़े पर दस्तक होती है। घर में प्रवेश करते हैं इंस्पेक्टर कदम वे आशा को बताते हैं कि केशव की मौत हवाई जहाज़ के हादसे में हुई है।

यह सुनकर राकेश हैरान रह जाता है। उसने तो अभी-अभी केशव की लाश को अपनी आँखों से देखा है। तो फिर सच्चाई क्या है?

इंस्पेक्टर कदम के जाने के बाद, राकेश और आशा दोनों एक-दूसरे को अपने राज़ बता देते हैं। अब वे एक-दूसरे के राज़दार बन चुके हैं।

राकेश आशा से पूरी सच्चाई जानना चाहता है। तब आशा अपना दिल खोलकर रख देती है।

वह बताती है कि शादी से पहले वह अविनाश नाम के युवक से बेहद प्यार करती थी। लेकिन उसकी गरीबी का फ़ायदा उठाकर उद्योगपति केशव नारंग ने उसे जबरन अपने क़ब्ज़े में कर लिया। शादी के बाद उसकी असलियत सामने आईकेशव एक मानसिक रूप से बीमार और हिंसक इंसान था, जो आशा को बुरी तरह प्रताड़ित करता था।

तंग आकर आशा ने अपने पुराने प्रेमी अविनाश से मदद माँगी। लेकिन जब केशव को इसका पता चला, तो उसने दोनों पर शक करना शुरू कर दिया। एक झगड़े में, अविनाश पुलिस की गाड़ी के नीचे आकर घायल हो जाता है और भाग निकलता है। उसी झगड़े में, अपनी रक्षा करते हुए, आशा ने केशव को छुरा घोंप दिया

यह सब सुनकर राकेश आशा को दोषी नहीं मानता। वह कहता है कि उसने सही किया, क्योंकि वह सिर्फ़ अपने आत्मसम्मान और जीवन की रक्षा कर रही थी।

अगले दिन, जब केशव की मौत पर शोक सभा रखी जाती है, राकेश एक नए नाम से सामने आता है। वह खुद को अशोक, यानी केशव का दोस्त बताता है।

इसी दौरान, घायल अविनाश अस्पताल में होश में आता है और उसे पता चलता है कि केशव की मौत हो चुकी है। अविनाश तुरंत आशा से संपर्क करने की कोशिश करता है, लेकिन बीच में राकेश यानी अशोक आकर सब सँभाल लेता है।

कुछ दिनों बाद, आशा को एक अंजान शख़्स से फ़ोन आता है। कॉल पर वही उसे बताता है कि वह जानता है कि आशा ही केशव की असली हत्यारी है। बदले में वह भारी रकम की माँग करता है।

यह सुनकर आशा का दिल बैठ जाता है। अशोक यानी राकेश भी यह सब सुन लेता है। वह आशा को ढाँढस बँधाता है, लेकिन शक की सुई सीधे अविनाश पर जाती है।

आशा को यक़ीन हो जाता है कि शायद अविनाश ही उसे ब्लैकमेल कर रहा है।

एक रात, झगड़े के दौरान आशा एक कमरे में खुद को बंद कर लेती है। जब वह बाहर आती है, तो सामने एक नई लाश पड़ी होती है। अब मामला और उलझ जाता है।

कौन है जो लगातार इन घटनाओं के पीछे है?
राकेश पूरी ताक़त लगाकर इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करता है।

आख़िरकार, सच सामने आता है। यह सब कर रहा था इंस्पेक्टर कदम असल में उसी ने आशा और राकेश को लाश छुपाते हुए देख लिया था और अब वह इसका फ़ायदा उठाकर ब्लैकमेल कर रहा था।

लेकिन तभी एक और इंस्पेक्टर करवे मौके पर पहुँच जाता है और सबको घेर लेता है।

अब सब एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं। अविनाश और आशा भी एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। लेकिन धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगती है।

असल क़ातिल अविनाश है और ही आशा।
बल्कि सच्चाई तो कुछ और ही है।

राकेश खुद सबके सामने सच कबूल करता है। वह कहता है कि केशव की हत्या उसी ने की थी।

क्यों?

दरअसल, राकेश की पत्नी मोनिका कभी केशव के यहाँ काम करती थी। केशव ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। अपनी इज़्ज़त की रक्षा करते हुए, मोनिका ने उसे मार डाला।

लेकिन उस घटना की ज़िम्मेदारी राकेश ने अपने सिर ले ली। उस रात वह पिछवाड़े से घर में घुसा और इस राज़ को छुपाए रखा।

आख़िर में, राकेश सच सामने लाकर खुद पुलिस के हवाले हो जाता है और अपने अपराध की सज़ा भुगतने के लिए तैयार हो जाता है।

चुप एक सस्पेंस और थ्रिलर से भरपूर फ़िल्म है। इसमें हर मोड़ पर नई गुत्थी खुलती है। कभी लगता है कि आशा क़ातिल है, कभी अविनाश, तो कभी कोई और। लेकिन सच्चाई अंत में पूरी तरह चौंका देती है।

यह फ़िल्म बताती है कि सच कितना भी छुपाने की कोशिश की जाए, वह एक दिन सामने ही जाता है।



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