अमर प्रेम, फिल्म की शुरुआत एक बहुत ही दुखद और विचलित कर देने वाले दृश्य से होती है। नायिका पुष्पा (शर्मिला टैगोर) अपने ही घर में अपमानित हो रही है। पुष्पा एक सीधी-सादी गाँव की महिला है, जिसका पति उसे छोड़कर दूसरी शादी कर लेता है। सौतन के घर में आने के बाद पुष्पा का जीवन नर्क बन जाता है। उसका पति, जो उसे सहारा देने वाला था, वही उसे पीटकर और धक्के मारकर घर से निकाल देता है। पुष्पा रोती हुई अपनी माँ के पास जाती है, इस उम्मीद में कि माँ का आंचल उसे सुकून देगा। लेकिन समाज के डर से उसकी माँ भी उसे अपनाने से मना कर देती है।
अकेली और बेसहारा पुष्पा जब आत्महत्या करने की कोशिश करती है, तो उसके गाँव का एक चाचा, नेपाल बाबू, उसे बचाने का नाटक करता है। लेकिन नेपाल बाबू के मन में खोट था। वह उसे सहारा देने के बहाने कलकत्ता (कोलकाता) ले जाता है और वहाँ एक कोठे (वेश्यालय) पर बेच देता है। पुष्पा की किस्मत उसे ऐसी जगह ले आई थी जहाँ समाज की नजरों में केवल गंदगी थी, लेकिन पुष्पा का मन अभी भी उतना ही कोमल और पवित्र था।
कलकत्ता के उस कोठे पर पुष्पा का संगीत का परीक्षण हो रहा होता है। उसी समय वहाँ आनंद बाबू (राजेश खन्ना) का आगमन होता है। आनंद बाबू एक बहुत बड़े व्यापारी हैं, धन-दौलत की कोई कमी नहीं है, लेकिन वे अंदर से बहुत अकेले हैं। उनकी शादीशुदा जिंदगी खुशहाल नहीं है, उनकी पत्नी केवल पार्टी और दिखावे में डूबी रहती है। आनंद बाबू प्रेम के भूखे हैं। जब वे पुष्पा को गाते हुए सुनते हैं और उसकी आँखों में वह मासूमियत देखते हैं, तो वे उसकी ओर खिंचे चले आते हैं। वे पुष्पा के नियमित ग्राहक बन जाते हैं, लेकिन उनका रिश्ता शारीरिक वासना से कोसों दूर है। वे पुष्पा के पास केवल सुकून पाने और अपनी बातें साझा करने आते हैं। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनपने लगता है, जिसे हम प्रेम कह सकते हैं, लेकिन वह प्रेम वासना रहित है।
इसी बीच, कहानी में एक नया मोड़ आता है। पुष्पा के कोठे के पास ही एक नया परिवार रहने आता है। यह परिवार पुष्पा के अपने ही गाँव से था। इस परिवार का मुखिया विधवा है और उसका एक छोटा बेटा है जिसका नाम नंदू है। नंदू की एक सौतेली माँ भी है। नंदू को अपने घर में वह प्यार नहीं मिलता जिसका वह हकदार है। उसकी सौतेली माँ उसे मारती-पीटती है और उसे अक्सर भूखा रखती है। नंदू के पिता दिन भर काम में व्यस्त रहते हैं।
पुष्पा जब नंदू को देखती है, तो उसकी ममता जाग उठती है। वह नंदू को अपने पास बुलाती है और उसे खाना खिलाती है। नंदू को पुष्पा में अपनी माँ नजर आने लगती है। नंदू के पिता को जब पता चलता है कि पुष्पा अब एक वेश्या बन गई है, तो वे डर जाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। वे नंदू को पुष्पा के पास जाने से मना कर देते हैं और पुष्पा को भी चेतावनी देते हैं कि वह उनके परिवार से दूर रहे। लेकिन बच्चे का मन इन सब पाबंदियों को नहीं जानता। नंदू हर रोज छिपकर पुष्पा के पास आता है। पुष्पा उसे वह सब कुछ देती है जो एक माँ अपने बच्चे को देती है।
आनंद बाबू जब पुष्पा के घर आते हैं, तो वे वहाँ नंदू को देखते हैं। वे देखते हैं कि पुष्पा उस बच्चे को कितना प्यार करती है। आनंद बाबू भी उस बच्चे से जुड़ जाते हैं। वे नंदू के लिए खिलौने और मिठाई लाते हैं। आनंद बाबू, पुष्पा और नंदू—ये तीनों मिलकर एक ऐसे परिवार की तरह लगने लगते हैं जिसका समाज में कोई वजूद नहीं है, लेकिन जिनके दिल आपस में मजबूती से जुड़े हैं। आनंद बाबू अक्सर नंदू को 'पुष्पा का बेटा' कहकर बुलाते हैं।
एक दिन आनंद बाबू का साला पुष्पा के पास आता है। वह पुष्पा को बहुत बुरा-भला कहता है और उस पर आरोप लगाता है कि वह आनंद बाबू के घर को बर्बाद कर रही है। वह पुष्पा से मांग करता है कि वह आनंद बाबू को अपने पास आने से मना कर दे। पुष्पा, जो आनंद बाबू का भला चाहती थी, बहुत दुखी मन से इस बात के लिए तैयार हो जाती है। जब अगली बार आनंद बाबू आते हैं, तो पुष्पा उन्हें दुत्कार देती है और वापस जाने को कहती है। उस क्षण आनंद बाबू को अहसास होता है कि वे पुष्पा से कितना गहरा प्रेम करते हैं। वे वहाँ से चले तो जाते हैं, लेकिन उनका मन हमेशा पुष्पा के पास ही रहता है।
वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहता है। अचानक नंदू को बहुत तेज बुखार हो जाता है। उसकी हालत बिगड़ने लगती है, लेकिन इलाज के लिए उसके पिता के पास पैसे नहीं होते। पुष्पा को जब यह पता चलता है, तो वह तड़प उठती है। वह चुपके से आनंद बाबू से मदद मांगती है। आनंद बाबू बिना किसी को बताए डॉक्टर को पैसे दे देते हैं और नंदू का इलाज करवाते हैं। जब डॉक्टर आनंद बाबू से पूछते हैं कि वे इस बच्चे की इतनी मदद क्यों कर रहे हैं, तो आनंद बाबू एक ऐतिहासिक संवाद कहते हैं— "डॉक्टर बाबू, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता।"
जब नंदू ठीक हो जाता है और उसके पिता डॉक्टर से पूछते हैं कि पैसे किसने दिए, तो डॉक्टर कह देते हैं कि उसकी 'माँ' ने दिए। नंदू के पिता समझ जाते हैं कि वह पुष्पा ही थी जिसने उनके बेटे की जान बचाई। उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है। वे पुष्पा के पास जाते हैं, उसे धन्यवाद देते हैं और उपहार के रूप में उसे वह साड़ी देते हैं जो उन्होंने अपनी पत्नी के लिए खरीदी थी। वे पुष्पा से कहते हैं कि यह एक भाई की तरफ से उसकी बहन को भेंट है। पुष्पा की आँखों में आँसू आ जाते हैं, क्योंकि पहली बार किसी ने उसे 'बहन' कहकर सम्मान दिया था।
जल्द ही नंदू का परिवार उस शहर को छोड़कर वापस गाँव चला जाता है। जाते समय नन्हा नंदू पुष्पा के घर के आंगन में 'हरसिंगार' (पारिजात) का एक छोटा सा पौधा लगाता है। वह पुष्पा से वादा लेता है कि वह हमेशा इस पौधे का ध्यान रखेगी और इसे सूखने नहीं देगी। पुष्पा उसे वचन देती है और नंदू को विदा करते समय वह फूट-फूटकर रोती है।
सालों बीत जाते हैं। वह पौधा अब एक बड़ा पेड़ बन चुका है, लेकिन पुष्पा की जिंदगी फिर से अंधेरों में घिर गई है। कोठा बंद हो चुका है और पुष्पा अब बूढ़ी हो गई है। वह अब दूसरों के घरों में बर्तन मांजने और सफाई करने का काम करती है। लोग उसे पहचानते नहीं और उसके साथ नौकरानी जैसा बुरा व्यवहार करते हैं। आनंद बाबू भी काफी बूढ़े हो चुके हैं। उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया है और वे अब शराब पीना छोड़ चुके हैं। वे पुष्पा की तलाश करते हैं और आखिरकार उसे उसी जर्जर अवस्था में ढूंढ लेते हैं। दोनों एक-दूसरे को देखकर पुराने दिनों की यादों में खो जाते हैं।
इधर नंदू (विनोद मेहरा) अब बड़ा होकर एक सरकारी इंजीनियर बन चुका है। वह उसी शहर में नौकरी पर आता है जहाँ पुष्पा रहती थी। वह पुष्पा को बहुत ढूंढता है, पुराने पड़ोसियों से पूछता है, लेकिन उसे पुष्पा का कोई पता नहीं चलता। किस्मत एक बार फिर सबको करीब लाती है। नंदू का बेटा बीमार हो जाता है और वह उसे उसी पुराने डॉक्टर के पास ले जाता है।
उसी समय आनंद बाबू भी डॉक्टर से मिलने आते हैं। बातों-बातों में आनंद बाबू डॉक्टर को बताते हैं कि पुष्पा को छोड़ने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे कहते हैं कि भले ही उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया, लेकिन पुष्पा का प्रेम हमेशा उनके दिल में एक रोशनी की तरह जलता रहा। डॉक्टर उन्हें बताते हैं कि नंदू शहर में ही है।
अंत में, नंदू और आनंद बाबू की मुलाकात होती है। नंदू जब पुष्पा को उस दयनीय हालत में देखता है, जहाँ लोग उसे डांट रहे थे, तो उसका खून खौल उठता है। वह दौड़कर पुष्पा के पास जाता है। वह देखता है कि पुष्पा वही महिला है जिसने उसे बचपन में अपनी ममता से सींचा था। नंदू सबके सामने गर्व से कहता है कि पुष्पा उसकी माँ है।
फिल्म का अंत बहुत ही भावुक कर देने वाला है। आनंद बाबू की आँखों में खुशी के आँसू हैं। नंदू पुष्पा का हाथ थामता है और उसे अपने साथ अपने घर ले जाने लगता है। वह एक बेटा बनकर अपनी उस माँ को घर ले जा रहा है जिसे समाज ने कभी सम्मान नहीं दिया, लेकिन जिसने अपने प्यार से दो जिंदगियों को अमर बना दिया।
कहानी का सार:
अमर प्रेम यह सिखाती है कि प्रेम और ममता किसी जाति, पेशे या सामाजिक दर्जे के मोहताज नहीं होते। एक वेश्या भी माँ हो सकती है और एक शराबी व्यापारी भी सच्चा प्रेमी हो सकता है। यह फिल्म समाज की दोहरी मानसिकता को आईना दिखाती है और सिद्ध करती है कि 'अमर प्रेम' वही है जो त्याग और निस्वार्थ भावना पर टिका हो।



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